धनतेरस पर चिन्त्तन-हिंदी लेख


                धनतेरस को खरीददारी करना शुभ माना जाता है।  जिसके पास जितना पैसा है उतना ही वह सामान खरीदता है।  बरसों से ऐसे अनेक त्यौहार चले आ रहे हैं।  भारतीय समाज  हमेशा ही महाधनी, धनी और अल्पधनी वर्ग में बंटा रहा है और सभी लोग अपने अपने स्तर के अनुसार त्यौहार मनाते हैं। हमने बरसों से देखा है कि शांति से पर्व मना लिये  जाते हैं पर जब से पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार और अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हुआ है शोर बहुत होने लगा है।  यह शायद इसलिये किया जाता है ताकि आमजन अपना विवेक खोकर पैसा खर्च करने लगें।  लोग बदहवास होकर खरीददारी करते हैं।  खरीदने के लिये यह बदहवासी समाज की प्राणशक्ति क्षीण होने का प्रमाण है।  भौतिकतावाद की यह नयी प्रवृत्ति है पर जो प्राचीन संस्कृति और पर्वों में घूल मिल गयी है। 
            ऐसे में कुछ हास्याप्रद घटनायें होती हैं जिन पर व्यंग्य लिखना वक्त खराब करना लगता है।  हम जैसे अनाम लेखकों के  बड़े  व्यंग्य इंटरनेट पर आजकल कौन पढ़ता है क्योंकि लोगों को लगता है कि इंटरनेट पर लिखना केवल बड़े लोगों का काम है।  प्रचार माध्यम ट्विटर पर बड़े लोगों की एक दो पंक्तियां को ही इस तरह उछलते हैं कि दूसरों की क्या कहें  हम भी अब भ्रमित हो गये हैं। ब्लॉग और फेसबुक पर यह सोचकर लिखते हैं गोया कि डायरी में लिख रहे हैं। कोई पढ़ नहीं रहा है।  ऐसे में धनतेरस के पर्व   को अध्यात्मिक विषय मानकर लिखना मुश्किल है।  धन तो माया का सर्वोत्तम रूप है और अध्यात्मिक ज्ञान में धन प्राप्ति के लिये कोई खास उपाय नहीं बताया गया है।  जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान नहंी है धन उनका वास्तविक भगवान है।  इस भाव में हम जैसा ज्ञानसाधक दोष नहीं देखता। दिल लगाने के लिये कोई बहाना मिलना चाहिए।  अगर आप कोई काम नहीं करेंगे तो जल्दी बुढ़ा जायेंगे।  अगर कोई काम करना चाहेंगे तो पहले मन में यह सवाल आयेगा कि हमें मिलेगा क्या? यह प्रश्न मनुष्य और मनुष्य में भेद करता है।  कहते हैं कि मनुष्य का स्वामी उसका मन है।  वही उसको चलाता है। ज्ञानी और साधक अपनी देह को नियमित संचालित करने के लिये हमेशा ही धन पर दृष्टि नहीं रखते क्योंकि उनकी दृष्टि में धन भी देह से जुड़े सांसरिक कार्य  का विस्तार भर  ही है। इधर से धन आया उधर गया।  अज्ञानी लोगों के पास ढेर सारा धन हो पर वह केवल इसलिये अकर्मणता का शिकार हो जाता है क्योंकि उसे कोई ऐसा काम नहीं मिलता जिसमें धन मिले।
      धनतेरस का संबंध धर्म से है और धर्म का संबंध कर्मकांड से है। कर्मकांड मनुष्य मन को तसल्ली देते हैं कि उन्होंने सर्वशक्तिमान को प्रसन्न किया अब उसका फल धन, पद और यश के रूप में मिलेगा।
       दीपक बापू रविवार को अध्यात्मिक दिवस मनाते हैं।  मंदिरों में जाकर ध्यान करना उनको अत्यंत प्रसन्नता प्रदान करता है।  मंदिरों के अंदर बाहर भीड़ थी।  दीपक बापू ने बाहर आकर देखा एक सज्जन अपने परिवार के साथ कार में जा रहे थे।  एक आदमी – जो गेरुए वस्त्र पहने था-  उनके अगले पहियों पर तिलक लगा रहा था। एक दो मिनट लगा होगा। कार मालिक ने अपनी जेब से कुछ पैसा निकाला उसको देने के साथ ही  मंदिर की तरफ मुंह कर हाथ जोड़े और चल पड़ा ।  तब तक सड़क पर  आवागमन बाधित रहा।  ऐसा लगता था कि पहले ही मोबाइल पर सूचना का आदान प्रदान हुआ होगा वरना वह आदमी दूसरी कारों पर ही ऐसा करता।
