मकर सक्रांति पर इलाहाबाद में महाकुंभ का प्रारंभ -हिंदी लेख और चिंत्तन


         मकर सक्रांति पर इलाहाबाद में महाकुंभ प्रारंभ हो गया।  यह बरसों पुरानी पंरपरा है और भारतीय संस्कृति का ऐक ऐसा हिस्सा है जिसे देखकर कोई  भी विदेशी चमत्कृत हो सकता है।  जहां तक भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का प्रश्न है उसकी दृष्टि से इसे सकाम भक्ति का प्रतीक माना जा सकता है। गंगा में नहाने से पुण्य मिलता है यही सोचकर अनेक श्रद्धालु इसमें नहाते हैं।  अनेक निष्काम श्रद्धालु भी हो सकते हैं जो मकर सक्रांति में गंगा में यह सोच नहाते हैं कि पुण्य मिले या नहंी हमें तो इसमें नहाना है।  इससे उनको मानसिक शांति मिलती है।  श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने वाले ज्ञान साधक किसी भी प्रकार की भक्ति पद्धति का विरोध नहीं करते भले ही वह उनके हृदय के प्रतिकूल हो।

     यह तय है कि इस संसार में दो प्रकृति के लोग-असुर और दैवीय-रहेंगे।  चार प्रकार के भक्त-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी-भी यहां देखे जा सकते हैं।  उसी प्रकार त्रिगुणमयी माया -सात्विक, राजसी और तामसी-के वशीभूत होकर लोग यहां विचरण करेंगे। इसे परे कुछ योगी भी होंगे पर उनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक होगी, यह भी  अंतिम सत्य है।  अंतर इतना रह जाता है कि ज्ञानी लोग मूल तत्वों को जानते है इसलिये सहअस्तित्व की भावना के साथ रहते हैं जबकि अज्ञानी अहंकारवश सभी को अपने जैसा दिखने के लिये प्रेरित करते हैं।  जो कुंभ में नहाने गये वह श्रेष्ठ हैं पर जो नहीं करने गये वह बुरे हैं यह भी बात नहीं होना चाहिए।

            जिन्कों भारतीय संस्कृति में दोष दिखते हैं उनके लिये यह कुंभ केवल एक पाखंड है।  ऐसी दोषदृष्टि रखने वाले अज्ञानियों से विवाद करना व्यर्थ हैै।  उन अज्ञानियों के अपने खोजे गये सांसरिक सत्य हैं पर अध्यात्मिक सिद्धि की समझ से उनका वास्ता कभी हो नहीं सकता क्योंकि उनके अहंकार इतना भरा है कि जैसे कि इस विश्व को बदलने की भारी श्ािक्त उनके पास है।

        बहरहाल अब अपनी बात गंगा और इलाहाबाद के महाकुंभ पर भी कर लें।  समाचार आया कि गंगा के प्रदूषित जल की वजह से नाराज चारों शंकराचार्य वहां नहीं आये।  उनके न आने के बावजूद इस खबर की परवाह किये बिना श्रद्धालू लोग नहाने पहुंचें।  शंकराचार्य आये या नहीं इसमें बहुत ही कम लोगों की दिलचस्पी  दिखाई।  यह उन लोगों के लिये बहुत निराशाजनक है जो हिन्दू धर्म को एक संगठित समूह में देखना चाहते हैं।  दरअसल विदेशी धर्मो को जिस तरह एक संगठन का रूप दिया गया है उससे प्रेरित कुछ हिन्दू धार्मिक विद्वान चाहते हैं कि हमारा समूह भी ऐसा बने।  यह हो नहीं पा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे धर्म के सांस्कृतिक भिन्नताये बहुत हैं।  भौगोलिक और आर्थिक स्थिति के अनुसार भोजन, रहन सहन और कार्य शैली में भिन्नतायें हैं।  मुख्य बात यह कि अपने  अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार  मानते हैं कि सारे विश्व के लोग एक जैसे नहीं बन सकते। इसके विपरीत विदेशी धर्मों के प्रचारक यह दावा करते हैं कि वह एकदिन सारे संसार को अपनी धार्मिक छतरी के अंदर लाकर ही मानेंगे।   इसके विपरीत हमारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन मानता है कि सभी मनुष्यों के साथ अन्व जीवों पर भी समान दृष्टि रखना चाहिये जबकि विदेशी धर्म प्रचारक यह दावा करते हैं कि हम तो सारे विश्व के लोगों को एक ही रंग में रंगेंगे ताकि उन पर सभी समान दृष्टि स्वतः पड़ेगी।   हम उन पर आक्षेप नहीं करते पर सच्चाई यह है कि पश्चिमी में सदियों से चल रही धार्मिक वैमनस्य की भावना ने हमारे देश को भी घेर लिया है।  भारत में कभी भी जातीय और धार्मिक संघर्ष का इतिहास नहीं मिलता जबकि विदेशों में धार्मिकता के आधार पर अनेक संघर्ष हो चुके हैं।

