सफ़ेद चेहरा काला धंधा-हिन्दी व्यंग्य कविता (safed chehra kala dhandha-hindi vyangya kavita)


चेहरा निर्दोष लगे
वस्त्र सादा और धवल हों,
नारे लगाने में माहिर,
और घोषणाओं पर खुश हो जाये,
ऐसा आदमी आगे खड़ा कर दो
ज़माना उसकी मासूमियत देखकर
सारा दर्द भुला देगा।
काला धंधा छिपकर चलता रहे,
काला धन सफेद होकर पलता रहे,
गगनचुंबी कांच से बनी इमारतें सलामत रहें,
इसके लिये जरूरी है कि आम आदमी
अपनी निराशा भूलकर
आशा की किरण देखता रहे
कोई बुझा चिराग
नकली रौशनी से सूरज की तरह बड़ा कर दो
वरना वह झूठे सिंहासन को फांसी  पर झुला देगा।
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टिप्पणियाँ

  • seema sinha  On 25/05/2011 at 16:19

    Bahut hee aacha likha hai aapne.Main to sochne pe majboor ho gaya.Pure 5 star diye hain aapko.

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