अकेला अक्षर-हिंदी कविता (akshara,shabda & bhasha-hindi kavita)


कभी शब्द नहीं बनता
अकेला शब्द कभी भाषा नहीं बनता।
कई मिलकर बनाते हैं एक भाव समूह
जिससे उनका निज परिचय बनता।
एक का अस्तित्व कौन जानेगा
जब तक दूसरा नहीं दिखेगा
कहीं से पढ़कर ही कोई अपने हाथ से लिखेगा
भाषा में एक अकेला शब्द अहंकार भी है
जिसके भाव के इर्द गिर्द घूम रहा हर कोई
विनम्रता से परे सारी जनता।
अक्षर का अकेलापन
शब्द का बौनापन
बृहद भाषा समूह के बिना दर्दनाक होता है
जो जान लेता है
वही सच्चा लेखक बनता

…………………………..
नजर और नजरिया-हिन्दी शायरी (nazar aur nazariya-hindi shayri)
अपनी पीर किसे दिखाऊं
हर शख्स आकंठ डूबा है
अपनी ही तकलीफों में
किसको अपना समंदर दिखाऊं।

लोगों के नजर और नजरिये में
इतना फर्क आ जाता है
जो सोचते और देखते है
अल्फाजों में बयां दूसरा ही बन जाता है
सुनते कुछ हैं
समझ में कुछ और ही आता है
पहले उनको अपना दर्द दिखाऊं
या इलाज करना सिखाऊं

………………………

लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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टिप्पणियाँ

  • pravin kumar tiwari  On 24/09/2011 at 08:51

    ,…यहु मन तक जाता है

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