बिग बॉस के निवास में स्वामी-हिन्दी हास्य व्यंग्य


           दीपक बापू हाथ में पुराना थैला लेकर सब्जी खरीदने मंडी जा रहे थे। उनके मोहल्ले और मंडी के मार्ग के बीच में एक बहुत बड़ी कॉलोनी पड़ती थी। दीपक बापू जब भी मंडी जाते तो उसी कालोनी से होकर जाते थे। वहां बीच में पड़ने वाले शानदार मकानों, बहुमंजिला इमारतों और किसी नायिका के चेहरे की तरह चिकनी सड़कों पर अपनी साइकिल चलाते हुए वह आहें भरते थे कि ‘काश! हमारा मोहल्ला भी इस तरह का होता’।
         कुछ दिन पहले वह इसी कालोनी में जब गुजरे तब उनकी मुलाकात आलोचक महाराज से हुई तो दीपक बापू ने अपने मन की यही बात उनसे कही थी तो उन्होंने झिड़कते हुए कहा कि-‘‘रहे तुम ढेड़ के ढेड़! यह क्यों नहंी सोचते कि तुम्हारा घर ऐसी कालोनी में होता। वैसे ऐसा घर तुम्हारा भी यहां होता अगर इस तरह की बेहूदी कवितायें लिखकर बदनाम नहीं हुए होते। चाहे जिसे अपना हास्य का शिकार बनाते हो। कोई तुम्हें प्रायोजित नहीं कर सकता। बिना प्रायोजन के कवि या लेखक तो रचनाओं का बोझ ढोले वाला एक गधे की तरह होता है जो कभी अपने तो कभी जमाने का दर्द ढो्रता है।’’
            उस कालोनी में अक्सर आलोचक महाराज का आना होता था और दीपक बापू उनसे मुलाकात की आशंका से भी भयग्रस्त रहते थे। अगर उनको कहंी दूर से आलोचक महाराज दिखते तो वह साइकिल से अपना रास्ता बदल लेते या पीछे मुड़कर वापस चले जाते। आज उन्होंने देखा कि कालोनी में दूर तक सड़क पर कोई नहंी दिखाई दे रहा था-न आदमी न कुत्ता। यह दीपक बापू के लिये साइकिल चलाने की आदर्श स्थिति थी। ऐसे में चिंत्तन और साइकिल एक साथ चलना आसान रहता है। इसलिये आराम से साइकिल पर बैठे उनके पांव यंत्रवत चल रहे थे।
वह एक मकान से गुजरे तो एक जोरदार आवाज उनके कानों में पड़ी-‘ओए दीपक बापू! हमसे नजरें मिलाये बगैर कहां चले जा रहे हो।’’
          दीपक बापू के हाथ पांव फूल गये। वह आवाज आलोचक महाराज की ही थी। उन्होंने झैंपकर अपनी बायें तरफ देखा तो पाया कि चमकदार कुर्ता और धवन चूड़ीदार पायजामा पहने, माथे पर तिलक लगाये और गले में सोने की माला पहने आलोचक महाराज खडे थे। खिसियाते हुए वह आलोचक महाराज के पास गये और बोले-‘‘महाराज आप कैसी बात करते हैं, आपकी उपेक्षा कर हम यहां से कैसे निकल सकते हैं? कभी कभार हल्की फुल्की रचनायें अखबारों में छप जाती हैं यह सब आपकी इस कृपा का परिणाम है कि आपकी वक्रदृष्टि हम पर नहीं है। वैसे यहां आप ‘बिग बॉस निवास’ के बाहर खड़े क्या कर रहे हैं? जहां तक हमारी जानकारी है इस घर में आप जैसे रचनाकारों का घुसना वर्जित है। यहां की हर घटना का सीधा प्रसारण टीवी चैनलों पर दिखता है। आप जैसे उच्च व्यक्त्त्वि इसके अंदर प्रविष्ट होना तो दूर बाहर इस तरह खड़ा रहे यह भी उसके स्तर के अनुकूल नहीं दिखता।’’
