भारतीय धर्म दर्शन संदेश-एक हाथ से अभिवादन करना अनुचित (bhartiya dharma sandesh-ek hath se abhivadan anuchit)


           हमारे देश में अनेक प्रकार के सांस्कृतिक विरोधाभास रहे हैं और जैसे जैसे अंग्रेज सभ्यता ने यहां पांव पसारे तो वह अधिक बढ़े भी हैं। एक तरफ हमारे देश के लोग अपने रक्त प्रवाह में बह रहे प्राचीन संस्कारों को विस्मृत नहीं कर पाते दूसरी तरफ पाश्चात्य सभ्यता में रचबसकर आकर्षक दिखने का मोह उसे ऐसे कर्मो के लिये प्रेरित करता है जो न केवल अधार्मिक बल्कि हास्यास्पद भी होते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण अभिवादन का तरीके भी हैं जो आजकल हम अपना रहे हैं। एक तो हम लोग अभिवादन के समय हाथ मिलाते हैं दूसरा यह कि एक हाथ हिलाकर कुछ शब्द बुदबुदा देते हैं जैसे कि ‘हलो’ या फिर ‘क्या हाल हैं’ आदि। हाथ मिलाने की प्रक्रिया को तो अब पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञ भी नकारने लगे हैं। उनका कहना है कि इससे एक मनुष्य के हाथ में जो विषैले जीवाणु हैं वह दूसरे में प्रविष्ट कर जाते हैं इससे स्पर्श के माध्यम से फैलने वाले रोगों के संचरण की आशंका रहती है। एक हाथ हिलाकर अभिवादन करना पश्चात्य सभ्यता में बड़े लोगों का तरीका है। जहां भीड़ है वहां नेता, अभिनेता और खिलाड़ी एक हाथ हिला हिलाकर लोगों का अभिवादन करते हैं। इसमें कहीं न कहीं देह का अहंकार बाहर प्रकट होता है। यही कारण है कि पश्चिम में भी कुछ लोग दोनों हाथ हिलाकर अभिवादन करते हैं।
एक हाथ से अभिवादन करना हमारे धर्म ग्रंथों में वर्जित किया गया है।
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जन्मप्रभृति यत्किंचित् सुकृतं समुपार्जितम्।
तत्सर्व निष्फलं याति एकहस्ताभिवादनात्।।
       ‘‘एक हाथ से कभी अभिवादन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से पूरा जीवन और पुण्य निष्फल हो जाता है।’’
           हमारे देश में दोनों हाथ जोड़कर अभिवादन या प्रणाम करने की परंपरा है पर आजकल कुछ लोग ऐसे हैं जो हाथ मिलाने की औपचारिकता से समय बचाने या फिर किसी अनावश्यक व्यक्ति के सामने होने पर उसका एक हाथ से अभिवादन कर आगे बढ़ जाते हैं। इससे यह तो स्पष्ट होता है कि अभिवादन करने वाला आदमी दूसरे को जानता है पर वह उससे रुककर बात नहीं करना चाहता। अपने को सभ्य साबित करने के लिये अभिवादन भी वह जरूरी समझता है इसलिये एक हाथ हिला देता है। यह एक अधार्मिक व्यवहार है। इससे तो अच्छा है कि मुंह ही फेर लिया जाये कि सामने वाले को देखा ही नहीं। हमारे देश में दोनों हाथों से प्रणाम और अभिवादन करने की जो परंपरा है वह विश्व में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसमें न एक व्यक्ति दूसरे का स्पर्श करता है न एक ही अधर्म की प्रक्रिया में लिप्त होता है। जब किसी व्यक्ति का अभिवादन करना ही है तो फिर एक हाथ का उपयोग क्यों करें? दोनों हाथों की सक्रियता इस बात का प्रमाण होती है कि हम हृदय से दूसरे व्यक्ति का सम्मान कर रहे हैं।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’, Gwalior
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