हिन्दी हास्य कविता-नारे लगाने से भ्रष्टाचार नहीं मिटता (hindi hasya kavita-nare lagane se bhrashtachar nahin mital)


पोते ने का दादाजी से
‘कल हम सब बच्चे अपनी शिक्षिका के साथ
भ्रष्टाचार विरोधी रैली में जायेंगे,
खूब जोर से नारे लगायें,
अपनी कोशिश से इस देश में
 ईमानदारी  का युग फिर लायेंगे।’

सुनकर दादाजी  ने कहा
‘‘बेटा,
तुम जाओ हमें आपत्ति नहीं
पर शिक्षिका ने तुम्हें
भ्रष्टाचार का मतलब समझाया भी है  कि नहीं
लगता  नहीं वह भी जानती होगी,
बस नारे लगाना ही क्रांति मानती होगी,
सच बात तो यह है कि
इस संसार में भ्रष्टाचर मिटा सके,
ऐसा कोई जंतर मंतर नहीं है,
संसार के सारे इंसानों को
अपने कर्म में खोट भी लगता है शिष्टाचार
दूसरे का हर कर्म माने भ्रष्टाचार
सोच कां अंतर वहीं हैं,
हर कोई
पहले दूसरे से सुधरने की आशा करे,
फिर अपने भी उसी राह पर चलने का दिल में भाव भरे,,
यही बेईमानी सभी में आती है,
दूसरा शख्स झौंपड़ी में ही मरे,
अपनी इमारत चमचमाती होने  की
चाहत हर कोई धरे,
यही सोच भ्रष्टाचार की तरफ ले जाती है,
बड़े होकर
अगर तुम चल सको सत्य की राह
समझ लो पूरी हो जायेगी ईमानदारी लाने की चाह,
ऐसा ही हर कोई करे
तो भ्रष्टाचार मिट जायेगा,
वरना पहले से ही बढ़ा रहा है मुंह
सुरसा की तरह
अब और भी बढ़ायेगा,
हम भले उसे मिटाने के नारे लगाते
जीवन गुजारते जायेंगे।’
————–
लेखक संपादक-दीपक “भारतदीप”, ग्वालियर 
writer and editor-Deepak “Bharatdeep” Gwalior
—————–
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • vanita singh  On 26/05/2011 at 16:58

    Bahut acha sandesh diya hai aapne.Hansya kavita main itna acha sandesh dena bada muskil kaam hai.

  • pradeepkushwaha  On 21/06/2011 at 19:48

    goodluck.how a nice poem…thankyou

  • aaditi  On 30/10/2013 at 19:24

    wow what a wonderful poem and such a cute message is given in this poem

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