प्रचार माध्यम अपने बलबूते पर देश में बदलाव नहीं ला सकते-हिन्दी लेख


        देश में प्रचार माध्यमों की ताकत हमेशा ही रही है।  वैसे इस बात का आभास अब अधिक हो रहा है। देश में किसी भी विषय पर अपने व्यवसायिक हितों के अनुसार आम लोगों में सकारात्मक दृष्टिकोण का निर्माण या विध्वंस करना इन प्रचार माध्यमों के लिये सहज हो गया है।  पहले अखबार हुआ करते थे तब उनका प्रभाव इतना तीव्रतर नहीं था पर अब टीवी चैनलों और एफ एम रेडियो का न केवल तीव्र गति से लोगों के अंदर अपने विचारों को लोगों के दिमाग में समाविष्ट करा देते हैं वरऩ उसके वैचारिक प्रवाह तथा प्रभाव में नियमितता भी बनाये रखते हैं।  अखबार एक बार प्रकाशित होने के बाद चौबीस घंटे के बाद सामने आता है जबकि टीवी चैनल और  एफ एम रेडियो हर पल लोगों से जुड़े रहते हैं। यही नियमितता उनको कई गुना शक्ति देती है।
       किस विषय को देशभक्ति से जोड़ना है और किसे अलग हटाना है तथा किस  पर संवदेनाओ को भुनाना है और किसमे  निर्लिप्त्ता का भाव रखना है, यह विषय देखकर   प्रचार माध्यम अब बेहिचक अपने हितों के अनुकूल  व्यवसायिक रणनीति बदलते रहते हैं।  ऐसा लगता है कि देश के लोगों को एक समूह में एकत्रित कर अपनी तरफ निरंतर आकर्षित करने के लिये प्रचार माध्यम जीतोड़ प्रयास कर रहे हैं।  अपने व्यवसायिक हितों के अनुसार किसी छोटे आंदोलन को राष्ट्रव्यापी और राष्ट्रव्यापी को सीमित विचार या क्षेत्र का बताने में प्रचार माध्यमों ने महारथ हासिल कर ली है।  जहां सनसनी हो वहां तो यह प्रचार माध्यम खुलकर आक्रामक हो जाते हैं वहीं हादसों पर रुदन का सामूहिक आयोजन करने में भी देर नहीं करते।
            हमने ऐसी कई खबरें देखी हैं जो पहले भी घटती थीं। पढ़ने पर आम पाठक उत्तेजित होते पर  प्रचार माध्यम उनको छोटी कर छापते थे।  अब ऐसी  स्थिति देखते हैं कि उसी प्रकार की  खबरों से कई दिन तक उत्तेजना फैलाने के लिये यह प्रचार माध्यम तत्पर होते है।  वजह साफ है कि समाचार और बहसों के दौरान विज्ञापन का समय खूब पास होता हैं।
      कुछ लोग कहते हैं कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी है। यह एक तर्क है  पर व्यवहार में हम देखें तो यह आजादी प्रचार माध्यमों के केवल व्यवसायिक हितों तक ही सीमित है। स्वतः प्रकट होने वाली खबरों को देना और उन पर परंपरागत रूप से  प्रतिष्ठित विद्वान बुलाकर बहस करना ही केवल अभिव्यक्ति नहीं है।  उनकी इस बहस में विचारों की संकीर्णता अनेक बार देखी जा सकती है। आम लोगों के उत्तेजित बयानों से स्वयं को जिम्मेदारी से प्रथक रखते  हुए समाचार बनाना इस बात का प्रतीक है कि कहीं न कहीं प्रचार माध्यम अपनी व्यवसायिक बाध्यताओं से बंधे हुए है।
    बहरहाल हम प्रचार माध्यमों पर आक्षेप करने के साथ ही  समाज की स्थिति पर भी देखें।  हैरानी इस बात की है कि किसी घटना विशेष  पर लोग अपनी तरफ से अपने मस्तिष्क में विचार निर्माण करने की बजाय इन्हीं प्रचार माध्यमों के विचार या राय से आगे बढ़ते हैं।  जब कोई घटना इन प्रचार माध्यमों की वजह से अधिक चर्चित होती है तब हम आम लोगों की क्या कहें विशिष्ट लोग भी अपनी बात कहने के लिये आतुर होने लगते हैं।  