सुबह की सैर और इंसान -हिन्दी रचना (subah ki sair aur insaan-hindi rachana)


प्रातः आठ बजे का समय था। हम सुबह घर से बाहर चाय पीकर निकले। पार्क में घूमने जाना था। चाय पीकर बाहर घूमने का यह रोज का हमारा नियम वैसे पुराना है, पर ब्लाग पर लिखने की वजह इसमें व्यवधान आ गया था। जब पहले बिजली कटौती नहीं थी तब यह समय ब्लाग लिखने में लगाते जिससे लिखना बंद हो गया। हालांकि सुबह केवल भारतीय अध्यात्म से संबंधित विषय पर ही हम लिखते थे पर अब सुबह कभी चार तो कभी तीन बजे से सुबह दस बजे तक बिजली कटौती ने हमारी इस अध्यात्मिक साधना को करीब करीब समाप्त कर दिया है। मगर इससे एक लाभ यह हुआ है कि प्रातःकाल घूमना हमारी दिनचर्या में शामिल हो गया है। जब सुबह घूमने जाते हैं तो राह चलते हुए अनेक दृश्य और लोगों की बातें हमारी आंखों और कानों पर प्रभाव डालती पड़ती हैं जो अब अलग से एक नयी अनुभूति देती थी है। शायद यह अध्यात्मिक साधना का परिणाम भी हो सकता है।
बहरहाल प्रातःकाल घूमने में स्वर्ग जैसा आनंद है। कहना चाहिए कि स्वर्ग में अगर इंसान जाये और दोपहर तक सोता रहे तो उसे वहां भी धरती पर भोगे गये नरक की अनुभूति होगी, यह हमारा दावा है। स्वर्ग एक कल्पना है पर सुबह का भ्रमण अगर नियमित कर उसकी अनुभूति को अपने मन में उतारा जाये तो यकीनन स्वर्ग की कल्पना मिथ्या साबित होगी। शायद अनेक महापुरुष इसलिये यही कहते हैं कि स्वर्ग और नरक इसी धरती पर हैं। यकीनन वह महापुरुष सुबह उठकर ज्ञान तथा ध्यान में संलग्न रहने वाले थे तभी उन्होंने इस सत्य की अनुभूति की। उन्होंने यह सिखाया कि अपने कर्म, आचरण, व्यवहार, तथा दिनचर्या में से यहीं इसी धरती पर स्वर्ग को भोगा जा सकता है।
उस दिन एक सज्जन ने हमसे कहा-‘आप देर से घूमने क्यों निकलते हैं? घूमना तो एकदम सूर्य निकलने से पहले होना चाहिए। यह क्या कि आठ बजे घूमने निकले हैं। इस समय तो चाय और नाश्ते करने का समय है।’
हमने कहा-‘हां, मैं चाय पीकर तफरी करने निकला हूं।’
वह बोले-‘इससे क्या लाभ? सुबह घूमिये तो जरा स्वास्थ लाभ होगा।’
हमने कहा-‘हां, कोशिश करूंगा कि सुबह निकलें, मुश्किल यह है कि हमारा सुबह का एक से डेढ़ घंटा योग साधना, स्नान, पूजा तथा चाय पीने में लग जाता है। योग साधना का समय लंबा हो जाये तो दो घंटे भी ऐसे ही निकल जाते हैं। आपकी राय पर विचार करेंगे और कुछ समय पहले ही उठा करेंगे।’
वह सज्जन हमारी तरफ आंखें फाड़कर देखने लगे और बोले-‘आप वाकई योग साधना करते हैं, मगर आप का पेट बहुत बाहर निकला है। यह देखकर नहीं लगता।’
हमने कहा-‘इसलिये ही सुबह घूमने निकलते हैं ताकि पेट कम हो।’
वह बोले-‘योग साधना वालों के पेट तो अंदर होते हैं। आपने बाबा रामदेव को देखा होगा कितने पतले और सुंदर लगते हैं। आपका पेट तो बहुत बाहर है।’
हमने कहा-‘दरअसल हम खान पान में थोड़े लापरवाह हैं। यह उसी का नतीजा है।’
वह बोले-‘फिर योग साधना करने से क्या फायदा? उसमें तो संयम रखना चाहिए।’
हमने कहा-‘हां, अब रखेंगे।
यह कहकर आगे चल दिये तो पीछे से फिर उन्होंने आवाज दी और कहा-‘मगर आप मोटे नहीं लगते। आपके शरीर का बाकी हिस्सा फिट लगता है। वैसे आप कौनसे आसन करते हैं।’
हमन कहा कि ‘बहुत सारे! पद्मासन, सर्वांगासन तथा सूर्यनमस्कार तथा बहुत सारे आसनों में साथ प्राणायाम भी करते हैं।’
वह बोले-‘आप हमें कोई ऐसा आसन बताईये जिससे हमारी कमर का दर्द चला जाये। कमबख्त, बहुत परेशान हैं।’
हमने कहा-‘उष्टासन करिये।’
वह बोले-‘यह कैसे होता है?’
हमने कहा-‘यह सड़क पर करके कैसे बता सकता हूं।’
वह बोले-‘आपका पद्मासन लगता होगा, इस पर यकीन नहीं होता।’
हमने कहा-‘चलिये, पार्क में करके दिखा देते हैं। पर हां उष्टासन नहीं करके बतायेंगे क्योकि हमारे पास अब चद्दर और दरी नहीं है।’
वह बोले-‘फिर कभी देखेंगे। कल मैं पार्क में आऊंगा तब आप पद्मासन लगाकर बताईयेगा।’