       बहरहाल समस्त भारतीय धर्म व्यक्ति के आधार पर वैसे ही संगठित हैं उनको किसी औपचारिक संगठन की आवश्यकता नहीं है।  अभी तो ढेर सारे प्रचार माध्यम हैं जब नहीं थे तब भी लाखों लोग इन कुंभों में पहुंचते थे। यह सब व्यक्ति आधारित संगठन का ही परिणाम है।  हमारे जो बुद्धिमान लोग हिन्दू धर्म को असंगठित मानते हैं उन्हें यह समझना चाहिये कि विदेशी विचाराधारायें पद पर आधारित संगठनों के सहारे चलती हैं।  चुने हुए लोग  पदासीन होकर भगवत्रूप होने का दावा प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा  वहां  पहले राष्ट्र फिर   समाज और अंत में  व्यक्ति आता  है जबकि हमारे यहां व्यक्ति पहले समाज और फिर राष्ट्र का क्रम आता है।  हमारा राष्ट्र इसलिये मजबूत है क्योंकि व्यक्ति मजबूत है जबकि दूसरे राष्ट्रों के लड़खड़ाते ही उनके लोग भी कांपने लगते हैं। महाकुंभ में हर वर्ग, जाति, समाज, भाषा और क्षेत्र के लोग आते हैं। उनको किसी संगठन की आवश्यकता नहीं है।

     चारों शंकराचार्य  जिस गंगा के प्रदूषित होने पर दुःखी हैं वह कई बरसों से दूषित हो चुकी है। ‘राम तेरी गंगा मैली’ फिल्म प्रदर्शित हुए बरसों हो गये हैं। जब वह दूषित होना प्रारंभ हुई थी तब भी अखबारों में समाचार आने लगे थे।  तब हिन्दू धर्म को सगठित रखने का दावा करने वाले यह शंकराचार्य कहां थे?  उन्होंने उसे रोकने के लिये क्या प्रयास किया? क्या लोगों को प्रेरणा दी!  देश की हर छोटी बड़ी घटना पर अपना चेहरा दिखाने के आदी अनेक  धार्मिक पुरुष हो चुके हैं।  इनमें कुछ शंकराचार्य भी हैं।   गंगा के प्रदूषित होने के समाचार उन्होंने  न देखे या न सुने हों यह संभव नहीं है।  अब उनका दुःखी होना सामयिक रूप से प्रचार पाने के अलावा कोई अन्य प्रयास नहीं लगता।

        दरअसल देखा यह गया है कि हमारे अनेक धार्मिक पुरुषों के यजमान अब ऐसे पूंजीपति भी हैं जो उद्योग चलाते हैं।  गंगा में प्रदूषण उद्योगों के कारण फैला है।  अगर इन शंकराचार्यों के साथ मिलकर अन्य धार्मिक शिखर पुरुष कोई अभियान छेड़ते तो यकीन मानिये उनको मिलने वाले दान पर बुरा प्रभाव पड़ सकता था।  सच बात तो यह है कि हमारे धर्म का आधार तत्वज्ञान है और जो संगठन बने हैं उनका संचालन वह माया करती है जिस पर यह संसार आधारित है।  धर्म रक्षा धन से ही संभव का सिद्धांत अपनाना बुरा नहीं है पर उसको वैसा परिणामूलक नहीं बनाया जा सकता जिसकी चाहत हमारे धार्मिक शिखर पुरुष करते है।  वह तत्वज्ञान से ही संभव है पर उसमें रमने वाला आदमी फिर जिस आनंद के साथ जीता है उसे हम रैदास के इस कथन से जोड़ कर देखें ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ तो बात समझ में आ सकती है।

         बहरहाल इलाहाबाद महाकुंभ में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को शुभकामनायें तथा मकर सक्रांति के पर्व पर सभी ब्लॉग मित्रों, पाठकों और प्रशंसकों को बधाई।  हां, प्रशंसक भी जोड़ने पड़ेंगे क्योंकि अनेक लोग अक्सर लिखते हैं कि हम आपके लेखकीय रूप के प्रशंसक  हैं।  जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

 

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