दीपावली (दीवाली) और भारतीय अध्यात्म दर्शन-हिन्दी आलेख (deepawali or diwali and bhartiya adhyatmik darshan-hindi article)


दीपावाली, दिवाली, दीवाली   दीपोत्सव और प्रकाश पर्व के नाम से यह त्यौहार परंपरा हमारे भारत में हर वर्ष सदियों से मनाई जाती रही है। मज़े की बात यह है कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनवास समाप्ति के अवसर पर अयोध्या में आगमन पर उल्लास के रूप में मनाये जाने वाले इस पर्व पर लक्ष्मी की पूजा सर्वाधिक की जाती है और राम चरित्र की चर्चा बहुत कम ही होती है। इसके साथ इस तरह की अन्य मिथक कथायें भी हैं पर मूल रूप से यह श्रीराम के राज्याभिषेक के रूप में माना जाता है। दिपावली, दिवाली दीपोत्सव या प्रकाश पर्व के नाम से मनाऐ जाने वाले इस पर्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि सारे देश में एक ही दिन इसको मनाया जाता है। होली या अन्य पर्वों को पूरे भारत में एक तरह से न मनाकर अलग अलग ढंग से मनाया जाता है। देश ही नहीं वरन् विदेश में भी भगवान श्रीराम और सीता को याद कर लोग आनंदित होते हैं। वैसे देखा जाये तो भगवान श्रीराम के साथ भगवान श्रीकृष्ण भी लोगों के मन के नायक हैं पर उनको भारतीय सीमाओं के बाहर इस तरह याद नहीं किया जाता है। इसलिये ही जब भगवान श्रीराम की बात आती है तो कहा जाता है क वह तो सभी के हृदय के नायक हैं जबकि विश्व को तत्वज्ञान से अवगत कराने वाली श्रीमद्भागवत गीता को प्रकाशित करने वाले भगवान श्रीकृष्ण को इस रूप में स्मरण नहीं किया जाता है। भगवान श्रीराम के बारे में श्रीमद्भागवत गीता में एक जगह श्रीकृष्ण कहते भी हैं कि ‘धनुर्धरों में मैं राम हूं।’
धनुर्धर यानि पराक्रमी। पराक्रम की छबि में सक्रियता है-दूसरी तरह से कहें कि उसमें एक्शन है। एक्शन या सक्रियता को पसंद करने के कारण ही जनमानस में भगवान श्रीराम की छबि अत्यंत व्यापक हैं-हर वर्ग और आयु का मनुष्य उनको अपना आराध्य सहजता से स्वीकार करता है। भारतीय अध्यात्म और दर्शन में भगवान श्रीराम के हाथ से संपन्न अनेक महान कार्यों से तत्कालीन समाज में व्याप्त अन्याय और आतंक के विरुद्ध युद्ध में विजय को इस अवसर पर याद किया जाता है जिसमें अहिल्या उद्धार तथा रावण पर विजय अत्यंत प्रसिद्ध हैं। अधिकतर लोग राम को एक पराक्रमी योद्धा और मर्यादा पुरुषोत्तम होने की वजह से सदियां बीत जाने पर भी याद करते हैं तो जबकि बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि उन्होंनें राजकाज चलाने के लिये भी बहुत प्रकार के आदर्श स्थापित किये थे। बनवास प्रवास के दौरान जब उनके भ्राता श्री भरत परिवार समेत मिलने आये थे तब भगवान श्री राम ने उनसे अनेक प्रश्न किये जिनमें राज्य चलाने की विधि शामिल थी। देखा जाये तो वह सभी प्रश्न राजकाज और परिवार चलाने के संदेश के रूप में भारत को ज्ञान देने के लिये किये गये थे। आज जब लोग राम राज्य की बात करते हैं तो उनको उस प्रसंग का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। भगवान श्रीराम जब 14 वर्ष बनवास काटकर अपने गृह राज्य अयोध्या लोटे तो सभी आमजन प्रसन्न हुए थे। यह उनकी लोकप्रियता का प्रमाण था जिसे बिना सार्वजनिक उपकार की राजनीति किये बिना प्राप्त करना संभव नहीं है। साथ ही यह भी लोग उनके सम्मान के लिये स्वप्रेरित थे न कि प्रायोजित, जैसे कि आजकल के राजाओं के लिये एकत्रित होने लगे हैं।
