संत कबीर वाणी-ढंग से बोलने वाले जिंदगी में कभी नहीं हारते (theek bolne vale nahin harte-sant kabir vani)


मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार।
हते पराई आतमा, जीभ बांधि तलवार।।
भावार्थ-
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मन में जो आता है, वही अपने मुख से बक देते हैं। वह अपनी जीभ का तलवार की तरह उपयोग कर दूसरे की आत्मा को कष्ट पहुंचाते हैं।
बोलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि।
कहैं कबीर ता दास को, कबहु न आवै हारि।
भावार्थ-
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब भी कुछ बोलना हो विचार कर बोलें तथा अपने लक्ष्य का ध्यान रखें। जो आदमी सोच समझ कर बोलता है वह जीवन में कभी नहीं हारता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम अपने देश में आये दिन होने वाले झगड़ों को देखें तो अधिकतर बिना मतलब के होते हैं जो केवल इसलिये पैदा होते हैं क्योंकि आपस में मधुर संवाद करने का तरीका कुछ लोगों को नहीं होता। सबसे पहले तो जातीय झगड़ों की बात करें। अक्सर लोग यही कहा जाता है कि बड़ी जाति के लोग छोटी जाति के लोगों को ढंग से नहीं बुलाते। इससे बड़ी बात क्या होगी कि शायद अपना देश दुनियां में पहला ऐसा देश होगा जहां संबोधन को लेकर भी नियम हैं कि आप अमुक जाति का नाम लेकर नहीं पुकार सकते। यहां जब भी आदमी बौखलाता है दूसरे को उसकी जाति का नाम लेकर गाली देता है। बहुत छोटी लगने वाली यह बात महत्वपूर्ण है जिसे समझना चाहिये। दरअसल इसी बातचीत से पनपे झगड़ों ने समाज में हमेशा ही विघटना पैदा किया जिसके कारण विदेशियों को यहां राज्य का अवसर मिला। शायद यही कारण है कि हमारे प्राचीन मनीषी हमेशा ही मधुर वचन बोलने का संदेश देते रहे क्योंकि वह जानते थे कि समाज में यह एक भयानक बीमारी है कि लोग एक दूसरे के लिये अपशब्दों का प्रयोग करने में नहीं हिचकते जो कि कालांतर में समाज और राष्ट्र के लिये घातक बनता है।

हमने देखा होगा कि मधुर वचन बोलने वाले हमेशा ही अपना काम निकाल जाते हैं। हालांकि इसकी आड़ में कुछ लोग चाटुकारिता भी करते हैं पर इतना तय है कि उनका कोई काम रुकता नहीं है। ऐसे में जहां तक हो सके आदमी बड़ा हो तो उससे हम स्वतः ही नम्रता से बोलते हैं पर अपने से छोटा भी हो तो भी उससे मधुरा शब्दों में बात करें-इस जीवन में पता नहीं कब किसकी आवश्यकता पड़ जाये। आपने सुना होगा कि जहां सुई काम करती है वहां तलवार काम नहीं करती। इसलिये अगर जीवन में हमेशा विजेता की तरह बने रहना है तो अपने शब्दों में मधुरता लायें।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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टिप्पणियाँ

  • Dr Parveen Chopra  On 17/10/2009 at 06:32

    बहुत सुंदर लिखा है—काश, इन बातों को हम लोग हमेशा याद रखें तो इस दुनिया का नक्शा ही बदल जायेगा। पता नहीं क्यों आज कल लोग अक्खड़ता को भी एक स्टेट्स सिंबल सा ही मानने लगे हैं —एक आध बात तो मजबूरी होती है, लेकिन अगली बार तो मैं ऐसे लोगों से दूर भागता हूं। दीवाली की बहुत बहुत शुभकामनायें।

  • Suman  On 17/10/2009 at 09:39

    दीपावली, गोवर्धन-पूजा और भइया-दूज पर आपको ढेरों शुभकामनाएँ!

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