चाणक्य नीतिः विद्या के लिये सुख का त्याग जरूरी


सुखार्थी वा त्यजेविद्वधां विद्याथी वा त्यजेत् सुखम्
सुखार्थिनः कुतो विद्वा विद्यार्थिनः कुतो सुखम्।।

हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि सुख की कामना हो तो विद्या की इच्छा त्याग दें और यदि विद्या प्राप्त करने का उद्देश्य हो तो सुख की कामना त्याग दें। सुख की चाहत करने वालों को विद्या और विद्या प्राप्त की चाहता करने वाले का सुख का विचार नहीं करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पहले गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी जहां शिष्य को हर तरह के विषय का ज्ञान प्रदान किया जाता था । जब गुरुकुल से शिष्य निकलता था तो वह हर विधा में पारंगत होता था। राजा महाराजा तक के बच्चे वहां गुरु और आश्रम की सेवा में ऐसे काम करते थे जिनको मजदूर करते हैं। इस तरह अधिक शिक्षि होने पर भी उनमें छोटे काम के प्रति उपेक्षा का भाव नहीं होता था।
आधुनिक शिक्षा में छात्रों को अपने ही छात्रावास में अनेक प्रकार की सुविधा दिलाने के विज्ञापन देखने पर यह आभास होता है कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में विद्या कम सुविधायें अधिक देने पर विचार होता है। फिर अपने घर पर ही शिक्षा प्राप्त करने की प्रवृत्ति ने छात्रों के ज्ञान को सीमित कर दिया है। वह विद्यालयों और महाविद्यालयों में अपने विषय से संबद्ध शिक्षा प्राप्त तो कर लेते हैं पर जीवन के रहस्य, चरित्र और नैतिकता के सिद्धांतों को उनको ज्ञान नहीं रहता।

शिक्षित तो हमारे समाज में बहुत हैं पर विद्याधर और ज्ञानी कितने हैं यह हम देख ही रहे हैं। सारे सुख और सुविधायें होते हुए अक्षर ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है पर अक्षर विद्या बहुत बृहद है उसे समझने के लिये यह जरूरी है कि सुखों का त्याग किया जाये। विद्या से आशय अपने विषय के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान होने से भी है जो आजकल बहुत कम लोगों के पास है। इसका कारण यह है कि छात्रों को शिक्षा के दौरान ही विलासित की वस्तुओं के उपभोग की आदत पड़ जाती है।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग ‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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टिप्पणियाँ

  • संगीता पुरी  On 13/04/2009 at 15:28

    बडी ही दुखद स्थिति है … आजकल ज्ञानार्जन करने के बाद भी लोग ज्ञानी नहीं बन रहे।

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