आज आधुनिक लोकतंत्र में सभी देशों मंें अनेक ऐसे राजनेता काम कर रहे हैं जो राजनीति का कखग भी नहीं जानते बल्कि उनको अपराधियों, पूंजीपतियों तथा बाहुबलियों का मुखौटा ही माना जाना चाहिए। पश्चिमी देशों में कई ऐसे अपराधी गिरोह है जो वहां के राजनेताओं पर गज़ब की पकड़ रखते हैं। उनके पीछे ऐसे शक्तिसमूह हैं जिनके प्रमुख स्वयं अपने को राजकाज में शामिल नहीं कर सकते क्योंकि उनको अपने ही क्षेत्र में वर्चस्व बनाये रखने के लिये सक्रिय रहना पड़ता है। इसलिये वह राजनीति में अपने मुखौटे लाकर सामाजिक प्रभाव बनाये रखते हैं। सच कहें तो आधुनिक लोकतंत्र के नाम पर आर्थिक, धार्मिक, कला, साहित्य तथा समाज के शिखर पुरुष अपराधियों के साथ गठजोड़ कर राज्य को अपने नियंत्रण में कर चुके हैं। राजाओं, सामंतों और जागीरदारों के अत्याचारों की कथायें सुनी हैं पर आज जब पूरे विश्व में राज्य प्रमुखों, राजकीय कर्मियों तथा अपराधियों के वर्चस्व को देखते हैं तो उनकी क्रूरता भी कम नज़र आती है। पुराने समय के राजा लोग सामंतों, जमीदारों, साहुकारों तथा व्यापारियों से कर वसूल करते थे। इतना ही नहीं किसानों से भी लगान वसूल करते थे मगर वह किसी के सामने अपने राज्य या राजकीय व्यवस्था के अपनी आत्मक सहित गिरवी नहीं रखते थे। प्रजाहित में पुराने राजाओं के कामों को आज भी याद किया जाता है। मगर आज पूरे विश्व में हालत है कि चंदा लेकर आधुनिक राजा अपना राज्य, अपनी आत्मा तथा राज्य का हित दांव पर लगा देते हैं। ऐसे में बरबस ही राजा राम की याद आती है।
प्रसंगवश अयोध्या के राम मंदिर की याद आती है। राम के इस देश में अनेक मंदिर हैं। उससे अधिक तो उनका निवास अपने भक्तों के हृदय में है। कहने वाले तो कहते हैं कि न यह वह अयोध्या है न वही जन्म स्थान है जहां राम प्रकट हुए थे। यह गलत भी हो सकता है सही भी, पर सच यह है कि भगवान श्रीराम तो घट घट वासी हैं। उनके भक्त इतने अनन्य हैं कि उनके कल्पित होने की बात कभी स्वीकारी नहीं जा सकती। यही कारण है कि उनका चरित्र अब देश की सीमाओं के बाहर भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
इस दीपावली के अवसर पर अपने सभी ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों को हार्दिक बधाई। यह दिपावली सभी के लिये अत्यंत प्रसन्नता लाये यह शुभकामनायें। आध्यात्मिक लोगों के लिये हर पर्व चिंतन और मनन के लिये प्रेरणा देता है। ऐसे में सामान्य लोगों से अधिक प्रसन्नता भी उनको होती है। जहां आमजन अपनी खुशी में खुश होता है तो आध्यात्मिक लोग दूसरों को खुश देकर अधिक खुश होते हैं। यही भाव सभी लोगों को रखना चाहिये जो कि आज के समय की मांग है और जिसके प्रेरक भगवान श्रीराम हैं।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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