हमने कहा-‘बात तो हमने आज और अभी की कही है। कल की कल देखेंगे।
वह सज्जन चले गये।
उनके जाने के बाद हमें इस बात पर पछतावा हुआ कि किसलिये अपने कीमती दस मिनट उनसे वार्तालाप में बरबाद किये। इससे तो हां जी, हां जी, करते हुए निकल जाना चाहिए था। सारा दिन तो लोगों से बात करते और सुनते हुए बीतता है। मौन रहकर घूमने का आनंद तो प्रातःकाल घूमने में ही हैं।
उस दिन रास्ते पर पड़ने वाले एक मकान के पास से गुजर रहे थे तो एक सज्जन अखबार पढ़ते दिखेे। हमें देखकर बोले-‘नमस्कार, श्रीमान, इधर कैसे निकले हैं।’
हमने कहा-‘‘ जरा तफरी करने निकले हैं।’’
वह बोले-‘हां, अब तो हवा ही रह गयी है खाने को! हर चीज महंगी होती जा रही है। अनाज, सब्जी, दूध और और बिजली भी महंगी हो रही है। देखिए अखबार में क्या दर्दनाक खबरें लिखी हैं। आपने तो अखबार पढ़ा होगा?’
हमने कहा-‘अखबार तो अब जाकर पढ़ेंगे। सुबह क्या दर्दनाक विषयों में अपना कोमल हृदय फंसायें, वह तो सारा दिन ही झेलनेे हैं।’
वह बोले-‘अखबार पढ़ने का मजा तो सुबह ही है।’
हमने कहा-‘आप भी कमाल करते हैं। भला, दर्दनाक खबरों में मजा आता है? यह सब चीजें महंगी हो रही हैं उनको रोकना अपने बस में नहीं है, फिर उनसे उपजा संकट झेलना ही है तब क्यों सुबह का यह कीमती समय इन पर नष्ट करें।’
वह बोले-‘ऐसी बात नहीं है। नई जानकारी भी मिलती है। देखिए, आज मंत्रिमंडल में विस्तार होना है। इधर विश्व कप के लिये क्रिकेट टीम भी घोषित हो गयी है। यह तो रुचिकर विषय हैं।’
हमने कहा-‘हां, यह सही है। कल से सुबह ही अखबार पढ़ा करेंगे।’
हम थोड़ा आगे ही गये होंगे कि बच्चों को ले जानी वाली एक बस हमारे पास से तीव्र गति से धूल उड़ाती हुई निकली जिससे हमारे कानों, आंखों तथा नाक पर बुरा प्रभाव पड़ा। जितनी देर उन सज्जन से हम बात कर रहे थे उतने में हम उस सड़क से पार्क में पहुंच गये होते। मतलब उस वार्तालाप की वजह से धूल ने हम पर प्रहार किया। ऐसे में रुमाल से हमने मुंह ढंका, फिर पौंछा। किसी तरह पार्क में पहुंच गये। मन में पछतावा हो रहा कि बेकार की बातों में क्यों अपना वक्त लगाया।
पार्क में खिले फूलों को देखकर यह लगा कि किस तरह यह इस आशा में खड़े हैं कि लोग उनको देखें। लोग फूलों की पैंटिंग से घर में सजाते हैं। नकली फूलों से गुलदस्ते भी भरते हैं। असली फूल के पास खड़े होकर उसे निहारने का जो आनंद है कितनों के नसीब में होता है। यह जरूरी नहीं है कि फूलों के पास से जो निकले वह उसकी उपस्थिति के आनंद को अनुभव करे, क्योंकि आनंद लेना भी एक कला है जिसके लिये मौन होना जरूरी है। उससे ज्यादा अपने को हमेशा ही अभिव्यक्त होने के भाव से भी मुक्त होना पड़ता है। यह मैं करूं, वह देखूं, वह सुनूं, या मैं किसी से कुछ कहूं-आशय यह है कि अपनी दैहिक सक्रियता का मोह छोड़कर अपना ध्यान अंतर्मन में लगाना पड़ता है। आप सोचते रहिये कि ‘यह करें, वह करें’, मगर यह भी सोचें कि दूसरा उसको कितना भाव देता है। मतलब आपका सुनाना बेकार है क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि सामने वाला आपके विषय को रुचि के साथ सुन रहा है। जैसे कि हमने सुना पर तत्काल उस विषय से निवृत हो गये थे कि ‘सुबह इंसान को क्या करना चाहिए।
कई बार लोगों को यह अनुभव होता है कि हम उनकी बात सुन रहें तो यह भ्रम है और हम सुनकर याद रखेंगे यह तो महाभ्रम है। तय बात है यह बात हमारे कहने पर भी लागू होती है क्योंकि सामने वाले की प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।
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टिप्पणियाँ

  • yuvraj  On 30/03/2011 at 08:56

    sadhi hue shandar rachna..

  • janvi jain  On 30/07/2013 at 19:28

    not bad

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