सभी को लगता है कि कहीं उस घटना पर प्रतिक्रिया नहीं दी तो लोग उन्हें समाज या धर्म सेवा से निवृत्त हुआ मान लेंगे और दोबारा छवि निर्माण उनके लिये कठिन है। जिस तरह फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्रियां लगातार फिल्म इसलिये  करते रहना चाहते हैं कि कहीं उनकी दर्शकों में छवि विस्मृत न हो जाये या फिर पत्रकार निरंतर खबरों के साथ सक्रिय रहते हैं कि कहीं उनके स्वामियों में उनकी निष्क्रिय छवि बनी रहे या फिर वकालत करने वाले लोग अपने काम में इस तरह लगे रहते हैं कि कहीं उनके पास मुकदमें कम न हो ताकि कहीं उनके अभ्यास अवरुद्ध  होने पर लोग उनकी योग्यता पर संदेह न करने लगें, उसी तरह समाज, धर्म, कला और बौद्धिक कर्म करने वाले लोग भी हर विषय पर प्रतिक्रिया के लिये  इस उद्देश्य से अपना श्रीमुख तैयार किये रहते हैं कि कहीं उनके अनुयायी उनके स्वास्थ्य या भावना पर संदेह न करने लगें।  यह स्थिति दयनीय है।
          ऐसे में कभी कभी तो यह लगता है कि अगर हम अखबार न पढ़ें या समाचार टीवी चैनल न देखें तो शायद अत्यंत प्रसन्नचित रहेंगे।  एक समय था जब अखबार या टीवी देखकर उनके विषयों से प्रभावित थे।  उनसे अपने अंदर विचारों का निर्माण या विध्वंस होता था मगर तब उनकी सामग्री चिंत्तनपरक थी।  अब वह वह अनर्गल चिंत्तन दर्शकों और पाठकों पर थोपते हैं।  पहले अनेक अखबार अपने संपादकीयों में जनता की आवाज को स्थान देते थे जबकि टीवी चैनल यह मानकर चलते हैं कि इस देश में लोग बाह्य प्रभाव से ही  केवल हंसना या रोना जानते हैं।  उनके पास अपना सोचने के लिये कुछ नहीं है।  हंसने के नाम पर फुहड़पन तो रोने के नाम पर हादसे लोगों के सामने लाये जा रहे हैं।  ऐसा नहीं है कि सभी प्रचार माध्यम  कोई चिंत्तनपरक सामग्री नहीं दे रहे पर मुख्य बात यह है कि वह उसकी प्रस्तुति को हल्का बना देते हैं या फिर उसको स्वयं ही एक महत्वहीन सामग्री बताते हैं।  उससे भी बुरी बात यह कि वह हिन्दी के नाम हिंग्लिश लाद रहे हैं।  उनके लिये शहरों में पढ़ रही युवा पीढ़ी ही उनकी प्रयोक्ता है।  वह उसी से ही कमाना चाहते हैं।  अनावश्यक रूप से अंग्रेजी शब्दों का उपयोग उनके द्वारा प्रकाशित या प्रसारित सामग्री को भद्दा बना रही है यह उनको कोई समझा नहीं सकता।  इस तरह वह भारतीय समाज से अपना आत्मीय भाव खो रहे हैं।  हम जैसे उन पाठकों को जो अपने प्रचार माध्यमों से आत्मीय भाव रखते रहे हैं अब उनसे दूरी अनुभव करने लगे हैं।  यही कारण है कि उनकी देशभक्ति में व्यवसायिकता का पुट दिखने लगा है।  उनका रुदन और हंसना दोनो ही अब हमें प्रभावित नहीं करता।  यही कारण है कि हम अपने जज़्बात अंतर्जाल पर लिखकर भाषा, समाज तथा धर्म के प्रति अपने आत्मीय भाव को जिंदा रखने का प्रयास करते रहते हैं, जो इन्हीं प्रचार माध्यमों ने कभी पैदा किया था।  इन सबके बावजूद एक बात तय है कि इन प्रचार माध्यामों के प्रभाव में पूरा देश है यह अलग बात है कि उसमें सकारात्मक जन चेतना पैदा करने के लिये जो कुशल प्रबंध चाहिये वह उनके पास नहीं है।  वह भाव उभार सकते हैं पर स्थाई चेतना का निर्माण नहीं कर सकते।
लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर

jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior

http://zeedipak.blogspot.com

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