‘भ्रष्टाचार’ किसी कहानी का मुख्य विषय क्यों नहीं होता -आलेख


स्वतंत्रता के बाद देश का बौद्धिक वर्ग दो भागों में बंट गया हैं। एक तो वह जो प्रगतिशील है दूसरा वह जो नहीं प्रगतिशील नहीं है। कुछ लोग सांस्कृतिक और धर्मवादियों को भी गैर प्रगतिशील कहते हैं। दोनों प्रकार के लेखक और बुद्धिजीवी आपस में अनेक विषयों पर वाद विवाद करते हैं और देश की हर समस्या पर उनका नजरिया अपनी विचारधारा के अनुसार तय होता है। देश में बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकटों पर पर ढेर सारी कहानियां लिखी जाती हैं पर उनके पैदा करने वाले कारणों पर कोई नहीं लिखता। अर्थशास्त्र के अंतर्गत भारत की मुख्य समस्याओं में ‘धन का असमान वितरण’ और कुप्रबंध भी पढ़ाया जाता है। बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकट कोई समस्या नहीं बल्कि इन दोनों समस्याओं से उपजी बिमारियां हैं। जिसे हम भ्रष्टाचार कहते हैं वह कुप्रबंध का ही पर्यायवाची शब्द है। मगर भ्रष्टाचार पर समाचार होते हैं उन पर कोई कहानी लिखी नहीं जाती। भ्रष्टाचारी को नाटकों और पर्दे पर दिखाया जाता है पर सतही तौर पर।

अनेक बार व्यक्तियों के आचरण और कृतित्व पर दोनों प्रकार के बुद्धिजीवी आपस में बहस करते है। अपनी विचारधाराओं के अनुसार वह समय समय गरीबों और निराश्रितों के मसीहाओं को निर्माण करते हैं। एक मसीहा का निर्माण करता है दूसरा उसके दोष गिनाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सतही बहसें होती हैं पर देश की समस्याओं के मूल में कोई झांककर नहीं देखता। फिल्म,पत्रकारिता,नाटक और समाजसेवा में सक्र्रिय बुद्धिजीवियों तंग दायरों में लिखने और बोलने के आदी हो चुके हैं। लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिसमें स्वयं की चिंतन क्षमता तो किसी मेें विकसित हो ही नहीं सकती और उसमें शिक्षित बुद्धिजीवी अपने कल्पित मसीहाओं की राह पर चलते हुए नारे लगाते और ‘वाद’गढ़ते जाते हैं।

साहित्य,नाटक और फिल्मों की पटकथाओं में भुखमरी और बेरोजगारी का चित्रण कर अनेक लोग सम्मानित हो चुके हैं। विदेशों में भी कई लोग पुरस्कार और सम्मान पाया है। भुखमरी, बेरोजगारी,और गरीबी के विरुद्ध एक अघोषित आंदोलन प्रचार माध्यमों में चलता तो दिखता है पर देश के भ्रष्टाचार पर कहीं कोई सामूहिक प्रहार होता हो यह नजर नहंी आता। आखिर इसका कारण क्या है? किसी कहानी का मुख्य पात्र भ्रष्टाचारी क्यों नहीं हेाता? क्या इसलिये कि लोगों की उससे सहानुभूति नहीं मिलती? भूखे,गरीब और बेरोजगार से नायक बन जाने की कथा लोगों को बहुत अच्छी लगती है मगर सब कुछ होते हुए भी लालच लोभ के कारण अतिरिक्त आय की चाहत में आदमी किस तरह भ्रष्ट हो जाता है इस पर लिखी गयी कहानी या फिल्म से शायद ही कोई प्रभावित हो।
भ्रष्टाचार या कुप्रबंध इस देश को खोखला किये दे रहा है। इस बारे में ढेर सारे समाचार आते हैं पर कोई पात्र इस पर नहीं गढ़ा गया जो प्रसिद्ध हो सके। भ्रष्टाचार पर साहित्य,नाटक या फिल्म में कहानी लिखने का अर्थ है कि थोड़ा अधिक गंभीरता से सोचना और लोग इससे बचना चाहते हैं। सुखांत कहानियों के आदी हो चुके लेखक डरते हैं कोई ऐसी दुखांत कहानी लिखने से जिसमें कोई आदमी सच्चाई से भ्रष्टाचार की तरफ जाता है। फिर भ्रष्टाचार पर कहानियां लिखते हुए कुछ ऐसी सच्चाईयां भी लिखनी पड़ेंगी जिससे उनकी विचारधारा आहत होगी। अभी कुछ दिन पहले एक समाचार में मुंबई की एक ऐसी औरत का जिक्र आया था जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती थी। जब भ्र्रष्टाचार पर लिखेंगे तो ऐसी कई कहानियां आयेंगी जिससे महिलाओं के खल पात्रों का सृजन भी करना पड़ेगा। दोनों विचारधाराओं के लेखक तो महिलाओं के कल्याण का नारा लगाते हैं फिर भला वह ऐसी किसी महिला पात्र पर कहानी कहां से लिखेंगे जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती हो।
फिल्म बनाने वाले भी भला ऐसी कहानियां क्यों विदेश में दिखायेंगे जिसमें देश की बदनामी होती हो। सच है गरीब,भुखमरी और गरीबी दिखाकर तो कर्ज और सम्मान दोनों ही मिल जाते हैं और भ्रष्टाचार को केंदीय पात्र बनाया तो भला कौन सम्मान देगा।
देश में विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने समाज को टुकड़ों में बांटकर देखने का जो क्रम चलाया है वह अभी भी जारी है। देश की अनेक व्यवस्थायें पश्चिम के विचारों पर आधारित हैं और अंग्रेज लेखक जार्ज बर्नाड शा ने कहा था कि ‘दो नंबर का काम किये बिना कोई अमीर नहीं बन सकता।’ ऐसे में अनेक लेखक एक नंबर से लोगों के अमीर होने की कहानियां बनाते हैं और वह सफल हो जाते हैं तब उनके साहित्य की सच्चाई पर प्रश्न तो उठते ही हैं और यह भी लगता है कि लोगा ख्वाबों में जी रहे। अपने आसपास के कटु सत्यों को वह उस समय भुला देते हैं जब वह कहानियां पढ़ते और फिल्म देखते हैं। भ्रष्टाचार कोई सरकारी नहीं बल्कि गैरसरकारी क्षेत्र में भी कम नहीं है-हाल ही में एक कंपनी द्वारा किये घोटाले से यह जाहिर भी हो गया है।

