Category Archives: चिंतन

अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने लीबिया पर तेल संपदा पर कब्जे के लिए किया हमला-हिन्दी लेख (libiya par tel sanpada par kabje ke liye-hindi lekh)


लीबिया पर कथित रूप से नाटो देशों के हमले होने का मतलब यह कतई नहीं लिया जाना चाहिए कि यह सब कोई वहां की जनता के हित के लिये किया गया है। लीबिया में जनअसंतोष न हो यह तो कोई भी निष्पक्ष विचारक स्वीकार नहीं कर सकता। दुनियां में कौनसा ऐसा देश है जहां अपने शिखर पुरुषों के प्रति निराशा नहीं है। जब आधुनिक लोकतंत्र वाले देशों में जनअसंतोष है तो एक तानाशाह के देश में खुशहाली होने का भ्रम वैसे भी नहंी पालना चाहिए। लोकतांत्रिक देशों में तो फिर भी आंदोलनों से वह असंतोष सामने आता है पर तानाशाही वाले देशों में तो उसे इस तरह कुचला जाता है कि भनक तक नहीं लगती। ऐसा चीन में दो बार हो चुका है।
लीबिया में एक जनआंदोलन चल रहा है। जिसके नेतृत्व का सही पता किसी को नहीं है। इस आंदोलन को कुचलने के लिये वहां के तानाशाह गद्दाफी ने कोई कसर नहीं उठा रखी है। गद्दाफी कोई भला आदमी नहीं है यह सभी को पता है पर एक बात याद रखनी होगी कि कम से कम उसके चलते लीबिया में एक राज्य व्यवस्था तो बनी हुई है जिसके ढहने पर लीबिया के लोगों की हालत अधिक बदतर हो सकती है। गद्दाफी का पतन हो जाये तो अच्छा पर लीबिया का पतन खतरनाक है। वहां की जनता ही नहीं वरन् पूरी दुनियां के लोगों को इसका दुष्परिणाम भोगना पड़ेगा क्योंकि वहां का तेल उत्पादन वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देता है।
गद्दाफी के विरुद्ध असंतोष कोई नई बात नहीं है। अब वहां आंदोलन चला तो यह पता नहीं लग सका कि वह बाहरी संगठित शक्तियों के कारण फलफूला या वाकई आम जनता अब अधिक कष्ट सहने को तैयार नहीं है इसलिये बाहर आई। अगर हम गद्दाफी के इतिहास को देखें तो पश्चिमी देशों का ऐजेंट ही रहा है। उसने खरबों रुपये की राशि अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस में जमा की होगी-यह इस आधार पर लिखा जा रहा है क्योंकि फ्रांस तथा अमेरिका ने उसकी भारी भरकम जब्त कर ली है-और अगर गद्दाफी मर गया तो इन देशों को ढेर सारा फायदा होगा। हमारे देश के जनवादी लेखक अमेरिका का विरोध करते हैं पर वह कभी विकासशील देशों की लूट का माल पश्चिमी देशों में किस तरह पहुंचता है इसका अन्वेषण नहीं करते। वह अमेरिकी साम्राज्यवाद का रोना रोते हैं पर उसका विस्तारित रूप आजतक नहीं समझ पाये। उनके पसंदीदा मुल्क चीन और रूस तक के देशों में अमेरिका को प्रसन्न करने वाले पिट्ठू बैठे हैं। इन देशों के शिखर पुरुषों के कहीं कहीं पारिवारिक और आर्थिक इन्हीं देशों में केंद्रित हैं। यही कारण है कि जब सुरक्षा परिषद में किसी देश के विरुद्ध प्रस्ताव आना होता है तो उसका पहले सार्वजनिक रूप से विरोध करते हैं पर जब विचार के लिये बैठक में प्रस्तुत होता है तो वीटो करना तो दूर वहां से भाग जाते है। लीबिया के मामले में यही हुआ। सुरक्षा परिषद में लीबिया के खिलाफ प्रस्ताव में दोनों देश नदारत रहे। यह दोनों गद्दाफी का खुलकर समर्थन करते रहे पर ऐन मौके पर मुंह फेरकर चल दिये।
एक आम व्यक्ति और लेखक के नाते हम लीबिया के आम आदमी की चिंता कर सकते हैं। भले ही नाटो देश वहां की जनता के भले के लिये लड़ने गये हैं पर सारी दुनियां जानती है कि युद्ध के बुरे नतीजे अंततः आम आदमी को ही भुगतने होते हैं। मरता भी वही, घायल भी वही होता है और भुखमरी और बेकारी उसे ही घेर लेती हैं। यह अलग बात है कि शिखर पुरुष जुबानी जमा खर्च करते हैं पर उससे कुछ होता नहीं है।
मान लीजिए गद्दाफी का पतन हो गया तो वहां शासन कौन करेगा? तय बात है कि इन पश्चिमी देशों का ही पिट्ठू होगा। वहां की तेल संपदा वह इन देशों के नाम कर देगा। वैसे गद्दाफी भी यही कर रहा था पर लगता है कि उसके खेल से अब यह नाटो देश ऊब गये हैं इसलिये कोई दूसरा वहां बिठना चाहते हैं। यह भी संभव है कि आंदोलनकारियों ने तेल उत्पादक शहरों पर कब्जा कर लिया तो यह देश डर गये कि अब गद्दाफी उनके काम का नहीं रहा। इसलिये लोकतंत्र पर उसको साफ कर वहां अपना आदमी बिठायें। गद्दाफी का पैसा तो वह ले ही चुके हैं पर डालर के अंडे देने वाली मुर्गियां यानि तेल क्षेत्र लेना भी उनके लिये जरूरी है। अपने आर्थिक हितों को लेकर यह देश कितने उतावले हैं कि बिना सूचना और समाचार के अपने हमले कर दिये। इस बात पर शायद कम ही प्रेक्षकों का ध्यान गया होगा कि लीबिया में गद्दाफी के तेल वाले क्षेत्रों पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया था। मतलब यह नाटो देशों के काम का नहीं रहा। फिर अब विद्रोहियों पर उनके हितैषी बनकर उन पर ही नियंत्रण के लिये गद्दाफी को मारने चल दिये। उनका मुख्य मकसर तेल संपदा की अपने लिये रक्षा करना है न कि लीबिया में लोकतंत्र लाना।
जहां तक इन देशों के लोकतंत्र के लिये काम करने का सवाल है तो सभी जानते हैं कि पूंजीवाद के हिमायती यह राष्ट्र पूंजीपतियों के इशारे पर चलते हैं। जरूरत पड़े तो अपराधियों को भी अपने यहां सरंक्षण देते हैं। दूसरे देशों में जनहित का दावा तो यह तब करें जब अपने यहां पूरी तरह कर लिया हो। लोकतंत्र के नाम पर पूंजीपतियों के बंधुआ बने यह राष्ट्र अपने हितों के लिये काम करते हैं और अगर यह लीबिया की जनता की हित का दावा कर रहे हैं तो उन पर कोई यकीन कर सकता है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

