संत कबीर वाणी-परखने के बाद किसी से संपर्क बढ़ायें (sant kabir vani-manushya ko parkhen)


कबीर देखी परखि ले, परिख के मुखा बुलाय।
जैसी अंतर होयगी, मुख निकसेगी आय।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति मिले तो पहले उसे परखो फिर उसके मुंह से कुछ बुलवाओ। जैसी बात उसके अंदर होगी वैसी ही बाहर निकल आयेगी।
पहिले शब्द पिछानिये, पीछे कीजै मोल।
पारख परखै रतन को, शब्द का मोल न तोल।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पहले दूसरे के कहे शब्द को पहचाने फिर उसके साथ अपना व्यवहार या संपर्क कायम करें। रतन को परख कर उसकी कीमत लगाई जा सकती है पर शब्द का कोई मोल नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में पुण्यात्मा तथा पापात्मा दोनों प्रकार के मनुष्य रहते हैं। पुण्यात्मा पुरुष कभी अपने मुख से प्रशंसा करते हुए स्वार्थ की सिद्धि के लिये किसी मनुष्य से संपर्क नहीं करते। जिनका लक्ष्य केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करना है वह मुंह से मीठा बोलते हैं तथा अपना काम होने पर गधे को बाप मानने को तैयार हो जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जो लोग जानबुझकर संपर्क बनाते हैं उनकी प्रवृत्तियों को पहले समझ लेना चाहिये। इसके लिये यह जरूरी है कि उनके मुख से निकलने वाले वाक्यों का विश्लेषण किया जाये। कोई मीठा बोले या चाटुकारिता करे तो उसे अच्छा मान लेने की गलती नहीं करना चाहिए।
लोग द्विअर्थी बातें बोलते हैं ताकि समय पड़ने पर अपने वादे से मुकरा जा सके। इसलिये अपने संपर्क में रहने वाले व्यक्तियों के मुख से निकलने वाले शब्द तथा व्यवहार पर दृष्टिपात अवश्य करना चाहिये। इतना ही नहीं संबंधों की गहराई का भी माप लेना चाहिये। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो प्रतिदिन मिलते हैं पर उनसे संबंध औपचारिक होते हैं इसलिये उन पर अधिक विश्वास नहीं करना चाहिये। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे आत्मीयता होती है पर वह दैहिक रूप परे निवास करते हैं। समय पड़ने पर वह काम आते हैं इसलिये उनको भुलाना नहीं चाहिए।

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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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