कुसंग से सारे काम बिगड़ जाते हैं-तुलसी दास के दोहे (tulsidas ke dohe-kusang se sare kam bigad jate hain)


 

 

       जिन लोगों को अपना जीवन सहजता, सरलता तथा सम्मान के साथ बिताना है उन्हें अन्य काम करने की बजाय केवल अपनी संगत पर ही आत्ममंथन करना चाहिये। गलत आदमी की संगत कभी भी सुफल देने वाली नहीं होती।  अक्सर अनेक लोग गलत आदमी की संगत करते हुए यह सोचते हैं कि हमारा कोई भी मित्र हो उससे हमें क्या परेशानी? वह अच्छा हो या बुरा? उसका आचरण उसकी समस्या है।  यह गलत सोच है।  जब आप समाज में विचरते हैं तो यह भी देखा जाता है कि आपकी संगत किन लोगों से है। जिन लोगों ने आपका व्यवहार नहीं देखा है वह केवल आपकी संगत देखकर ही आपके व्यक्तित्व पर विचार करते हैं। ऐसे में दुष्ट, क्रूर तथा अपराधी से आपका संबंध आपकी छवि बिगाड़ देता है।

कविवर तुलसीदास  कहते हैं कि

 

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तुलसीकिएं कुंसग थिति,  होहिं दाहिने बाम।

 

कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल, रत हरि संकंर नाम।

 

       सामान्य भाषा  से भावार्थ-कुसंग करने से महत्वपूर्ण लोग भी बदनामी प्राप्त करते हैं।  वह अपनी प्रभुता गंवाकर लघुता को प्राप्त करते हैं।  यदि किसी स्त्री पुरुष का नाम देवी देवता के नाम पर रखा जाये पर बुरी संगत होने के कारण वह भी अप्रतिष्ठत हो जाते हैं।  उनका नाम कहीं भी सम्मान से नहीं लिया जाता।

 

बसि कुसंग  चाह सुजनता, ताकी आस निरास।

 

तीरथहू को नाम भो, गया मगह के पास।

 

           सामान्य भाषा में भावार्थ-जब कोई कुसंग करने के बावजूद अपने काम में सफलता और प्रतिष्ठा के लिये निहारता है तो उसकी कामना पूरी नहीं होती।  कुसंग की वजह से न केवल बनते हुए काम  बिगड़ते हैं बल्कि समाज में बदनामी भी होती है। मगध के पास होने के कारण विष्णुपद तीर्थ का नाम भी गया पड़ गया।

       दूसरी बात यह भी है कि हम चाहें या न नहीं हम पर संगत का प्रभाव पड़ता ही है।  जब हम किसी व्यसनी, असामाजिक तत्व या पाखंडी से संगत करते हैं तो उसके प्रति हमारे हृदय में नकारात्मक भाव पैदा होता है। इसके विपरीत अब हम किसी ईमानदार, आचरणवान तथा सहज भाव के व्यक्ति से संपर्क करते हैं तो उसके प्रति सकारात्मक भाव पैदा होता है। नकारात्मक भाव से मन में क्लेश होता है तो सकारात्मक भाव प्रसन्नता देने वाला होता है।  इतना ही नहीं अनेक लोग कुंसगियों के संगत में रहते हुए भी अपराध न करते हुए अपने कुसंगियों के साथ रहने के कारण ही फंस जाते हैं।  किसी व्यक्ति के अपराध करने पर सबसे पहले उसके मित्रों पर दृष्टि जाती हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि अपनी संगत पर हमेशा ही विचार करते रहना चाहिये। जिन लोगों के आचरण में दोष है उनसे दूरी बनाना अपने लिये ही श्रेयस्कर है।

     

 

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’

Gwalior, Madhya Pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

 

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