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संत कबीर वाणीः मन पर स्वयं सवारी करें, उसे सवार न बनायें


मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक
जो मन पर असवार है,सौ साधु कोय एक

संत कबीर कहते हैं कि मन के अनुसार हमेशा मत चला क्योंकि उसमें हमेशा विचार आते रहते हैं। बहुत कम ऐसे लोग ऐसे हैं जिन पर मन सवारी नहीं करता बल्कि वह उस पर सवारी करते हैं। ऐसे ही लोग साधु कहलाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान उसके मन से है जो उसे चलाता है पर यह गलतफहमी उसे होती है कि वह स्वयं चल रहा है। वैसे बिना मन के कोई मनुष्य तो चल ही नहीं सकता पर अंतर इतना है कि कुछ लोग मन पर सवारी करते हैं और कुछ लोगों पर मन सवार हो जाता है। सामान्य मनुष्य के मन में अनेक इच्छायें जाग्रत होती हैं और वह उनके वशीभूत होकर जीवन भर भटकते हैं। एक पूरी होती है तो दूसरी जाग्रत होती है और फिर तीसरी और चौथी। इच्छा पूरी होने पर मनुष्य प्रसन्न होता है और न पूरी होने पर दुःखी । इस तरह वह जीवन भर अज्ञान के अंधेरे में भटकता है। दूसरे वह लोग होते हैं जो अपने अंदर उत्पन्न इच्छाओं को दृष्टा की तरह देखते हैं। ऐसे लोग साधु कहलाते हैं और वह अपने देह के लिये आवश्यक वस्तुओं को जुटाते हुए अपना जीवन व्यतीत करते हैं पर सुविधा और विलास की वस्तुओं के प्रति उत्पन्न मोह को वह अपने अंदर अधिक देर तक टिकने नहीं देते। ऐसा नहीं है कि उनके मन में उन चीजों को पाने की इच्छा नहीं आती पर वह उनको अनावश्यक समझकर उसे अधिक तवज्जो नहीं देते। वह हर वस्तु के पीछे अंधे होकर नहीं भागते।
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भृतहरि शतकः धनिक लोगों की तरफ मूंह क्यों ताकते हो?


किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा वा गिरिभ्यः
प्रघ्वस्ता तरुभ्यः सरसफलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः।
वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रस्भमपगतप्रश्रयाणां खलानां
दुःखाप्तसवल्पवित्तस्मय पवनवशान्नर्तितभ्रुलतानि ।।

हिंदी में भावार्थ- वन और पर्वतों पर क्या फल और अन्य खाद्य सामग्री नष्ट हो गयी है या पहाड़ों से निकलने वाले पानी के झरने बहना बंद हो गये हैं? क्या वृक्षों से रस वाले फलों की शाखायें नहीं रहीं हैं। उनसे तो तन ढंकने के लिये वल्कल वस्त्र भी प्राप्त होते हैं। ऐसा क्या कारण है कि गरीब लोग उन अहंकारी और दुष्ट लोगों की और मुख ताकते हैं जिन्होंनें थोड़ा धन अर्जित कर लिया हैं।

वर्तमान संदर्भ में संक्षिप्त संपादकीय व्याख्या-यह तो प्रकृति का ही कुछ रहस्य है कि माया सभी के पास समान नहीं रहती। जन्म तो सभी एक तरह से लेते हैं पर माया के आधार पर ही गरीब और अमीर का श्रेणी तय होती है। वैसे प्रकृति ने इतना सभी कुछ बनाया है कि आदमी अगर आग न भी जलाये तो भी उसक पेट भरने का काम चल जाये। तमाम तरह के रसीले फल पेड़ पर लगते हैं पहाड़ों से निकलने वाले झरने पानी देते हैं पर मनुष्य का मन भटकता है केवल उन भौतिक पदार्थों में जो न खाने के काम आते हैं न पीने के। सोना चांदी रुपया और तमाम तरह के अन्य पदार्थ वह संग्रह करता है जो केवल मन के तात्कालिक संतोष के लिये होते हैं। जिनके पास थोड़ा धन आ जाता है गरीब आदमी उसकी तरफ ही ताकता है कि काश इतना धन मुझे भी प्राप्त होता। या वह इस प्रयास में रहता है कि उस धनी से उसका संपर्क बना जाये ताकि समाज में उसका सम्मान बने भले ही उससे कोई आर्थिक लाभ न हो-जरूरत पड़ने पर सहायता की भी आशा वह करता है।
ऐसे विचार हमारे अज्ञान का परिचायक होते हैं। हमें इस प्रकृति की तरफ देखना चाहिये जिसने इतना सब बनाया है कि कोई आदमी दूसरे की सहायता न करे तो भी उसका काम चल जाये। ऐसे में धनिक लोगों की तरफ मूंह ताक कर अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहिये।
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रहीम के दोहे:नीच लोगों का साथ करने से स्वयं पर भी कलंक लगता है


