संत कबीर के दोहे-मन तो खाने में लालची और भजन में आलसी होता है


कबीर यह मन लालची, समझै नहीं गंवार।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी के मतानुसार मन खाने में एक तरह से लालची और भजन में आलसी होता है। वह एक गंवार की तरह है जो कोई बात समझना ही नहीं चाहता है।

कबीर मन परबत भया, अब मैं पाया जान
टांकी लागी प्रेम की, निकसी कंचन खान

संत कबीरदास जी के अनुसार अब मैं समझ पाया हूं कि मन तो पर्वत की तरह विशाल है। अगर इसमें प्रेम का टांका लगा दिया जाये तो सोने का भंडार मिलता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे प्राचीन अध्यात्मिक मनीषियों ने यह रहस्या बहुत पहले ही खोज निकाला कि मनुष्य ही नहीं बल्कि हर जीव अपने मन से संचालित होता हैं। पांच तत्वों से बनी इस देह में तीन प्रकृतियां मन, बुद्धि और अहंकार रहती हैं और समय के अनुसार उनका कार्य भी होता हैं। मन को चंचल माना जाता है यही कारण है कि कोई भी जीव एक जगह स्थिर नहीं रह पाता। यह मन शक्तिशाली है इसलिये इस पर नियंत्रण रखा जाये तो जीवन सफल हो जाता है पर अगर इसके नियंत्रण में रहकर काम किया तो पूरा जीवन गुलाम की तरह बिताना पड़ता है। श्रीगीता के अनुसार गुण ही गुणों के बरतते हैं। अगर हम अपने मन में विलासिता, घृणा और लोभ के बीज बोंऐंगे तो उनके पीछे हम अपनी देह साथ ही ले जायेंगे जो कि अंततः हमारें दुःख का कारण बनेगा। उसी तरह अगर उसमें प्रेम, त्याग और विश्वास के बीज बोऐंगे तो उसका फल सुखद होगा। अतः मन को दृष्टा की तरह देखना चाहिये तभी उसे नियंत्रण में ला पायेंगे।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग ‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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