अपना दर्द-हिंदी कविता


शहर में सजती  महफिलों में हम बस यूं ही जाते रहे,

खुद रहे उदास हमेशा, लोगो का दिल  बहलाते रहे।

जिंदगी से टूटे इंसान अपनी जोड़ी दौलत दिखलाते

खुशी नहीं पायी कभी, काले बालों में सफेदी लाते रहे।

अपनी हंसी दूसरों के दर्द से बहते आंसुओं में ढूंढते

अपने दिल के दर्द की क्या दवा पाते, उसे छिपाते रहे।

कहें दीपक बापू जिंदगी की कहानी सभी की एक जैसी

चेहरे बदलते देखकर  अदाओं मे यूं ही  नयापन पाते रहे।

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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • piyush  On 24/08/2013 at 21:57

    very nice …….i like…….

  • बिखरे हमारे आसू बी कुछ ऐसे।। बीना मोसम के बी अब तो बादल रोते हो जेसे। जिंदगी की तरह हमारी जुबा बी खामोश हो जाती हे कबी। हम बी गेरो का सहारा लेते हे तबी। हमारी किताबो में कितना दर्द छिपा हे जानते हो सभी। हम वो सब बया नही कर पाएंगे। बया किया दर्द तो बीते हुवे लम्हों को याद कर के मर जायेंगे।।।।। द्वारा।।मुकेश

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