सलमान रुशदी की द सैटेनिक वर्सेज किताब और जयपुर साहित्य सम्मेलन में विवाद-हिन्दी लेख


      जयपुर में साहित्यकार सम्मेलन (Jaipur Literature Festival} आजकल विश्व के समाचारों की सुर्खियों में है।  आमतौर से साहित्यकारों के सम्मेलन समाचारों में वह प्रमुखता नहीं पाते जिसकी आयोजक अपेक्षा करते हैं पर इस सम्मेलन को विवाद ने चर्चा का विषय बना दिया है। द सैटेनिक वर्सेज (The Satanic Verses) के लेखक सलमान रुश्दी (Salman Rushdie) हमेशा विवादों में रहे है। अपने ही धर्म के प्रतिकूल किताब ‘‘ द सेटेनिक वर्सेज’’ लिखने वाले लेखक सलमान रुश्दी ने इसके पहले और बाद में अनेक किताबें लिखीं पर उनकी पहचान हमेशा इसी किताब की वजह से रही। हालांकि इस विवादास्पद किताब के बाद उनकी चर्चा अन्य किताबों की वजह से नहीं बल्कि बार शादियां कर बीवियां बदलने की वजह से होती रही है। हम जैसे अंग्रेजी से अनभिज्ञ लोगों को यह तो पता नहीं कि उनकी रचनाओं का स्तर क्या है पर कुछ विशेषज्ञ उनको उच्च रचनाकार नहीं मानते। अनेक अंग्रेजी विशेषज्ञों ने तो यहां तक लिखा था कि रुशदी की सैटनिक वर्सेज भी अंग्रेजी भाषा और शिल्प की दृष्टि से कोई उत्कृष्ट रचना नहीं है, अगर उन्होंने अपने धर्म के प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं की होती और उनको तूल नहीं दिया जाता तो शायद ही कोई इस किताब को जानता।
         हम जब बाजार और प्रचार के संयुक्त प्रयासों को ध्यान से देखें तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि सलमान रुशदी ही क्या अनेक रचनाकार केवल इसलिये लोकप्रिय होते हैं क्योंकि प्रकाशक ऐसे प्रचार की व्यवस्था करते है ताकि उनकी किताबें बिकें। अपने विवाद के कारण ही सैटेनिक वर्सेज अनेक भाषाओं में अनुवादित होकर बिकी। भारत में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया इस कारण कभी इसका अन्य भाषा में प्रकाशन नहीं हुआ। इतना हीं नहीं किसी समाचार पत्र या पत्रिका ने इसके अंशों के प्रकाशन का साहस भी नहीं किया-कम से कम कम हिन्दी वालों में तो ऐसा साहस नहीं दिखा। इतना ही नहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थन में अनेक अवसर भीड़ जुटाने वालों में भी कोई ऐसा नहीं दिखा जिसने इस पर से प्रतिबंध हटाने की मांग की हो। हमारे लिये यह भूली बिसरी किताब हो गयी है।
         इधर कहीं  राजस्थान के जयपुर शहर में साहित्य सम्मेलन हो रहा है। टीवी चैनलों के प्रसारण में वहां रुश्दी की किताब हमने रखी देखी। इसी सम्मेलन दो लोगों ने उसके अंश वाचन का प्रयास भी किया जिनको रोक दिया गया। जयपुर में हो रहे इस सम्मेलन की चर्चा भी इसलिये अधिक हुई क्योंकि उसमें सलमान रुशदी के आने की संभावना थी वरना शायद ही कोई चैनल इसे इस तरह स्थान देता। बहरहाल पता चला कि धमकियों की वजह से सलमान रुशदी जयपुर में नहीं आ रहे बल्कि वीडियो काफ्रेंस से संबोधित करेंगे। ऐसा लगता है कि इस बार भी बाज़ार और प्रचार का कोई फिक्स खेल चल रहा है। इसको नीचे लिखे बिंदुओं के संदर्भ में देखा जा सकता है।
         1. एक तरफ सैटेनिक वर्सेज के अंश पड़ने से दो महानुभावों को रोका जाता है दूसरी तरफ सलमान रुश्दी को इतना महत्व दिया जाता है कि उनके न आने पर उनको वीडियो प्रेस कांफ्रेंस के जरिये संबोधित करेंगे। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जिस लेखक को अपनी विवादास्पद पुस्तक के जरिये प्रसिद्धि के कारण ही इतना बड़ा सम्मान दिया जा रहा है उसी के अंश वाचन पर रोक लग रही है।
       2. दूसरी बात यह कि इस पुस्तक पर देश में प्रतिबंध लगा था वह क्या हट गया है जो इसको प्रदर्शनी में रखा गया। हालांकि टीवी चैनलों पर हमने जो प्रदर्शनी देखी वह जयपुर की है या अन्यत्र जगह ऐसा हुआ है इसकी जानकारी हमें नहीं है। अगर प्रतिबंध नहीं हटा तो इसे भारत नहीं लाया जाना चाहिए था। यह अलग बात है कि हट गया हो पर इसकी विधिवत घोषणा नहीं की गयी हो।
       ऐसा लगता है जयपुर साहित्यकार सम्मेलन में सलमान रुश्दी के नाम के जरिये संभवत अन्य लेखकों को प्रकाशन बाज़ार विश्व में स्थापित करना चाहता है। यह संदेह इसलिये भी होता है क्योंकि सलमान रुश्दी के भारत आगमन की संभावनाओं के चलते ही हमें लगा था कि वह शायद ही आयें। उनके बाज़ार और प्रचार के संपर्क सूत्र उनसे कोई भी न आने का बहाना बनवा देंगे। देखा जाये तो प्रकाशन बाज़ार और प्रचार माध्यम हमेशा विवादास्पद और सनसनी के सहारे अपना काम चलाते हैं जिस कारण हिन्दी क्या किसी भी भाषा में साहित्यक रचनायें न के बराबर हो रही है। संभवतः जयपुर सम्मेलन अपने ही विश्व मे ही क्या उस शहर में ही प्रसिद्धि नहीं पाता जहां यह हो रहा है। सलमान रुश्दी के आने की घोषणा और फिर न आना एक तरह से तयशुदा योजना ही लगती है। आयोजक ने सैटेनिक वर्सेस के अंश पढ़ने से दो लोगों को इसलिये रोका क्योंकि इससे यहां लोग भड़क सकते है तो क्या उनका यह डर नहीं था कि सलममान रुशदी आने पर भी यह हो सकता है। ऐसे में यह शक तो होगा कि यह सब प्रचार के लिए  था।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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