अन्ना हजारे का राष्ट्रीय पटल पर पुनः अवतरण का इंतजार-अण्णा हजारे पर विशेष हिन्दी लेख (anna hazare ka pun avtaran-bhrashtachar virodhi aandolan par vishesh hindi lekh)


                  अन्ना हजारे का 16 अगस्त से महानायक के रूप में राष्ट के दृश्य पटल पर पुनः अवतरण हो रहा है। देश के समस्थ्त प्रचार माध्यम इस महानायक के महिमामंडल में लगे हुए हैं क्योंकि उनके आंदोलन के दौरान प्रचार प्रबंधकों ऐसी विषय सामग्री मिलेगी जो उनके प्रकाशन तथा प्रसारणों वालेक विज्ञापन के साथ काम आयेगी। उनके कई घंटे इस दौरान उनको विज्ञापन का संग्रह कर कमाई करने का अवसर देंगे। सच बात तो यह है कि हमारे देश के प्रचार माध्यमों की स्थापना में लक्ष्य विज्ञापनों को पाना ही होता है, मगर अभिव्यक्ति के झंडाबरदार होने की छवि की वजह से प्रचार प्रबंधक कुछ ऐसी विषय सामग्री भी प्रकाशित और प्रसारित करते हैं जिससे माध्यमों का पत्रकारिता संस्थान होने का प्रमाण दिख सके। अगर ऐसा न होता तो टीवी चैनल को अपने प्रसारणों में अब निर्धारित समाचार, विश्लेषण तथा चर्चा की न्यूनतम मात्रा होने का प्रचार नहीं करना पड़ता। उनको अपने प्रचार यह सािबत करना पड़ता है कि वह विज्ञापन चैनल नहीं बल्कि समाचार चैनल चलाते हैं कि और कम से कम उनके यहां इतने समाचार तो प्रसारित होते ही हैं।
              इसमें कोई संदेह नहीं है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव व्यक्तित्व और कृतित्व की दृष्टि से सात्विक प्रवृत्ति के है। अन्ना हजारे अपनी धवल तो बाबा रामदेव अपनी धार्मिक छवि के कारण देश के जनमानस में निर्विवाद व्यक्तित्व के स्वामी हैं। दोनों के व्यक्तित्व पर कोई आक्षेप नहीं है ऐसे में उनका व्यक्तित्व किसी भी ऐसे मुद्दे को निरंतर बनाये रखने में अत्यंत सहायक है जो जनमानस से जुड़ा हो। इस समय भ्रष्टाचार का मुद्दा ज्वलंत बन गया है और इससे जनमानस प्रभावित भी है और समाचार के साथ विश्लेषण विज्ञापनों के साथ निरंतर प्रचार किया जा रहा है। इसके बाद हम टीवी चैनल और समाचार पत्रों की कार्यप्रणाली पर भी विचार करते हैं  जिसमें उनको जनमानस के बीच अपनी छवि बनाये रखना होती है। उनको रोज नवीनता चाहिए। नये चेहरे, नये विषय और नये रोमांच आज के प्रचार माध्यमों को रोज जुटाने हैं। ऐसे में कभी कभी तो यह लगता है कि पूर्वनियोजित समाचार बन रहे हैं। इसका संदेह इसलिये होता है कि हमने देखा है हमारे प्रचार प्रबंधकों के आदर्श पश्चिमी गोरे राष्ट्र हैं जहां ऐसी भी खबरों सुनने को मिलती हैं कि सनसनी फैलाने के लिये प्रचार कर्मियों ने हत्यायें तक करा डालीं। हमारे देश के लोगों में   यह दुस्साहस करने की पशुवृत्ति नहीं है। यह अच्छी बात है पर अहिंसक योजनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। देश में जब पुराने चेहरों से उकताहट महसूस की जाने लगी तो उसी समय बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का अपने मूल सक्रिय क्षेत्रों से हटकर भ्रष्टाचार विरोधी देतवा के रूप में अवतरण हुआ। बाबा रामदेव योग साधना सिखाते हुए पूरे विश्व में लोकप्रिय हो गये थे। उनके शिविरों के कार्यक्रमों का टीवी चैनलों पर प्रसारण हुआ तो समाचार पत्रों में भी खूब चर्चा हुई। इधर अन्ना हजारे भी अपने महाराष्ट्र प्रदेश में कुछ आंदोलनों से चर्चित होने के बाद फिर कहीं खोये रहे। ऐसे में अचानक दोनों ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अगुआ बने या बनाये गये इसको लेकर सवाल उठता है। ऐसा लगता है कि इन दोनों के चेहरे का उपयोग शयद इसलिये हो रहा है ताकि भारत की छवि विश्व में धवल रहे जो कि कथित रूप से स्विस बैंकों में देश के लोगों के काला धन जमाने होने के कारण धूमिल हो रही है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक पुरुषों ने विश्व में अपनी छवि बनायी है पर लगता है कि उनको अन्य देशों के समक्क्षों के सामने अपने देश के भ्रष्ट आचरण के कारण शार्मिंदा होना पड़ता है। संभव है उनको मुर्दाकौम का शीर्षस्थ होने का ताना मिलता हो। इसलिये एक आंदोलन की आवश्यकता उनको अनुभव हुई जिससे यहां की जीवंत छवि बने और उनका सम्मान हो। ऐसे में आंदोलनों को अप्रत्यक्ष रूप से मदद देने से एक लाभ उनको तो यह होता है कि विश्व में उनकी छवि धवल होती है तो वही दूसरा लाभ यह है कि जनमानस मनोंरजन और आशा के दौर में व्यस्त रहता है और शिखर पुरुषों को अपने नियंत्रित समाज से अचानक विद्रोह की आशंका नहीं रहती। फिर प्रचार माध्यम तो उनके हाथ में तो उसमें विज्ञापित उत्पादों के भी वही निर्माता है। ऐसे में उनका विनिवेश कभी खाली नहीं जाता।
          बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जनमानस के नायक हैं पर कहीं न कहीं उनके इर्दगिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा है जो पेशेवर अभियानकर्ता हैं और उनसे निष्काम भाव से काम करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यही कारण है कि भले अन्ना साहेब और स्वामी रामदेव निच्छल भाव के हैं पर अपने सलाहकारों के कारण अनेक बार अपने अभियानों के संचालन के दौरान वैचरिक दृढ़ता का प्रदर्शन नहीं कर पाते। उनके अभियानों के दौरान वैचारिक लड़खड़ाहट की अनुभति होती है। मुख्य बात यह है कि अनेक बार ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं दोनों के पेशेवर अभियानकर्ता सलाहकार देश के शिखर पुरुषों से अप्रत्यक्ष रूप से संचालित हैं। इनमें एक तो ऐसे हैं जो कभी नक्सलियों के समर्थन में आते हैं तो्र कभी कभी कश्मीर के उग्रतत्वों के साथ खड़े दिखते हैं। भारतीय धर्म पर व्यंग्यबाण कसते हैं। ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की धवल छवि की आड़ में कोई ऐसा ही समूह सक्रिय है जो ऐसे अभियानों को पेशेवर अंदाज में चला रहा है। टीवी पर एक संगीत कार्यक्रम में अन्ना साहेब की उपस्थित और राखियों पर छपे चेहरे से यह बात साफ लगती है कि कहीं न कहीं बाज़ार को भी उनकी जरूरत है। ऐसे में 16 अगस्त से चलने वाले अन्ना साहेब के आंदोलन के परिणामों की प्रतीक्षा करने के अलावा अन्य कोई निष्कर्ष करना जल्दबाजी है पर बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों की इसमें सक्रिय होना फिलहाल दिख रहा है जिनकी शक्ति के चलते भ्रष्टाचार खत्म होना अस्वाभाविक बात लगती है।
            आखिरी बात यह है कि भ्रष्टाचार के लिये कानून पहले से ही बने हुए हैं। मुख्य बात यह है कि कानून लागू करने वाली व्यवस्था कैसी हो। दूसरी बात यह है कि समाज स्वयं लड़ने को तैयार नहीं है। क्या आपने कभी सुना है कि कोई अपने रिश्तेदार या मित्र का इसलिये बहिष्कार करता है कि उस पर भ्रष्टाचार का संदेह है।
         यकीनन नहीं! दूसरी बात यह है कि अगर हम गौर करें तो हमारे देश में कानूनों की संख्या इतनी अधिक है कि सामान्य आदमी की समझ में ही नहीं आता कि उसके पक्ष में कौनसी धारा है। बिना जागरुकता के भ्रष्टाचार मिट नहीं सकता और यह तभी संभव है कि जब संक्षिप्त कानून हों जिनको आम आदमी समझ सके। आम आदमी को लगता है कानून का विषय उसके लिये कठिन है इसलिये वह व्यवस्था को केवल शक्ति का प्रतीक मानते हुए उदासीन रहता है। बार बार यह दावा किया जाता है कि देश का विकास आखिरी आदमी तक पहुंचना चाहिए पर हमारा मानना है कि यह तभी संभव है जब देश में कानून इतना सरल और संक्षिप्त बने जिसे आम आदमी उसे समझ सके। सच तो यह है कि अपने को कम जानकार मानने की वजह से कोई आम आदमी भ्रष्टाचार से लड़ना नहीं चाहता। भ्रष्टाचार होने का एक कारण यह भी है कि समाज ने ही इसे मान्यता दी है और भ्रष्ट लोगों को हेय दृष्टि से देखने की आदत नहीं डाली। एक आम लेखक के रूप में हम देश के लिये हमेशा कामना करते हैं कि यहां सभी लोग खुशहाल रहें इसलिये जब कोई बड़ी हलचल होती है तो उस पर नज़र जाती है। हम अपेक्षा करते हैं कि अच्छा हो पर जब चिंतन करते हैं तो लगता है कि अभी दिल्ली दूर है। फिर भी आशायें जिंदा रखते हैं क्योंकि जिंदा रहने का सबसे अच्छा तरीका भी यही है।

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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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टिप्पणियाँ

  • nirja sahini  On 15/08/2011 at 13:59

    Bahut aacha likha hai aapne.Sochne pe majboor kar diya hai iss lekh ne.

  • shruti  On 30/11/2011 at 20:41

    hum apke sathe hai

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