रहिमन उजली प्रकृति को, नहीं नीच को संग
करिया वासन कर गहे, कालिख लागत अंग

कविवर रहीम कहते हैं कि जिनकी प्रवृत्ति उजली और पवित्र है अगर उनकी संगत नीच से न हो तो अच्छा ही है। नीच और दुष्ट लोगों की संगत से कोई न कोई कलंक लगता ही है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सज्जन और उज्जवन प्रकृति के लोग शांत रहते हैं इसलिये उनको ऐसे लोगों की संगत नहीं करना चाहिये जो दुष्टता और अशांत प्रवृत्ति के होते हैं। वैसे आजकल के लोगों में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है कि वह दलाल और दादा प्रवृत्ति के लोगों की संगत चाहते हैं ताकि कोई उनका कोई बिगाड़ नहीं सके। फिल्म देखकर यह धारणा बना लेते हैं कि दादा लोग किसी से किसी की भी रक्षा कर सकते हैं। कई सज्जन परिवार को लड़के भी भ्रमित होकर दादा किस्म के लड़कों के चक्कर में पड़ जाते हैं तो कई लड़कियां भी अपने लिये ऐसे मित्र चुनती है जो दादा टाईप के हों। उनको लगता है कि वह दादा किस्म के मित्र इस समाज में प्रतिष्ठित होते हैं। देश में इसलिये ही सभी जगह अपराधीकरण का बोलबाला हो रहा है क्योंकि जो उज्जवल और शांत प्रकृत्ति के हैं वह अपना विवेक खोकर ऐसे लोगों को संरक्षण देते हैं जो समाज के लिये खतरा है।

यह बात समझ लेना चाहिये कि बुरे का अंत बुरा ही होता है। दादा और दलाल आकर्षक लगते हैं पर उनकी समाज में कोई सम्मान नहीं होता। बुराई का अंत होता है और ऐसे में जो दुष्ट लोगों की संगत करते हैं उनको भी दुष्परिणाम भोगना पड़ता है।

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विदुर नीतिःदूसरों की मजाक उड़ाने वाला महादरिद्र


1.दूसरों के अभद्र शब्द सुनकर भी स्वयं उन्हें न कहे। क्षमा करने वाला अगर अपने क्रोध को रोककर भी बदतमीजी करने वाले का नष्ट कर और उसके पुण्य भी स्वयं प्राप्त कर लेता है।
2.दूसरों से न तो अपशब्द कहे न किसी का अपमान करें, मित्रों से विरोध तथा नीच पुरुषों की सेवा न करें।सदाचार से हीन एवं अभिमानी न हो। रूखी तथा रोष भरी वाणी का परित्याग करं।
3.इस जगत में रूखी या शुष्क वाणी, बोलने वाले मनुष्य के ही मर्मस्थान हड्डी तथा प्राणों को दग्ध करती रहती है। इस कारण धर्मप्रिय लोग जलाने वाली रूखी वाणी का उपयोग कतई न करें।
4.जिसकी वाणी रूखी और शुष्क है, स्वभाव कठोर होने के साथ ही वह जो दूसरों के मर्म कटु वचन बोलकर दूसरों के मन पर आघात और मजाक उड़ाकर पीड़ा पहुंचाता है वह मनुष्यों में महादरिद्र है और वह अपने साथ दरिद्रता और मृत्यु को बांधे घूम रहा है।
5.कोई मनुष्य आग और सूर्य के समान दग्ध करने वाले तीखे वाग्बाणों से बहुत चोट पहुंचाए तो विद्वान व्यक्ति को चोट खाकर अत्यंत वेदना सहते हुए भी यह समझना कि बोलने वाला अपने ही पुण्यों को नष्ट कर रहा है।

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भृतहरि शतकःकाल्पनिक स्वर्ग का विचार करना व्यर्थ


स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतीः
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तयापि फलं तथाप्सरसः

हिंदी में भावार्थ- जो शास्त्र ज्ञान में अधकचरे पण्डित स्त्रियों की निंदा करते हैं वे अपने और पराए सभी को धोखा देते हैं, क्यों तपस्या से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उस स्वर्ग का फल भी अप्सराओं के साथ भोग विलास ही है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अनेक कथित ज्ञानी लोग स्त्री को नरक का द्वार कहते हुए उससे दूर रहने का उपदेश देते हैं। ऐसे लोग केवल पाखंड के अलावा कुछ नहीं करते। वास्तविकता यह है कि वह अपने कथित ज्ञान से वह जिस तपस्या आदि करने का प्रचार करते हैं वह केवल कल्पित स्वर्ग की प्राप्ति करवाने वाला होता है। उसमें भी अप्सराओं से मिलन का सुख बखान किया जाता है। भर्तुहरि कहते हैं कि जब अप्सराओं जैसी सुंदर स्त्रियां इस धरती पर ही मिल जातीं हैं तो उनकी अवहेलना क्यों की जाये। एक तरफ स्वर्ग में अप्सराओं से मिलने के मोह में तप आदि का उपदेश करना और इस धरती की नारी से दूर रहने की बात करना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में इस बात का उल्लेख करना दिलचस्प रहेगा कि फिल्मों और टीवी चैनलों से जुड़ी अभिनेत्रियों को कहीं सैक्सी और सर्वाधिक सुंदर कहकर इसी संसार में काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति करवाकर यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि अन्य कहीं भी स्त्री सुंदर नहीं है। यह भी एक एसा भ्रम है जिसमें युवक अपने हृदय में उनके चेहरे स्थापित कर लेते हैं। सामान्य लड़कियों में भी पर्दे की कथित सुंदरियों जैसा आकर्षण ढूंढने लगते है। अपनी जेब में उनके फोटो रखने लगते हैं। वह जिस सौंदर्य को वास्तविक समझते हैं केवल उन कथित पर्दे वाली सुंदरियों द्वारा उपयोग में लायी गयी सौदर्य प्रसाधन सामग्री और कैमरे का कमाल होता है। अतः कथित अप्सराओं के सौदर्य की कल्पना-चाहे वह धार्मिक संतों द्वारा प्रचारित हो या अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा-में बहना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना व्यर्थ है।
दीपक भारतदीप

