आधुनिक लोकतंत्र से मेल करती धार्मिक संस्थायें-हिन्दी चिंत्तन लेख


            भारत में अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार भक्ति के साकार और निराकार दो रूप माने गये हैं।  इसका कारण यह है कि निरंकार की भक्ति केवल ज्ञानी कर सकते हैं जबकि सामान्य मनुष्य साकार भक्ति से ही सहजता का अनुभव करता है।  हालांकि भ्रमवश कहा जाता है कि भारतीय धर्म मूर्तिपूजा के समर्थक हैं पर अध्यात्मिक साधक यह जानते हैं कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन किसी भी अन्य की अपेक्षा कहीं अधिक परिपूर्ण है इसी कारण ही उसमें दोनों धाराओं को समान महत्व दिया गया है।

            बहरहाल साकार भक्ति करने वालों की इंद्रियां बाहर अधिक सक्रिय रहती हैं जिसका लाभ व्यवसायिक लोग आसानी से उठाते हैं।  यही कारण है कि हमारे समाज में सदियों से धार्मिक कार्यक्रमों की भी दो धारायें चलती आयी हैं एक तो एकांत साधना और दूसरा सत्संगहै-यानी सामूहिक रूप से साधना जिसे पेशेवर लोग संचालित करते हुए समाज में श्रेष्ठ कहलाने के साथ ही धन भी प्राप्त करते हैं।  हम यहां किसी के पेशेवर होने पर आक्षेप नहीं कर रहे क्योंकि कहीं न कहीं यह लोग भी जाने  अनजाने भारतीय अध्यात्म दर्शन की वह धारा प्रवाहित करते रहे जिससे वह अभी तक बहता चला आ रहा है।

            हम तो इसी पेशेवर धार्मिक धारा के उस पक्ष पर चर्चा कर रहे हैं जो वाकई दिलचस्प है।  जब हम छोटे थे तो संतों के साथ महाराज, गुरुजी तथा स्वामी जी जैसी उपाधियां लगी देखते थे।  उस समय महाराज शब्द राजाओं के लिये प्रयुक्त होता था और अधिकतर सामूहिक धार्मिक धारा के वाहक यही उपाधि ग्रहण करते थे। अब लोकतंत्र आ गया है तो सरकार शब्द अधिक लोकप्रिय हो गया है।  अनेेक नये धार्मिक शिखर पुरुषों के शिष्य उनके साथ सरकार शब्द का प्रयोग करते हैं।  पहले राजाओं के दरबार होते थे हमारे पेशेवर संत भी लगाते थे। हमारे लोकतंत्र में भारतीय संसद का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। उसकी लोकप्रियता देखकर अब धार्मिक पेशेवर अपने सम्मेलनों को संसद कहने लगे हैं।  इतना ही नहीं अनेक कथित महापुरुष तो अब अपना जन्मदिन भी मनाने लगे हैं ताकि अपने शिष्यों के समूह का प्रदर्शन कर समाज में अपना प्रभाव बनाया जा सके।

            ब्रिटेन की एक संस्था ने भारतीय धार्मिक संस्थाओं के बारे में कहा था कि वह व्यवसायिक कंपनियों की तरह चलती हैं। उस समय कुछ लोगों ने विवाद खड़ा किया पर सच यही है कि हमारे देश में पेशेवर धारा की धार्मिक संस्थाओं ने  जिस तरह अपने संगठन का संचालन किया है वह बिना प्रबंध कौशल के संभव नही है। यह अलग बात है कि कोई इसे स्वीकार नहीं कर सकता। सच बात तो यह है कि हिन्दी पत्र पत्रिकाओं की लोकप्रियता अब नहीं बढ़ रही है तो इसका कारण इन्हीं धार्मिक संस्थाओं के प्रकाशन है जो समर्पित शिष्यों के माध्यम से आमजन के पास पहुंचती है। कहा जाता है कि  अनेक धार्मिक शिखर पुरुषों की  संस्थायें छद्म रूप से अपने टीवी चैनल भी चला रही हैं।

            हम यह तत्वज्ञान की चर्चा नहीं कर रहे पर इतना मानते हैं कि इस तरह के व्यवसायिक प्रयास आमजन के हृ  दय तक नहीं पहुंच पाते।  आमजन एकांत में स्वाध्याय या चिंत्तन करना नहीं चाहते पर अध्यात्मिक की भूख भी उनको लगती है। इसलिये वह इन पेशेवर धार्मिक गुरुओं के पास चला जाता है। वहां कथा के दौरान नृत्य, संगीत और भजन सुनकर भी उसे कुछ देर स्वयं ही इर्दगिर्द बुने सांसरिक जाल से मुक्ति मिल जाती है। यह एक तरह से मनोरंजन का रूप ही होता है।  योग विज्ञान की दृष्टि से इस तरह का परिवर्तन भी क्षणिक रूप से ही सही लाभदायक तो होता ही है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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