गरीबी महफिल में खूब फबती-हिन्दी शायरी (garibi aur mahfil-hindi shayri)


लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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वफा हम सभी से निभाते रहे

क्योंकि गद्दारी का नफा पता न था।

सोचते थे लोग तारीफ करेंगे हमारी

लिखेंगे अल्हड़ों में नाम, पता न था।

——

राहगीरों को दी हमेशा सिर पर छांव

जब तक पेड़ उस सड़क पर खड़ा था।

लोहे के काफिलों के लिये कम पड़ा रास्ता

कट गया, अब पत्थर का होटल खड़ा था।

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जुल्म, भूख और बेरहमी कभी

इस जहां से खत्म नहीं हो सकती।

उनसे लड़ने के नारे सुनना अच्छा लगता है

गरीबी बुरी, पर महफिल में खूब फबती।

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हमारे शब्दों को उन्होंने अपना बनाया

बस, अपना नाम ही उनके साथ सजा लिया।

उनकी कलम में स्याही कम रही हमेशा

इसलिये उससे केवल दस्तखत का काम किया।

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टिप्पणियाँ

  • shayareazam  On 01/06/2011 at 20:52

    shayareazamGood one awesome

  • rawalkishore  On 11/06/2011 at 16:14

    भ्रष्ट नेता
    l वाह रे वाह नेता दमदार l
    ll कैसा फैलाया हैं मायाजाल ll

    l हर क्षेत्र में ये पारंगत l
    ll क्षण में बदले अपनी फितरत ll

    l बुद्धिवान गुनी अति चातुर l
    ll देश का पैसा खाने को आतुर ll

    l चोर डाकू के तुम रखवाले l
    ll इनकी मदद करे बिन पैसा ले ll

    l देश दुनिया में आग लगाई l
    ll अपने घर पर साज सजाई ll

    l चले ये मंत्री सांप की चाल l
    ll करे देश का बंटाधार ll

    l करते-रहते गड़बड़ घोटाला l
    ll अपने हाँथ करे मुंह काला ll

    l एक दुसरे की कुर्सी खिंचावे l
    ll अपने सिर के बाल नुचावें ll

    l देश की जनता मरती भूखी-प्यासी l
    ll देते नहीं एक भी सुखी रोटी ll

    l नाम किया हैं अब बदनाम l
    ll देश को करे लहुलुहान ll

    l देश की जनता पर करे हैं वर l
    ll मचा हैं कैसा हाहाकार ll

    l भारत को नौच-नौच के खावे l
    ll बन्दर जैसा नाच नचावे ll

    l रावन होत अब शर्मिंदा l
    ll मुझे बड़ा कौन ये दरिंदा ll

    l जा-जय-जय इनकी सरकार l
    ll बंद करो ये अत्याचार ll
    By…Rawal Kishore

  • ashutosh pratap gautam  On 04/12/2012 at 19:04

    garib hona sabse jyada gunah hai.jindgi har woqt garibi par julm dhati rahi.ek ek dane har pal rulati rahi.jage rahe jb tak dard se tadpte rahe.jindgi unako maut ki neend sulati rahi.uff ye garibi.koi bhar pet kha k hansata raha.to ye hi bhukhe pet par muskurati rahi.

  • rajesh lakhyani  On 19/08/2013 at 13:31

    jai sarkar jai brastachar,nikamo ki sarkar mat karo atchayar

  • vinodkanabar  On 26/03/2014 at 19:49

    Bahot badhiya

  • NAGENDRA KUMAR  On 11/04/2014 at 14:05

    “THANK” “YOU”
    Es lekh ko padkar bahut achchha laga.

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