चिल्ला कर शांति की कोशिश बेकार


जब किसी विषय पर एक से अधिक लोगों के मध्य विचार होता है तब असहमति भी होती है और होना भी चाहिए क्योंकि उससे ही किसी नए मत के निर्माण की संभावना होती है। जब कोई अपना विचार किसी विषय पर व्यक्त इस उद्देश्य से करता है कि लोग उसकी बात को माने तो उसे इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिऐ कि उस पर कहीं सहमति तो कहीं असहमति होगी-और उसे दोनों पर दृष्टि रखते हुए ही अपने विचार का पुन:निरीक्षण भी करना चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है। जिन लोगों के पास पद, प्रतिष्ठा और पैसा होता है उन्हें कभी कोई चुनौती स्वीकार्य नहीं है। जिनके पास अपने विचार व्यक्त करने के साधन है वह किसी असहमति को सुनने को तैयार नहीं होते और यहीं से शुरू होता है संघर्ष। विचारों का यह संघर्ष अनंतकाल से चल रहा है और आज तक कोई एक धारा- जिससे इस धरती पर शांति और विश्वास स्थापित हो सके-नहीं बह सकी।
कहते हैं कि झूठ मत बोलो पर बोलते सभी हैं। कहते हैं जीवन में आराम नहीं काम करना चाहिए पर आराम की तलाश सभी कर रहे हैं। दूसरे को सुख दो तो सुख मिलेगा और दुख दोगे तो वह भी तुम्हारे हिस्से में आयेगा, पर वास्तविकता में सभी अपने सुख जुटाने में लगे हैं और अवसर पाते ही दूसरे को दुख देते हैं। ज्ञान बघारने को सब तैयार पर चलने को तैयार नहीं है। आदमी का अहंकार उसे कभी अपने विचार से पीछे नहीं हटने देता। मानसिक अंतर्द्वंद में फंसा आदमी कभी भला किसी को सुख दे सकता है? रचना से अधिक विध्वंस में उसकी रूचि होती है। कहीं शांति हो उसका ध्यान नहीं जाता जहाँ द्वंद हो वहाँ वह मन और तन के साथ उपस्थित होने में उसे बहुत आनन्द आता है।
मेरा विचार सब माने-यह विचार हर आदमी का है। असहमति उसे उतेजित कर देती है और वह लड़ने पर आमादा हो जाता है। इस पूरे विश्व में तमाम तरह के वर्ग, जातियाँ, धर्म और भाषाएं हैं उनके आधार पर मनुष्यों ने अपने को अलग-अलग समूहों में बाँट लिया है, और इन समूहों के आपसी संघर्ष से इतिहास भरा पड़ा है । कहते हैं हम यह हैं और तुम वह हो ।कही लड़ते हैं तो कहीं एकता की बात करते हैं। यह दोनों ही बाते भ्रम हैं क्योंकि कहीं जब एकता की चर्चा होती है तो सब अपनी गाते हैं और इसमें असहमति है और फिर बात इस निष्कर्ष पर ख़त्म होती है कि समूहों में एकता क्यों होना चाहिए? कहीं कहीं तो शांति और समझौते के लिए एकत्रित लोग पहले से और झगडा करने लगते हैं।
कहते हैं शांति के लिए आपस में संवाद करेंगे पर निष्कर्ष आखिर निकलता है की शांति क्यों हो? क्योंकि लडाई हो रही है? आदमी हमेशा अपने मन में विचारों का अंतर्द्वंद पाले रहता है जब वह शांत रह नहीं रह सकता समाज कैसे शांत रह सकता है। समाज भी तो आदमी की इकाई से बना है।
भला अशांत मन कभी शांति ला सकते हैं। सहज नहीं होना चाहते बल्कि शांति चाहते हैं। हम चिल्लायें और बाकी लोग शांत हो जाएँ। हम कहें उसे सब माने और शांत हो जाएँ। कहीं लडाई विचारों की तो कहीँ शांति के लिए है। असहमति को खत्म करने के लिए सहमति बना रहे हैं और अधिक असहमत होते जा रहे हैं। भला सहमत हुए बिना भी कभी सहमति बन सकती है। अपने विचारों में बदलाव के बिना कभी हम जब किसी से सहमत नहीं हो सकते तो दूसरा कैसे हो जायेगा कभी सोचा है।

घर में टीवी पर है क्रिकेट देखने का मजा


हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि जब तक जरूरी न हो जहाँ भीड़ हो मत जाओ, क्योंकि उसमें समय नष्ट होता है और अकारण शारीरिक परेशानी भी झेलनी पड़ती है। मगर आजकल लोग वहीं भागते हैं जहाँ भीड़ होती है। बात क्रिकेट की कर रहा हूँ। कहीं भी मैच होता है वहाँ भारी संख्या में लोग पहुँचते हैं। होता यह है कि कई लोगों को टिकिट होने के बावजूद अन्दर प्रवेश नहीं मिल पाता-और धक्के खाकर उनको घर लौटना पड़ता है।
मैंने जितनी क्रिकेट मैदान पर खेली है उससे अधिक रेडियो पर सुनी और टीवी पर देखी है। मैदान पर ऐसे मैच देखे हैं जो अंतर्राष्ट्रीय नहीं थे और अगर थे तो अनौपचारिक और जिनमें प्रवेश मुफ्त था। एक बार एक अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच मैदान पर देखने का भूत सवार हुआ और हमने अपने पैसे से टिकिट खरीदी और सुबह आठ बजे घर से मैदान की तरफ रवाना हुए। वहाँ देखा तो होश फाख्ता हो गए-सभी गेटों पर घुसने वालों की लाइन लगी हुई थी और चूंकि पैसे खर्च चुके इसलिए लाइन में लग गए। इतनी बड़ी लाइन हमने कभी राशन की दुकान पर भी नहीं देखी थी। बहरहाल मैच शुरू हो चुका था और भारत की बैटिंग पहले थी और भारतीय बल्लेबाजों द्वारा रन जुटाने पर स्टेडियम के अन्दर मौजूद दर्शकों की हो-हो की आवाज हमारे कानों में गूंग रही थी और हमें पहली बार लगा कि हम पूरा मैच देखने से चूक रहे हैं। घर पर टीवी पर मैच पहली गेंद से ही देखते थे और कहाँ यह पता ही नहीं लग रहा था कि क्या स्कोर चल रहा है।
जब हम किसी तरह अन्दर पहुचे तो बीस ओवर का मैच निकल चुका था। हमने अपने लिए बड़ी मुश्किल से बैठने की जगह ढूंढी। मैच देखना शुरू किया तब लगा ही नहीं कि मैच देख रहे हैं। बल्लेबाज आउट हुआ तो यह पता ही नहीं लगता कि सही आउट हुआ या गलत-क्योंकि वहाँ रिप्ले देखने की वहाँ कोई व्यवस्था नहीं थी। भारत की इनिंग ख़त्म हुई तो हम बाहर गए। पानी के लगी टंकियों पर भारी भीड़ थी। चाय के ठेलों पर जो चाय मिल रही थी वह दूने दाम पर और बेकार- यह पहले पी चुके लोगों ने बताया। उस समय पानी के पाउच का सिस्टम शुरू नहीं हुआ था। अब तो हमारी हालत बिगडी। एक बार ख्याल लाया कि घर वापस लौट जाएं पर फिर पैसे खर्च कर घर जाकर देखना गवारा नहीं हुआ।
स्टेडियम में वापस लौटे। फिर मैच शुरू हुआ तो अपनी तकलीफे मन से गायब हो गईं-पर मैच समाप्त होते-होते वह फिर परेशान करने लगीं। भारत वह मैच हारा तो हम भी अपने को हारा अनुभव करने लगे। पैसे खरीद कर देखा गया वह हमारा पहला और आखिरी मैच रहा। इसके कम से कम पांच वर्ष और बाद और छः वर्ष पहले फ्री में वहाँ कुछ मैच देखने गए। एक बार दक्षिण अफ्रीका और भारत के युवाओं का मैच देखने गए। दूधिया रोशनी में खेले गए मैच में बड़ा आनंद आया। लोग भी परिवार समेत ऐसे आ-जा रहे थे जैसे कि पार्क में आ रहे हों। पुलिस किसी को आने-जाने से नहीं रोक रही थी। परिवार सहित उस मैच का कुछ देर आनंद लेकर हम घर लौट आये। ऐसी तसल्ली से मैच देखना अब कहीं संभव नहीं है। अब लोग जिस तरह इन मैचों को देखने के लिए टूट रहे हैं उससे तो लगता ही नहीं है कि देश में कोई गंभीर समस्या है। टीवी पर उनके साक्षात्कारों में उनकी तकलीफ देखकर कोई सहानुभूति भी नहीं होती। जिस मैच को घर पर आसानी से और रिप्ले के साथ देखा जा सकता है उसके लिए धक्के खाने जाने वालों के साथ कैसी सहानुभूति? समाचार देने वाले इसे संवेदनशील बनाने की करते हैं पर मुझे नहीं लगता कि उसकी कोई लोगों पर प्रतिक्रिया होती है। क्योंकि कई जगह ऐसा हो चुका है और लोग देखते हुए भी अगर इसका अनुमान नहीं कर चलते तो क्या कहा जाये?
सच तो यह है की जितना मजा घर पर मैच देखने में आता है हमें मैदान पर कभी नहीं आया। फिर आजकल तो वातावरण में गर्मी भी अधिक है और मैदान में अपना पसीना बहाने से कोई फायदा नजर नहीं आता।

दूध की नदी तो अब भी बह रही है


आज एक टीवी चैनल पर रसायनों से दूध बनाने के संबंध में एक रिपोर्ट प्रसारित की गयी जा रही थी। कपडे धोने की सोडा, नकली आयल तथा अन्य खतरनाक वस्तुएं नकली दूध बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहीं थीं। शरीर को भयानक हानि पहुँचाने का यह कार्यक्रम बाकायदा कैमरे में रिकार्ड किया और दुष्कर्म करने वाले अपने बयान इस तरह दे रहे थे जैसे उनके लिए आम बात हो।

वैसे सिंथेटिक दूध बनाकर बेचने की बात कोई नई नहीं है और उसके खतरनाक होने की बात भी कही जाती रही है पर अब यह एक संगठित उद्योग बन गया है। सबसे बड़ी बात यह है की यह अब उन गावों में खुलेआम होने लगा है जिन्हें भारतीय समाज का मुख्य आधार माना जाता है। वैसे दीपावली के आते कई कार्यक्रम ऐसे प्रसारित हुए हैं जो भयभीत तो करते हैं पर मन में चेतना भी लाते हैं। नकली खोये की भी चर्चा बहुत हो रही है और उसकी जगह अन्य स्वीट-जैसे छेने की मिठाई और फल आदि-के इस्तेमाल का सुझाव दिया जा रहा है। विशेषज्ञ शहरों में बिक रही खोये की मिठाई और वहाँ के दुग्ध उत्पादन की मात्रा के आंकडे देकर यही कह रहे हैं की बहुत बडे पैमाने पर नकली खोये की मिठाई बिक रही है। नकली और मिलावट वस्तुओं का मिलना कोई बड़ी बात नहीं थी पर अब उसका अनुपात इतना बढ गया है कि असल और शुद्ध का अस्तित्व ढूंढना कठिन हो गया है।

वैसे तो इस धरती पर धर्म के साथ अधर्म,सच के साथ झूठ और शुद्ध के साथ अशुद्ध, विष के साथ अमृत और असल के साथ नकल रहा है पर जब सहअस्तित्व के साथ। समाज में अच्छे के साथ बुरा भी होता है पर अब तो शुद्धता को जिस तरह अस्तित्व के संकट में डाल दिया गया है उससे भारी चिंता हो रही है।

