टीवी चैनलों पर चलती कतरन-हिन्दी हास्य कविता (TV chailnlon par chaltti kataran-hindi hasya kavita)


टीवी चैनल के प्रबंधक से कहा संपादक ने
‘‘आप हमारे कर्मचारियों का
मेहनताना बढ़ा दें,
अपना चैनल उनकी दम पर
लोकप्रिय हो रहा है,
सभी जगह अपने विज्ञापनदाताओं के लिये
ग्राहक बो रहा है,,
कभी किसी खास आदमी के यहां शादी की खबर हो
चाहे किसी के मरने की स्टोरी करना कवर हो,
वहां हमारे लोग अपना पराक्रम दिखाते हैं,
लोगों के दिल में अपने चैनल का नाम लिखाते हैं,
सनसनी फैलाते वक खुद अभिनय कर सन्न रह जाते हैं,
देशभक्ति का भाव बेचते हुए
भावुक भी हो जाते हैं,
समाचारों के चलते फिरते उनके साथ
अभिनय का का कौशल सभी दिखाते हैं।

सुनकर बोले संपादक जी
‘क्या खाक पराक्रम दिखाते हैं,
हम तो जानते हैं असलियत
हमें क्या आप
सिखाते हैं,
किसी की शादी हो तो
उसके घर पर लगे कैमरों से ही
हो जाता है सीधा प्रसारण
अपने कैमर रखे रहते हैं आफिस में
तो संवाददाता आमंत्रण पत्र मिलने से
कर लेते हैं बाराती का वेश धारण,
उसमें भी बस एक ही दिन
विज्ञापन चलता है
दर्शक होते हैं दूसरे दिन निराश
क्योंकि नये जोड़े की सुहागरात देखने का मन
मचलता है
फायदे तो खास आदमी के मरने पर होता है,
जब चैनल चार दिन विज्ञापन ढोता है
एक दिन मरने का
दूसरे दिन अर्थी सजने का
तीसरे होता है रोने का
तो चौथा दिन मृतक के चरित्र की चर्चा होने का
देश में हो तो स्थानीच चैनलों से काम चलाते हैं
विदेश में तो वहीं के चैलनों के चलते कैमरों को
अपने नाम से बताते हैं।
नहीं बढ़ेगा एक पैसा भी
हम तो सोच रहे हैं कि कुछ कर्मचारी ही कर दें
क्योंकि हमारे स्वामी व्यस्त रहते हैं
बाहर घूमने में
बढ़ती महंगाई में उनके बैंक खाते में
रकम कम जमा होती दिख रही है,
कहीं चैनल न बंद कर दें,
या फिर प्रबंधक ही नया धर लें,
हम अपने खर्च कम कर
उनकी आय बड़ी करने की कोशिश कर दिखाते हैं।
अपनी तनख्वाह बढ़ने का विचार छोड़ दो
वरना हम नये प्रशिक्षु लाकर
कतरनों से चैनल चलाना उनको सिखाते हैं।
—————–

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप” 
poet,writter and editor-Deepak “BharatDeep”
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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