आखिर आदमी क्या स्वेच्छा से ही भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित होता है? सब जानते हैं कि इसके लिये कई कारण हैं। घर में पैसा आ जाये तो कोई नहीं पूछता कि कहां से आया? घर के मुखिया पर हमेशा दबाव डाला जाता है कि वह कहीं से पैसा लाये? ऐसे में सरकारी हो या गैरसरकारी क्षेत्र लोगों के मन में हमेशा अपनी तय आय से अधिक पैसे का लोभ बना रहता है और जहां उसे अवसर मिला वह अपना हाथ बढ़ा देता है। अगर वह कोई चोरी किया गया धन भी घर लाये तो शायद ही कोई सदस्य उसे उसके लिये उलाहना दे। शादी विवाहों के अवसर पर अनेक लोग जिस तरह खर्चा करते हैं उसे देखा जाये तो पता लग जाता है कि किस तरह उनके पास अनाप शनाप पैसा है।
कहने का तात्पर्य है कि हर आदमी पर धनार्जन करने का दबाव है और वह उसे गलत मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। जैसे जैसे निजी क्षेत्र का विस्तार हो रहा है उसमें भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। नकली दूध और घी बनाना भला क्या भ्रष्टाचार नहीं है। अनेक प्रकार का मिलावटी और नकली सामान बाजार में बिकता है और वह भी सामाजिक भ्रष्टाचार का ही एक हिस्सा है। ऐसे में भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर उस पर कितना लिखा जाता है यह भी देखने की बात है? यह देखकर निराशा होती है कि विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने ऐसा कोई मत नहीं बनाया जिसमें भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर लिखा जाये और यही कारण है कि समाज में उसके विरुद्ध कोई वातावरण नहीं बन पाया। इन विचाराधाराओं और समूहों से अलग होकर लिखने वालों का अस्तित्व कोई विस्तार रूप नहीं लेता इसलिये उनके लिखे का प्रभाव भी अधिक नहीं होता। यही कारण है कि भ्रष्टाचार अमरत्व प्राप्त करता दिख रहा है और उससे होने वाली बीमारियों गरीबी,बेरोजगारी और भुखमरी पर कहानियां भी लोकप्रिय हो रही हैं। शेष फिर कभी
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लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
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4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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टिप्पणियाँ