      सबसे ज्यादा मनोरंजन सांईं बाबा के मंदिरों में जाने पर मिलता  है।  जिनका  मन भगवान के परंपरागत रूपों से ऊब गया है उनके लिये सांईं बाबा का नाम  अब एक श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम बन गया है।  सांईं बाबा ने संसार की कई ऐसी वस्तुओं को देखा तक नहीं होगा जो उनके भक्त  अब उनके मंदिरों पर लेकर पहुंच रहे हैं।  उनकी दरबार के बाहर नये वाहनो की भीड़ लगी रहती है।  मंदिर के पुजारी भी उन वाहनों की पूजा करते हैं।  हैरानी होती है!  कहां सांई बाबा की वंदना और यह कहां लोहे लंगर की अर्चना।  दीपक बापू जैसे योग साधक तथा अध्यात्मिक ज्ञान के पाठक होने के साथ ही व्यंग्यकार होने की वजह से ऐसी घटनायें रोचक होती हैं।
                असल बात तो रहे जा रही थी।  मंदिर के बाहर सड़क पर कार के पहियों पर टीका लगते देखकर दीपक बापू ने अपने मित्र फंदेबाज  से कहा-‘‘अरे, यह चार चक्रवाहिनी के चक्रों पर ध्यान करने की बजाय अपनी देह के आठ चकों पर ध्यान करता रहे तो बेहतर है।  अगर आदमी की  देह के आठ चकों में से कोई भी एक काम करना बंद कर दे तो यह रबड़ के चक्र उसे कहीं कहीं नहीं जा सकते और अगर देह चक्र बढ़िया काम  करें  तो फिर इन चक्रों की परवाह कौन करता है?’’
       फंदेबाज ने दीपक बापू लगभग फुफकारते हुए पूछा-‘‘तुम्हारे पास कार है?’’
     दीपक बापू ने न में सिर हिलाया।
     फंदेबाज ने कहा-‘‘जब खरीद लो तब बात करना! यह रबड़ के चक्र तुम्हें ढो लेंगे पर उनका खर्चा तुम नहीं ढो पाओगे।’’
     दीपक बापू ने फंदेबाज से कहा-‘‘ जब इस तरह की घटनायें देखते हैं तो धनतेरस पर इतना व्यंग्य तो चलता ही था।’’
     फंदेबाज ने कहा-‘इससे बेहतर है कि तुम घर पर जाकर घ्यान लगाते हुए मुफ्त का आनंद लो वरना इतनी सारी घटनायें एक दिन में देखने को मिलेंगी तुम्हारी बची उम्र व्यंग्य लिखते हुए बीत जायेगी।  इस समय जो कर रहे हो वह सब छूट जायेगा।’’
        दीपक बापू ने फंदेबाज से कहा-‘‘वैसे तो तुम्हें झाड़ने का मेरा दिन रहता है क्योंकि तुम पर अध्यात्मिक ज्ञान बघारता हूं। आज तुम्हारा रहा क्योंकि धन का दिन है।’’
       इस धन तेरस पर फोकट में लिखा गया यह लेख हमने बिना किसी योजना के लिखा है।   इस अवसर पर हम अपने पाठकों और मित्रों से यही कह सकते हैं कि धन की औकात जेब तक ही है उसे सिर पर चढ़कर नहीं बोलने देना चाहिए।  साथ ही यह भी बताना चाहेंगे कि धन का अपव्यय नहीं करें तो अच्छा है क्योंकि धन सब कुछ नहीं है पर आत्मविश्वास का एक बहुत बड़ा स्त्रोत है।  इस अवसर पर सभी पाठक और मित्रों को बधाई।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior, madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • vijayshukla  On 18/11/2012 at 09:49

    thankyou

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