विदुर नीति-कोमल व्यवहार तीर्थ करने समान (komal vyavhar aur teerth-hindi sandesh)


सर्वतोर्थेषु वा स्नानं स्र्वभूतेषु चार्जवम्।
उभे त्वेते समेस्यातामार्जवं वा विशिष्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
अनेक जगह तीर्थों पर स्नान करना तथा प्राणियों के साथ कोमलता का व्यवहार करना एक समान है। कोमलता के व्यवहार का तीर्थों से अधिक महत्व है।
यावत् कीर्तिर्ममनुष्य पुण्या लोके प्रगीयते।
तावत् स पुरुषव्याघ्र स्वर्गलोके महीयते।।
हिन्दी में भावार्थ-
इस धरती पर किसी भी मनुष्य की जब तक पवित्र प्रतिष्ठा या कीर्ति रहती है तभी तक वह स्वर्ग में निवास करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे धर्म में तीर्थों का विशेष महत्व है। पर्यटन, अध्यात्मिक तथा वैचारिक शुद्धता के लिये तीर्थों पर जाना अच्छी बात है। इतना अवश्य ध्यान रखें कि सामान्य स्थिति में अपने आसपास रहने वाले लोगों के साथ कोमलता का व्यवहार करें जो कि तीर्थों की तरह फल देने वाला होता है। साथ ही यह भी प्रयास करें कि अपने हृदय में हमेशा दूसरों के लिये कोमल भाव रहे। हर व्यक्ति के लिये मंगल कामना करें न कि दिखावे के लिये कोमलता दिखायें। यह ढोंग होगा और इससे न तो दूसरे के हृदय को शांति नहीं मिलेगी और न ही अपना भला होगा। बाहरी कोमलता अंदर की कटुता को खत्म नहीं करती और कहीं न कहीं वह चेहरे पर प्रकट हो जाती है। कोमल व्यवहार से अभिप्राय यही है कि वह हृदय से उत्पन्न होना चाहिए।
अक्सर हमारे देश में स्वर्ग पाने और दिलाने की आड़ में धार्मिक खेल चलता है। इसके लिये लोग धन खर्च करते हैं और ढोंगी उनसे अपना आर्थिक सम्राज्य स्थापित करते हैं। अनेक लोग तो यह धन दूसरों से ठगकर या शोषण कर एकत्रित करते हैं और उनकी अपकीर्ति चारों तरफ फैल रही होती है। सच बात तो यह है कि जिसकी कीर्ति इस संसार में नहीं है उसे स्वर्ग कभी नहीं मिल सकता और जिसने अपने व्यवहार से यहां कीर्ति प्राप्त की तो उसका हृदय वैसे ही शुद्ध हो जाता है और वह यहां तो धरती पर ही स्वर्ग प्राप्त करता ही है आकाश में उसके लिये तब तक जगह बनी रहती है जब तक उसकी कीर्ति इस धरती पर बनी रहती है। अतः जहां तक हो सके हृदय में कोमलता का भाव धारण कर सभी से मधुर व्यवहार करें।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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