महात्मा गांधी कहते थे की असल भारत तो गाँवों में रहता है-और टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम में देखा जाये तो यह सब गाँवों में हो रहा है मतलब असल भारत जहाँ दूध की नदियाँ बह रहीं थीं वहाँ अब विष की नदियाँ बहने लगीं हैं। कहा जाता है की गाँवों में अभी शुद्ध वायु और खाने-पीने की सामग्री मिलती है रिपोर्ट उसका खंडन करती है। वैसे गाँवों में गरीबी बहुत है पर लगता है ऐसे कामों से वह दूर हो जायेगी। देश में आबादी बढ़ी है, कृषि योग्य और पशुओं के लिए चरनोई की जमीन कम होती जा रही है-और जहाँ है भी तो उसमें मेहनत अधिक और आय काम होती है- ऐसे में बिना पशुओं के और कम मेहनत के नकली दूध और खोवा बनाकर आय ज्यादा अर्जित करना बहुत आसान है।

याद रखने वाली बात यह है की यह दूध बाजार में बिकता है और लोग इसे पीते हैं। बच्चों को दूध पिलाकर उन्हें भविष्य के एक विजेता बनाने के सपने देखे जाते हैं, पर यह दूध तो उनके स्वास्थ्य के लिए ही बडा संकट है इसलिए ही आजकल छोटी उम्र में बड़ी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। शीत पेय कंपनियों पर अपने उत्पाद में कीटाणु नाशक तय मात्र से अधिक डालने का आरोप लगा तो कई समझदार लोगों ने युवाओं को दूध पीने की सलाह दी थी पर ऐसी रिपोर्ट देखकर क्या सलाह देंगे? दूसरा सहारों में मिलावट और नकली सामान बेचने की जो बीमारी थी वह अब गावों में भी पहुंच गयी है-मतलब असल भारत के सामने अब नकली भारत भी चुनौती के रूप ने खडा है। आशय यह की नैतिकता और सदाशयता का भाव अब हमारे रक्त में कम होता जा रहा है। जब दूध में ऐसे विष होगा तो खून में क्या होगा यह आसानी से समझा जा सकता है। हमारे देश के बारे में कहा जाता था की यहाँ कभी दूध की नदियाँ बहती थीं-बह तो अब भी रही हैं पर असली नहीं नकली दूध की वह भी विष लिए हुए।

भक्ति में विश्वास और चमत्कार की आस-चिंतन


रात का समय…….धीरे-धीरे दिन अपने कोलाहल को समेट रहा कर जा रहा है और रात का अंधियारा अपने साथ ला रहा है चिंतन के लिए अनमोल पल जो हृदय की जिज्ञासा को शांत कराने के लिए सुविधाजनक होते हैं। रात की शांति दिनभर के कोलाहल का विश्लेषण करने के करने का अवसर प्रदान करती हैं।

चिंतन नहीं करूंगा चिंता शुरू हो जायेगी। आख़िर क्या फर्क है चिंतन और चिन्ता में? दिन भर मैंने जो किया या मेरे साथ हुआ उस पर दृष्टिपात कराने का प्रयास करता हूँ। इसमें अपने ‘मैं’ को हटा लेता हूँ क्योंकि अगर ऐसा नहीं करूंगा तो केवल हर घटना का केवल ऐक ही पक्ष देख पाऊँगा और अपनी गलतियाँ नही दिखाईं देंगीं, हर बार अपना ही सही पक्ष देखने का प्रयास करूगा। अपने से जुडे घटना से मैं’ को अलग आकर देखना चिंतन है और जब उसमें मैं जोड़ कर रखेंगें तो चिन्ता शुरू हो जायेगी। हम न भी चाहें तो दोनों में से काम तो होगा ही क्योंकि हमारे अन्दर मन, बुद्धि और अंहकार ऎसी प्रकृतियां जो अपना काम करेंगी ही हम चाहे या न चाहे।

हुआ यह कि मैं कुछ दिन पहले ऐक मंदिर में गया। उस मंदिर में अक्सर जाता हूँ। यह मंदिर शहर के मध्य भाग में स्थित है और इसके चारों और ऐक बहुत बडा पार्क है। यह मंदिर बहुत पुराना और आज भी देखने में आकर्षक है पर वहाँ लोगों कम ही आते हैं। शहर में अन्य भी अनेक आकर्षक मंदिर हैं और यह उनसे कम नहीं है, पर क्योंकि इसके पास लोगों की रिहायश कम है और शायद यही कारण है कि प्रसाद और माला के लिए दुकाने कम होने से लोग यहाँ कम आते हैं। मंदिर के चारों और बने पार्क में बहुत संख्या में घुमते हैं पर उस मंदिर में फिर भी नहीं जाते क्योंकि भगवान के दरबार में जाने वाले लोगों के मन में प्रसाद और माला ले जाने की इच्छा होती है और कोई अपने घर या बाजार से लेने की बजाय उसी जगह खरीदना चाहता है जहाँ मंदिर स्थित होता है और चूंकि इसके आसपास सरकारी नियंत्रण इतना कडा है कि कोई अतिक्रमण कर वहां दुकान बना ही नही सकता। हालांकि पार्क की दृष्टि से यह अच्छा भी है कि वहाँ किसी प्रकार का गंदगी नहीं होती।मैं अपने परिवार के साथ वहां जाता हूँ पर मंदिर में अकेला ही जाता हूँ कोई साथ नहीं चलता। क्योंकि उस मंदिर के सिद्ध होने की चर्चा कहीं भी नहीं होती है और अपने देश के लोगों का नियम है जिसमें चमत्कार कराने की शक्ति नही होती उसे नमस्कार नही करते। वैसे तो कोई चमत्कार नहीं करता पर उसके लिए प्रसिद्ध तो उसे होना ही चाहिए भले ही उसके पीछे पाखंड होता हो ।

