भर्तृहरि नीति शतक-जीवन रूपी नदी में राग और अनुराग नाम के मगरमच्छ रहते हैं (jivan men rag aur anurag-hindu dharma sandesh)


आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुला
रामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी।
मोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराः।।
हिन्दी में भावार्थ- आशा एक नदी की भांति इसमे हमारी कामनाओं के रूप में जल भरा रहता है और तृष्णा रूपी लहरें ऊपर उठतीं है। यह नदी राग और अनुराग जैसे भयावह मगरमच्छों से भरी हुई हैं। तर्क वितर्क रूपी पंछी इस पर डेरा डाले रहते हैं। इसकी एक ही लहर मनुष्य के धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फैंकती है। मोह माया व्यक्ति को अज्ञान के रसातल में खींच ले जाती हैं, जहा चिंता रूपी चट्टानों से टकराता हैं। इस जीवन रूपी नदी को कोई शुद्ध हृदय वाला कोई योगी तपस्या, साधना और ध्यान से शक्ति अर्जित कर परमात्मा से संपर्क जोड़कर ही सहजता से पार कर पाता है।
वर्तमान सन्दर्भ में सम्पादकीय व्याख्या- मनुष्य मन तो चंचल है और उसमें कामनायें, तृष्णायें, तथा इच्छाओं का अनंत भंडार भरा हुआ है जो उसमें से तीर की तरह निकलकर देहधारी को इधर उधर दौड़ाती हैं।  अपने लिये धन संपदा जुटाने के बावजूद मनुष्य कभी विश्राम नहीं पाता है। मुख्य बात संकल्प से जुड़ी है। मनुष्य जब अपने अंदर पाने का मोह पालता है तो उसकी राह भी ऐसे ही हो जाती है। वह ऐसी ऐसी गुफा में पहुंच जाता है जिसमें चलते हुए कहीं भी उसे विराम नहीं मिलता है।  इसके विपरीत जो संतोष और त्याग का संकल्प धारण करते हैं उनको कभी भी इस बात की चिंता नहीं रहती कि कोई वस्तु मिली कि नहीं। जो मिल गया ठीक है और वह अपना कर्म करते हुए भगवान भक्ति में लीन हो जाते हैं।  तत्वज्ञानी जानते हैं कि मनुष्य अपने मन के वशीभूत होकर इस संसार में विचरण करता है इसलिये पर अपने पर नियंत्रण करते हुए स्वयं के स्वामी बनकर जीवन व्यतीत करते हैं। इसके विपरीत जो मन की गति और स्वरूप को नहीं जानते वह उसके दास होकर विचरते हैं यह अलग बात है कि उनको अपने स्वतंत्र होने का भ्रम होता है जबकि अहंता, ममता और वासना उन पर शासन करती हैं। जिनके इशारे पर चलता हुआ मनुष्य अज्ञान की राह में बिता देता हैं और उसकी इच्छाऐं, कामनायें तथा तृष्णायें कभी शांत नहीं होती।

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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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टिप्पणियाँ

  • राम त्यागी  On 18/05/2010 at 10:17

    जानकर अच्छा लगा की आप भी ग्वालियर से हो, में भी ग्वालियर से हूँ और आजकल शिकागो में हूँ. चलो आपके ब्लॉग पर आने की कोसिस करता रहूँगा. आशा है तो जीवन में कुछ करने की आंकाक्षा है …आशा तो हर वक्त होनी ही चाहिए …अच्छा विचार पेश किया है …धन्यवाद

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