           आलोचक महाराज बोलें-‘अच्छा, हमें समझा रहे हो! तुम्हारे जैसे स्तर का महान हास्य कवि यहां से निकल रहा है इस पर भी कोई सवाल कर सकता है। बिग बॉस में ढेर सारी सुंदरियां आती है, कहीं उनको देखने के प्रयास का आरोप तुम पर भी लग सकता है।’’
           दीपक बापू बोले-‘‘नहीं महाराज, हमें तो कोई जानता भी नहीं है। आप तो प्रसिद्ध आदमी है। बहरहाल हमें आज्ञा दीजिये। बिना आज्ञा यहां पोर्च तक आ गये यही सोचकर डर लग रहा है। निवास रक्षक ने अगर आपत्ति कहीं हमें पकड़ लिया तो आप हमें यहां बुलाने की बात से भी इंकार कर पहचानने ने मना कर देंगे।’’
आलोचक महाराज बोले-‘‘आज हम यहां स्वामी आगवेशधारी का इंतजार कर रहे हैं। उनको हमने बिग निवास में प्रवेश दिलवाया है। उनको समझाना है कि क्या बोलना है, कैसे चलना है? तुम जानते हो कि हम तो अब कंपनियों के पटकथाकार हो गये हैं।’’
           दीपक बापू बोले-‘‘स्वामी आगवेशधारी का यहां क्या काम है? वह तो गेरुऐ वस्त्र पहनते है और उनका अभिनय से क्या वास्ता है?’’
           आलोचक महाराज बोले-‘तुम इसलिये फ्लाप रहे क्योंकि तुम बाज़ार और प्रचार का रिश्ता समझे नहीं । अरे, दीपक बापू आजकल वही कंपनियां साहित्य, कला, राजनीति, धर्म और फिल्म में अपना पैसा लगा रही हैं जो हमें सामान बनाकर बेचती हैं। टीवी चैनल और अखबार भी उनकी छत्रछाया में चलते है। वही समाज में सक्रिय अभिनेताओं, स्वामियों, लेखकों, चित्रकारों और समाज सेवकों को प्रायोजित करती है। किसको कब कहां फिट कर दें पता नहीं। फिल्म और टीवी की पटकथा तक कंपनियां लिखवाती हैं। आदमी इधर न खप सका तो उधर खपा दिया। स्वामी धर्म और समाज सेवा के धंधे में न चला तो अभिनेता बना दिया। हमे क्या? हम तो ठहरे रचनाकार! जैसा कहा वैसा बना दिया।’’
           दीपक बापू अवाक खड़े होकर सुनते रहे फिर बोले-‘‘महाराज अब हमारे समझ में आया कि हम फ्लाप क्यों हैं? इतना बड़ा राज हमने पहली बार सुना। यह आगवेशधारी स्वामी तो कभी गरीब बंदूकचियों की दलाली करता था। फिर यह इधर हमारे तीर्थयात्रियों पर कुछ अनाप शनाप बोला। बाद में समाज सुधार आंदोलन में चला आया। वहां उसने अपने ही लोगों को पिटवाने का इंतजाम करने का प्रयास किया। बाहर किया गया। फिर कहीं श्रीश्री के यहां मौन व्रत पर चला गया। अब फिर इधर बिग बॉस के घर आ रहा है। अपने समझ में अभी तक नहीं आया। यह बाज़ार और प्रचार का मिलाजुला खेल है।’’
           आलोचक महाराज बोले-‘‘तुम्हारी समझ में नहीं आयेगा! तुम्हारी बुद्धि मोटी हैं। तुम्हें इतना पहले भी कई बार समझाया कि हमारे यहां बंदूकची हों या चिमटाधारी समाज सेवा में लगें या विध्वंस मे,ं आदमी का प्रायोजन तो कंपनियां ही करती हैं, पर तुम अपनी हास्य कविताओं तक ही सीमित रहे।’’
इतने में दीपक बापू ने देखा कि एक गेरुए वस्त्रधारी पगड़ी पहने एक स्वामी कार से उतर रहे हैं। आलोचक महाराज दनदनाते हुए वहां पहुंच गये और बोले-‘‘आईये महाराज, आईये महाराज! बिग बॉस के घर में आपका स्वागत है।’’
          स्वामी ने कहा-‘‘तुम बिग बॉस हो। लगता तो नहीं है! बिग बॉस तो जींस पहने, काला चश्मा लगाये और सिर पर टोपी धारण करने वाला कोई  जवान आदमी होना चाहिए। तुम तो जैसे कुर्ता पायजामा पहनने के साथ माथे पर तिलक लगाये और सोने की माला पहने कोई नेता लग रहे हो।’
        आलोचक महाराज बोले-‘हुजूर बिग बॉस वास्तव में कौन है पता नहीं! अलबत्ता चाहे इस घर में विज्ञापन मैनेजर जिस अभिनेता को चाहते हैं वही बनकर हमारे सामने आता है। अब बताईये इस कंपनी राज में बिग बॉस भला कभी दिखता है? यहां तक कंपनियों के बॉस भी अपने को दूसरे नामों से पुकारे जाते हैं। हां, आपकी भूमिका मुझसे ही लिखवाई गयी थी। एक कंपनी ने कहा कि हमारा प्रायोजक आदमी इस समय फालतु घूम रहा है उसे काम दो। वह समाज सुधार में फ्लाप हुआ तो गरीबों के उद्धार में उसके सामने पैंच आ जाते हैं ? आपका चेहरा जनता के सामने से गायब न हो जाये इसलिये किसी टीवी धारावाहिक में उपयोग करें। इसलिये हमने तय किया कि आपको बिग बॉस से अच्छी जगह नहीं मिल सकती।’
          स्वामी ने कहा-‘कोई बात नहीं। इस समय मेरा समय ठीक नहीं चल रहा है। बिग बॉस के घर से अपनी छवि सजाकर फिर समाज सेवा करने जाऊंगा। वैसे मुझे तुम्हारे लिखे डायलाग की जरूरत नहीं है। मेरे पास अपना अध्यात्मिक ज्ञान बहुत हैं।’’
          आलोचक महाराज बोले-‘महाराज, वह ठीक है। डायलाग लिखना मेरा काम है। आप अपने चाहे मेरे लिखे बोलें या अपने सुनायें पर नाम मेरा ही होगा।’’
           स्वामी ने दीपक बापू की तरफ देखते हुए पूछा-‘‘यह बूढ़ा आदमी यहां क्या कर रहा है?’’
आलोचक महाराज ने कहा-‘यह एक फ्लाप हास्य कवि है। काम मांगने आया था। मैंने कहा कि हमें तो हमारे महाराज मिल गये अब तुम निकल लो।’’
           स्वामी ने कहा-‘‘अच्छा किया! मुझे हास्य कवियों से नफरत हैं। वैसे यह फटीचर धोती, कुर्ता और टोपी पहने हुए है। इससे बिग बॉस के घर क्या बरामदे तक नहीं आने देना चाहिए। कुछ हास्य कवियों ने मेरा मजाक बनाया है इसलिये उनसे चिढ़ हो गयी है।’
        आलोचक महाराज ने वहां से दूर ले जाकर दीपक बापू से कहां-‘‘निकल लो गुरु तुम यहां से! तुमने इस पर एक हास्य कविता लिखी थी। हमने इंटरनेट पर पढ़ी है। अगर कहीं तुम्हारा नाम इसे पता चला तो हो सकता है एकाध चमाट मार दे।’’
        दीपक बापू बाहर निकलते हुए बोले-सच कहते हो आलोचक महाराज। यह बिग बॉस का निवास और इधर यह स्वामी! फिर आपकी मौजूदगी! हमारे लिये यहां हास्य कविता लायक लिखने का विषय हो नहीं सकता। गंभीर चिंत्तन और दर्दनाक रचनायें हमसे होती नहीं हैं। सो हम तो चले।’’
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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