गुलामी कभी छिप नहीं पाएगी-हिन्दी कविता (gulami kabhi chhip nahin jayegi-hindi kavita)


ओहदा दर ओहदा
कितनी भी सीढ़ियां चढ़कर
पहाड़ जैसी हैसियत बना लो,
तुम्हारी गुलामी फिर भी छिप नहीं पायेगी।
आजाद होकर जिंदा रहने की
तुम्हारी कभी ललक नहीं दिखी,
दस्तखत केवल उसी कागज पर किये
जिस पर केवल दौलत की इबारत लिखी,
कमजोरों पर अजमाये हाथ
मगर ताकतवरों के तलुव चाटने वाली
तुम्हारी असली तस्वीर ज़माने से छिप नहीं पायेगी।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com
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टिप्पणियाँ

  • Arjun kumar  On 04/09/2011 at 13:56

    Duncyan mai teen chig se kabi nahi sharmana chahiye.
    1 bolne main
    2 khane main
    3 pahenne main

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