बहरहाल उस दिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो भारी भीड़ थी तो मुझे आश्चर्य हुआ। अचानक हमारी श्रीमती जी बोली आज इस मंदिर में भगवान जी की मूर्ति को करोडों रुपये के जेवर पहनाये जायेंगे, इसलिए लोग उसे अधिक संख्या में आ रहे हैं। यह गहने बहुत दिन से कहीं रखें हुए थे और इन्हें बरसों से पहनाया नहीं गया।’

मैं हैरान रह गया. जिनके भगवान् के दर्शन आसानी से कर लेता था उनके लिए मुझे हजार लोगों की लाइन में खडा होना था। वहाँ मेरा एक मित्र-जो अपनी पत्नी को दर्शन कराने के लिए लाया था- भी मिल गया और बोला-“चलो लाइन में लगते हैं।”
मैंने कहा-‘नहीं मैं तो बाहर से हाथ जोड़कर जा रहा हूँ। मैं तो शनिवार को अक्सर आता हूँ।’

तो वह बोला-”कल तो गहने उतार लिए जायेंगे। आज खास दिन है, इसलिए गहने पहनाये गए हैं और लोग वही गहने देखने के लिए आ रहे हैं।’

मैंने कहा-”यह मेरी श्रद्धा का मामला है। मैं तो इस मंदिर में ध्यान लगाने जाता हूँ। गहनों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। इतनी भीड़ में खड़े होने के लिए मेरा अंतर्मन इजाजत नहीं देता।’

तब उसने मेरी और अपनी पत्नी को लाइन में खड़े होकर दर्शन करने का सुझाव दिया। मेरी स्वीकृति से पहले ही दोनों एक स्वर में बोलीं-”हाँ हम जाते हैं।”
मैंने और मेरे मित्र ने बाहर से हाथ जोड़कर अपने भाव व्यक्त किये और दूर खड़े होकर नजारा देखने लगे। इतनी भीड़ देखकर मैंने अपने मित्र से कहा-‘ भगवान् की मूर्ति पूजने से मानसिक लाभ होते हैं यह तो मैं भी मानता हूँ, पर इस तरह गहने पहनाना और उसे देखने के लिए लोगों की आतुरता देखकर तो यही लगता है कि लोग अपने धर्म और आध्यात्म को समझते ही नहीं।’
मेरे मित्र ने कहा-”लोगों को यह पता ही नहीं है कि धर्म है क्या? वह तो केवल कर्मकांडों को कर यही समझते हैं कि वही धर्म हैं। असल में मैं तुम्हारी इस बात से सहमत हूँ जो तुम अक्सर कहते हों कि झगडा धर्मों का नहीं बल्कि कर्मकांडों का है,इस बात से सहमत हूँ।लोग पूजा और दर्शन केवल औपचारिकतावश ही कर यह सोचते हैं कि हो गया धर्म का निर्वाह।’

लोग हजारों की संख्या में आ रहे थे और सबके जुबान पर गहनों की बात थी। उस दिन मैं पहली बार यह देख रहा था कि भक्त नहीं बल्कि दर्शक आ रहे थे। वह जो सब खेल रचता है उसे ही खिलौना समझने की गलती कर रहे थे। दोनों स्त्रियाँ लाइन के बीच में घुसकर दर्शन करे आयीं। उसके बात हम घर लौटे। सच बात है कि भगवान की मूर्तियों को पूजने का लाभ तभी है जब उसे अपने मन में धारण करें। विभिन्न धातुओं या पत्थरों को तराश कर उनमें मानवीय अंगों की आकृति रचकर मूर्तियों को इसलिए बनाया गया है कि उनमें जीवन्तता की अनुभूति हो सके और उसे धारण कर अपने मन को पवित्र कर सकें पर लोग इस बात को नहीं समझते। उन्हें तो बस चमत्कार चाहिए। अगर कोई खाली पत्थर भी चमत्कारी घोषित कर दिया जाये तो लोग उसे पूजने लगेंगे। विश्वास और श्रद्धा किसी के मन में नहीं दिखाई देती बस चमत्कार और आकर्षण की आस में इधर-उधर भटकते हैं।

कभी-कभी ऐसा भी समय आता है


कभी दिन खराब हो सकता है और तो कभी समय! ऐसे में दिमाग मी तनाव आता है पर अगर हम मान लें की जब अच्छा समय नहीं रहा तो बुरा समय भी नहीं रहेगा तो अपने अन्दर आत्मविश्वास उत्पन्न हो जाता है।

हुआ यूं कि एक शाम मैं एटीएम से पैसे निकालता भूल गया। रात को एक बार ख्याल आया कि जाकर पैसे निकाल लाऊँ पर फिर आलस्य आ गया। आज सुबह जब मैं घर से निकला तो मेरे में ढाई सौ रूपये थे। स्कूटर पर मैं अपने काम से इधर-उधर चलता गया। कई जगह एटीएम मिलने के बावजूद यह सोचता रहा कि अभी तो मेरे पास समय है और काम समाप्त करने के बाद निकाल लूंगा। होते-होते शाम हो गई और घर वापस लौटने का समय हो गया और फिर मैं एक एटीएम में गया तो वहाँ भीड़ थी। तब मुझे ध्यान आया कि आज एक तारीख को वेतन आदि के भुगतान का समय होने के कारण भीड़ अधिक रहती है। अब मेरा माथा ठनका। मैं अन्य भी एटीएम पर गया पर पर सब जगह भीड़ थी। आखिर एक एटीएम पर मन मसोस कर रुकना पडा सोचा-‘आज पैसे निकालना जरूरी है, अब जितनी बडी लाइन है उसमें लग ही जाता हूँ।

