संत कबीरदास वाणी-शरीर देवालय और मन ध्वजा है


काया देवल मन धजा, विषय लहर फहराय।
मन चलते देवल चले, ताका सरबय जाय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शरीर देवालय और मन झंडे की तरह है। विषय लहरों की तरह हैं। चंचल मन के वेग से देवालय यानि यह शरीर भी चलायमान होता है। अंततः सब नष्ट हो जाता है।
काया कजरी बन अहै, मन कुंजर महमन्त।
अंकुस ज्ञान रतन है, फेरै साधु संत।।

संत शिरामणि कबीरदास जी का यह आशय है कि यह शरीर तो जंगल की तरह जिसमें मन रूपी हाथी मस्ती से विचरण करता है। उस पर ज्ञान रूपी अंकुश ही नियंत्रण रख सकता है वरना तो यह साधु और संतों को भी विचलित कर देता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-मनुष्य का मन ऐसी शय है जिस पर नियंत्रण कर लिया जाये तो फिर वह नियंत्रणकर्ता का गुलाम बन जाता है। इसी प्रवृत्ति के कारण विज्ञापन एक व्यवसाय बन गया है। आधुनिक संचार माध्यमों ने तो एक तरह से मनुष्य को गुलाम बना दिया है। जिस उत्पाद का विज्ञापन आधुनिक संचार माध्यमों में दिखता है उसकी बिक्री बढ़ जाती है। कोई गाना आदमी सुनता है तो उसे गुनगुनाने लगता है। कहने का तात्पर्य है कि इस मायावी संसार में मायापति अब विज्ञापन के जरिये ही मनुष्य को उपभोक्ता बनाकर उसे अपने नियंत्रण में लेते हैं।
हमारे समाज पर फिल्मों का बहुत प्रभाव पड़ता है इसी कारण उसमें जो दिखाया जाता है लोग उसे ही सच मान लेते हैं। काल्पनिक पात्रों का अभिनय करने वाले कलाकार आजकल नये भगवान बन गये हैं। वह भारतीय जनमानस पर ऐसे छाये हुए हैं कि व्यवसायिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र के शिखर पुरुष भी इन अभिनेताओं के साथ फोटो खिंचवाकर अपने को धन्य समझते हैं-केवल इस कारण कि आम जनमानस उनका भी चेहरा अवश्य देखेंगे। अनेक विचार समूह इन्हीं फिल्मों के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से इन्ही फिल्मों और धारावाहिकों के जरिये अपना प्रचार कर रहे हैं। इन फिल्मों और धारावाहिकों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष से प्रायोजित करने वाले व्यवसायी अपने धार्मिक, सामाजिक, तथा आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। इसके लिये अब उनको अलग से प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। वजह यह है कि भारतीय जनमानस अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है और काल्पनिक पात्रों में ही अपना अस्तित्व ढूंढने का प्रयास करता है और इसी कारण वह आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक रूप से गुलाम बना हुआ है। सभी जानते हैं कि बाजार पर केवल स्वार्थी लोगों का नियंत्रण है पर फिर भी उसके प्रचार में बह जाते हैं। इनसे अपने मन को बचाने के लिये अंकुश केवल भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान ही है पर वह तभी अपने हाथ में आ सकता है जब उसके लिये थोड़ा प्रयास किया जाये।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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