संगीत से सोच का अपहरण-आलेख(music in hindi film and tv)


किसी समय फिल्मों में पाश्र्व संगीत की सहायता से दृश्यों को भावपूर्ण बनाया जाता था। सामान्य स्थिति में दो व्यक्तियों के मध्य केवल संवाद होने पर तीसरा व्यक्ति उन पर सहजता से ध्यान देता है। अगर उनके वार्तालाप में कुछ बात अपने समझने लायक हो तो उस पर अपनी राय भी देता है। अगर वार्तालाप का विषय उसे प्रिय न हो तो वह अनसुना भी कर सकता है। चूंकि फिल्मों में दर्शक को बांधे रखना जरूरी है इसलिये उसमें संगीत इस तरह डाला जाता है कि बेकार का संवाद भी प्रभावपूर्ण हो जाता है क्योंकि जो भाव अभिनेत्री अभिनेत्री के शब्द और सुर नहीं उभार सकते वह काम संगीत कर देता है। निर्देशक इस संगीत को मसाले की तरह सजाता है ताकि दर्शक एक मिनट भी अपने दिमाग में जाकर विचार न करे।
अगर किसी संवाद में विरह रस इंगित करना है तो उसी तरह का संगीत जोड़ दिया जाता है जिससे दर्शक या श्रोता उसमें बह जाये। अगर कहीं वीभत्स रस भरना है तो उसी तरह का भयानक शोर वाला संगीत प्रस्तुत किया जाता है। कहीं करुणा का भाव है तो संगीत को इस तरह जोड़ा जाता है कि संवाद और पात्र के सुर प्रभावी न हों तो भी आदमी अपनी जज्बातों की धारा में बह जाये। जैसे जैसे मनोरंजन के साधनों का विस्तार हुआ तो रेडियो और टीवी चैनलों में भी इसका प्रयोग होने लगा है। एक तरह से पाश्र्व संगीत आम आदमी के निजी भावों का अपहरण करने वाला साधन बन गया है।
टीवी चैनलों में सामाजिक धारावाहिकों में वीभत्स सुर का खूब प्रयोग हो रहा है। कहीं सास, कहीं बहु तो कहीं ननद जब अपने मन में किसी षड्यंत्र का विचार करती दिखाई देती है तो उसके पाश्र्व में दनादन संगीत का शोर मचा रहता है जिसमें संवाद न भी सुनाई दे तो इतना तो लग जाता है कि वह कोई भला काम नहीं करने जा रही। करोड़पति बनाने वाला कार्यक्रम सभी को याद होगा। अगर उसमें संगीत के उतार चढ़ाव नहीं होता तो शायद इतने दर्शक उससे प्रभावित नहीं होते।
यह केवल टीवी चैनल ही उपयोग नहीं कर रहे बल्कि अनेक संत अपने प्रवचनों में भी अपनी बात के लिये इसका उपयोग कर रहे हैं। उस दिन एक संत देशभक्ति की बात करते हुए भावुक हो रहे थे। वह शहीदों की कुर्बानी को याद करते हुए आंखों में आंसु बहाते नजर आये। उस समय पाश्र्व में करुण रस से सराबोर संगीत बज रहा था। स्पष्टतः यह व्यवसायिकता का ही परिणाम था।
सच कहें तो यह पाश्र्व संगीत एक तरह से पैबंद की तरह हो गया है। धारावाहिकों और फिल्मों में अभिनेता अभिनेत्रियों के अभिनय से अधिक उनकी उससे अलग गतिविधियों की चर्चा अधिक होती है। हमारे अभिनेता और अभिनेत्रियां खूब कमा रहे हैं पर फिर भी उनको विदेशी कलाकारों से कमतर माना जाता है। सिफारिश के आधार पर ही लोग फिल्मों और धारावाहिकों में पहुंच रहे हैं। कहने को कलाकार हैं पर कला से उनका कम वास्ता कमाने से अधिक है। कुछेक को छोड़ दें तो अनेक हिंदी में काम करने वाले कलाकारों को तो हिंदी भी नहीं आती। अक्सर लोग यह सोचते हैं कि यह कलाकार अंग्रेजी में बोलकर हिंदी का अपमान करते हैं पर यह एक भ्रम लगता है क्योंकि उनकी पारिवारिक और शैक्षिक प्रष्ठभूमि इस बात को दर्शाती है कि उनको हिंदी का ज्ञान नहीं है। इतना ही नहीं अनेक गायक और गायिकायें ऐसे भी हैं जो केवल इसी पाश्र्व संगीत के कारण चमक जाते हैं।
देश में अनेक विवादास्पद धारावाहिकों को लेकर चर्चा होती है अगर आप गौर करें तो पायेंगे कि वह पाश्र्व संगीत के सहारे ही लोगों के जज्बातों को उभारते हैं। अगर उनमें संगीत न हो तो शायद आदमी इतना प्रभावित भी न हो और उनकी चर्चा भी न करे। यह तो गनीमत है कि समाचारों के साथ ऐसे ही किसी पाश्र्व संगीत की कोई प्रथा विदेश में नहीं है वरना हमारे समाचार चैनल उसका अनुकरण जरूर करते। अलबत्ता वह सनसनी खेज रिपोर्टों में वह इसका उपयोग खूब करते हैं तभी थोड़ी सनसनी फैलती नजर आती है। इसके अलावा वह ऐसे ही संगीतमय धारावाहिकों का प्रचार अपने कार्यक्रमों में कर संगीत की कमी को पूरा कर लेते हैं। सच कहा जाये तो पाशर्व संगीत आदमी की सोच को अपहरण करने वाला अस्त्र बन गया है।
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‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’

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