मनु स्मृति-गंदे स्थानों पर पैदा होने वाले पदार्थ खाने से बुद्धि भ्रष्ट होती है (bhojan aur buddhi-manu smriti)


लशुनं, गुंजनं चैव पलाण्डूंु कचकानि च।
अभ्याक्षाणि द्विजातीनामेध्यप्रवानि।
हिन्दी में भावार्थ-
लहसून, शलजम, प्याज, कुकरमुत्ता तथा अन्य ऐसे खाद्य पदार्थ जो गंदे स्थानों पर पैदा होते हैं, उनका सेवन करने से बुद्धि भृष्ट होती है। अतः इनके प्रयोग से बचना चाहिए।
लोहितान् वृक्षनिर्यासान् वश्चनप्रभवांस्तथा।
शेतुं गव्यं य पीयुषं प्रयत्नेन विवर्जयवेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
लाल रंग वाले पेड़ों का गोंद, वृक्षों में छिद्र करने से निकलने वाला द्रव्य तथा लेस वाले फल तथा हाल ही में बच्चे को जन्म देने वाली गाय के दूध का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे अकाल मृत्यु की संभावना रहती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम यह तो जानते हैं कि ‘स्वस्थ शरीर में ही प्रसन्न मन का निवास होता है’, तो हमें यह भी समझना चाहिए कि शीरर में मौजूद तत्व ही हमारी बुद्धि का संचालन करते हैं। हम पचने योग्य वस्तु का भक्षण करें यह बात स्वीकार्य है पर यह भी याद रखना चाहिये कि उनका बुद्धि पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी देखना चाहिए। अक्सर हम कहते हैं कि हमें यह पच जाता है या वह पच जाता है पर रक्त कणों में सम्मिलित उन खाद्य पदार्थों से आये जीवाणु किस मानसिकता के हैं यह भी देखना ठीक है।
देखा जाये तो मांस खाने से भी कोई मर नहीं जाता और लोग उसे पचा भी लेते हैं पर उससे आए विषाणु किस तरह मन को विकृत करते हैं यह उन लोगों की मानसिकता देखकर समझा जाता है जो इसका सेवन करते हैं। शराब तथा अन्य व्यसन करने वाले भी सभी कोई तत्काल नहीं मर जाते पर धीरे धीरे उनका दिमागी संतुलन बिगड़ने लगता है और उसका दुष्प्रभाव उनके जीवन में देखने को मिलता है।
प्याज और लहसुन को स्वास्थय के लिये अच्छा मानाा जाता है पर उनसे निर्मित होने वाली मानसिकता विकृत होती है शायद यही कारण है कि अनेक लोग इनके सेवन से बचते हैं। उसी तरह मांस खाना भी बहुत बुरा जाता है। वैसे मांस खाने वाले सभी उसे पचा लेते हैं पर प्रश्न यह है कि उसके साथ आये  विषैले विषाणु जो रक्त में घुलकर कलुषित मनुष्य की मानसिकता का निर्माण करते हैं उनका अध्ययन अभी तक नहीं किया गया है।
श्री मद्भागवत गीता में कहा गया है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते है।’ उसी तरह यह भी एक महावत है कि ‘जैसा खायें अन्न वैसा हो जाये मन’। अन्न खाने से आशय केवल उसके अच्छे या बुरे होने सा नहीं है बल्कि वह किस कमाई से खरीदा गया और कहां पैदा हो यह भी महत्वपूर्ण है। श्री मद भागवत गीता में भोजन के तीन प्रकार-सात्विक, राजसी तथा तामसी-बताये गये हैं। उनका अर्थ और भाव समझ कर खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

————
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Advertisements
Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: