भर्तृहरि शतकः कामदेव के प्रहार कौन झेल पाता है?


तावन्महत्त्वं पाण्डित्यं कुलीन्त्वं विवेकता।
यावज्ज्वलति नांगेषु पंचेषु पावकः

हिंदी में भावार्थ-विद्वता,सज्जनता,कुलीनता तथा बुद्धिमानी का ज्ञान तब तक ही मनुष्य के हृदय में रहता है जब तक कामदेव का हमला उस पर नहीं होता। उसक बाद तो सभी पवित्र भाव नष्ट हो जाते है।
संपादकीय व्याख्या-समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में अनेक ऐसे समाचार आते हैं जिसमें कथित साधु संतों, धनपतियों,प्रतिष्ठित परिवारों और समाजसेवा में रत लोगों के यौन प्रकरणों की चर्चा होती है। उस समय हमारे मन में यह बात आती है कि ‘अमुक व्यक्ति तो बहुत प्रसिद्ध,ज्ञानी,कुलीन और धनी है भला वह कैसे ऐसे प्रकरण में लिप्त हो सकता है।’ सच बात तो यह है कि जब मनुष्य पर काम भावना का प्रहार होता है तब वह विपरीत लिंग के आकर्षण के जाल में ऐसा फंस जाता है कि वहां से उसका निकलना कठिन है।’
वैसे तो हमारा समाज भी यह बात मानता है कि आम आदमी को यहां किसी प्रकार की आजादी नहीं है पर बड़े आदमी को सभी प्रकार की छूट है। कहते हैं न कि ‘बड़े आदमियों को कौन कहता है। पर हम तो छोटे आदमी है इसलिये समाज को देखकर चलना पड़ता है।’ यही कारण है कि जो समाज के शिखर पर बैठे हैं पर इसकी परवाह नहीं करते कि उनके यौन प्रकरणों पर सामान्य लोग क्या कहेंगे? वैसे भी काम भावना समाज, नैतिकता और आदर्श पर चलने किसे देती है उस पर धन,प्रसिद्धि, और बाहूबल आदमी को वैसे ही मंदाध बना देता है। ऐसे में कामदेव का आक्रमण तो घुटने टेकने को बाध्य कर देता है।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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