वहाँ एक बार तो एटीएम मशीन लोगों के कार्ड को तो स्वीकार नहीं कर रहा था और दूसरी बार पर करने पर ही काम चल रहा था। लोग पैसे क्या निकाल रहे थे। कहा जाये कि जूझ रहे थे। कुछ लोगों ने अपने नोट गिने तो पांच-पांच सौ से नोट भी पन्नी से जुडे हुए थे। मतलब वह कटे-फटे नोटों की श्रेणी के थे पर एटीएम से निकल रहे थे। अब मेरा माथा ठनका। हालांकि लोग कह रहे थे कि ‘बाद में बैंक इसे बदल देगा।’

अब समस्या थी कि उस एटीएम के रास्ते पर मेरा प्रतिदिन का आना-जाना नहीं होता। भला मैं कब वहाँ नोट बदलवाने आता? मैंने निर्णय लिया कि अब तो कल ही पैसे निकाल लूंगा। अपने स्कूटर पर वहाँ भी चल पडा। एक रास्ते पर मैं उलटा चल पडा और इसकी वजह से पडा और थोडा रास्ता तय किया तो सामने से आ रहे ट्रैफिक में फंस गया और आगे ट्रेफिक वैन मैं कि खडे देखा। मुझे लगा कि वहाँ से किसी की मुझ पर नजर पड़ सकती है इसलिए तत्काल एक नमकीन की दुकान की तरफ मुड़ गया ताकि किसी ने देखा हो उसको लगे के मैं वहाँ कुछ खरीदने के रुका हूँ। स्कूटर खडा कर उससे आधा किलो नमकीन खरीद लिया जिसमें मुझे चालीस रूपये खर्च करना पडा। अब मैं वहीं से स्कूटर लेकर निकला सीधे रास्ते चला। थोडा आगे चला तो स्कूटर का साइलेंसर खराब हो गया और वह भयानक आवाज करने लगा। किसी तरह तीन किलोमीटर चलने पर एक मैकनिक मिला। उससे वह स्कूटर ठीक कराया। जब स्कूटर खराब हुआ तो मैं सोच रहा था कि काश मेरे पास अधिक पैसे होते! हालांकि थोडी देर के तनाव आया पर मैं जल्दी अपने पर यह सोचकर नियंत्रण पाया कि” आखिर समय और दिन है। कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है-“।

जो बात मेरे मन में आई और उस पर मैं स्वयं भी मुस्काया कि’पैसे का महत्त्व है या नहीं यह अलग चिंतन का विषय है पर इसमें कोई शक नहीं है कि वह आदमी के लिए आत्मविश्वास का बहुत बड़ा स्त्रोत होता है, इसलिए अपनी जेब पर भी नजर रखना चाहिए कि वह उसमें पर्याप्त मात्रा में हो।

चाणक्य वाणी: तिनकों की एकता (chankya vani-tikon ki ekta)


                 पाश्चात्य संस्कृति के प्रवाह तले हमारे देश की अध्यात्मिक संस्कृति मान्यताऐं रौंदी जा रही हैं। अंग्रेजी शिक्षा से ओतप्रोत देश की शिक्षा और नियम बनाने वाले विधाता कुछ विदेशी तो कुछ देशी मान्यताओं के मिक्चर से समाज को नमकीन की तरह सजा रहे हैं। ऐसे में संयुक्त परिवार को विघटन हुआ है। सभी लोगों ने स्वयं के विकास को ही आत्मनिर्भरता का प्रमाण मान लिया है। दूसरे के साथ संयुक्त उपक्रम सभी को गुलामी जैसा लगता है। परिवार की परिभाषा या सीमा माता पिता और बच्चे तक ही सिमट गयी है। दादा, दादी और चाचा चाची अब परिवार के बाहर हो गये हैं। भाई और भाई का संयुक्त उपक्रम में काम करना अब उस पुरानी परंपरा का हिस्सा मान लिया गया है जिसकी आवश्यकता अब अनुभव नहीं की जाती। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह कि पिता के साथ पुत्र का संयुक्त उपक्रम होना उसके कमजोर व्यक्तित्व का प्रमाण माना जाता है। हर कोई यह चाहता है कि उसका दामाद स्वतंत्र उपक्रम वाला हो। भाई या पिता के साथ संयुक्त उपक्रम होने पर उसे गुलाम की तरह देखा जाता है।
           यही स्थिति आधुनिक महिलाओं की भी है। वह पति को स्वतंत्र उपक्रम का स्वामी या फिर किसी कार्यालय में अधिकारी के रूप में देखना चाहती हैं। इसके अलावा भी ढेर सारे कारण है जिससे हमारा समाज और राष्ट्र कमजोर हो रहा है।
          एकता के विषय पर चाणक्य नीति में कहा गया है कि 
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             बहुनां चैव सत्वानां समवायो रिपुंजयः।
             वर्षधाराधरो मेधस्तृणैरपि निवार्यते।।
           ‘‘बहुत लोगों के समूह में एकता होने की वजह अपने शत्रुओं को परास्त करने की शक्ति होती है। उसी तरह जैसे वर्षा की धारा प्रवाहित करने वाला बादल को तिनकों का समूह झौंपड़ी में प्रवेश से रोक लेता है।
                एक बात निश्चित रूप से तय है कि व्यक्ति अपने परिवार या समाज से मिलकर ही शक्तिशाली होता है और साथ ही यह भी सच है कि व्यक्ति के मजबूत होने से परिवार, परिवार से समाज, और समाज से राष्ट्र मजबूत होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति से राष्ट्र और राष्ट्र से व्यक्ति शक्तिशाली होता है पर इसके लिये जरूरी है कि लोगों की आपस में एकता है जो कि निज स्वार्थ पूर्ति के भाव तथा अहंकार के चलते नहीं हो पाती। यही कारण है कि आज हम अपने राष्ट्र में लोगों में अकेलेपन का तनाव बढ़ता देख रहे हैं।
            अगर हम चाहते हैं कि राष्ट्र शक्तिशाली हो तो व्यक्तियों को मजबूत होना पड़ेगा जिसके लिये यह जरूरी है कि लोग स्वयं में एकता के साथ काम करे।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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