  • Rawal Kishore  On 27/12/2010 at 19:22

    भ्रष्टाचार का कसता शिकंजा

    शीर्षक पढ़कर हैरान होने की कोई बात नहीं है क्योंकि वाकई आज हम भ्रष्टता के सिमटते दायरे में भौतिक सुख साधनों की चकाचौंध में खो कर इस कदर सिमटते जा रहे है कि ना तो हमें अपने देश के प्रति कर्तव्यों का ख्याल है और न ही हमारी समाजिक सोच किस दिशा में जा रही है उसका ख्याल है l इस भ्रष्टता के खेल में मध्यम वर्गीय श्रेणी की सोच उच्च वर्ग (धनी वर्ग) के साथ मिलकर इतना उत्पात मचा चुकी है कि दर्शक वर्ग (निम्न वर्ग) आज बेकार में पिसने को मजबूर हो चूका है l उसका क्या कसूर, क्यों फिर हमने इस पैसे के जुए के खेल को खेलने की कोशिश की क्या इसका जवाब है किसी के पास……… l
    अगर आप अधिकतर हाँ का समर्थन करते है तो फिर सबसे पहले भूमि कीमतों में निरंतर बढती हुई आर्थिक अभिलाषा को नियंत्रित करने की क्यों नहीं सोचते l बढती हुई महंगाई अपने आप संतुलित अवस्था में आ सकती है अगर हम अपनी मानसिकता में आवश्यक बदलाव करके उत्पन्न हुई सोच पर अमल करे ताकि हमारे आर्थिक तथा समाजिक ढांचे की बुनियादें पिछड़े वर्गों के प्राणों पर खड़ी होने की हिमाकत न कर सके l ऐसा विकास का भला फायदा भी क्या होगा चाहें हम 20% के विकास दर के आंकड़े को भी छु लें l अब आप ही सोचिये आज हमारी प्रशासनिक नीतियाँ कहाँ सो रही है जो समाज की स्थिति को देखने के बावजूद जानबूझ कर कुछ नहीं देखना चाहती l
    आज गरीब का तो जीना मुहाल हो चूका है जिसकी परवाह न तो देश के प्रशासनिक अधिकारीयों और नेतागण को है और न हीं भारतीय सविधान से जुडें न्याय अधिकारीयों को है आप इस बात से खुद अंदाजा लगा लें की सर्वोच्च न्यायलय जब यह कह सकता है कि रखरखाव के आभाव में कुछ हद तक ख़राब होने से बचा अन्न गरीब वर्ग में सस्ती दरो पर बाँट देना चाहिए l कोई इनसे पूछे अगर इतना ही ध्यान है तो ख़राब होने से पहले यह ही क्यों नहीं सोचा……. ? गरीब वर्ग से जुड़े भारतीयों की शारीरिक संरचना भी सभी के समान है फिर वे सडा अन्न क्यों खाएं, अगर आप के गले से ऐसा अन्न नीचे नहीं उतर सकता तो फिर गरीब के गले से ये कैसे नीचे उतर सकता है आखिरकार क्यों ऐसा कहा गया आप खुद ही ……….l
    रखरखाव के लिए कौन जिम्मेवार है एक आम मताधिकारी या फिर चुनिन्दा प्रशासनिक अधिकारी फैसला आपका है आप खुद निश्चित कीजिये की इन्हें अब तक अपनी जिम्मेवारियों के प्रति लापरवाही बरतने के आरोप में सजा क्यों नहीं सुनाई गयी, मान लो अगर दी भी गयी है तो प्रजा के सामने सार्वजानिक क्यों नहीं किया गया … ? ये तो प्राकृतिक आपदा की चपेट में आए इस वर्ष की कहानी है लेकिन हर वर्ष खाद्यान बर्बाद करने में भी हमारा ईतिहास में नाम दर्ज है उससे न्याय कहाँ तक करेंगे …..l इससे निष्कर्ष तो यह निकलता है कि हम शुरू से ही समाज के प्रति अपनी कर्तव्य परायणता से लापरवाह रहे है l
    भण्डारण क्षमता जब दो लाख अस्सी हज़ार (2,80,000) मीट्रिक टन की थी तो फिर सरकारी सरकारी एजेंसियों ने क्षमता से अधिक खरीद क्यों की, मान लें गलती हो भी गयी तो फिर उसके उचित रखरखाव के लिए नीतियों में ढील क्यों की गयी l इस ख़राब हुए अन्न के बराबर हुए पैसे की हानि के लिए जिम्मेवार अधिकारीयों को सजा अब तक क्यों नहीं मिली क्यों जिम्मेवारियों से खिलवाड़ किया गया l
    आज हालत ये पैदा हो चुके है कि अमीर वर्ग कानूनों का बेधडल्ले से शोषण करता हुआ मध्यम तथा निम्न वर्ग को गुमराह करने की कोशिश में जुटा हुआ है राजनीती भी पूंजीवाद से पूर्णता प्रभावित लग रही है l हमारे कानून कायदें बेशक इनसे दूर रहने का दावा करें लेकिन वो भी कुछ हद तक प्रभावित लगते है कुछ तो ये समय कि मांग को पूरा करने में असमर्थता जाहिर कर रहे है और कुछ हम इनकी कमियों का फायदा उठाते हुए इनका शोषण करने में जुटे है l समय तो अब तक बदलाव लेता आ रहा है फिर हम क्यों विदेशी संस्कृति से इतने हद तक प्रभावित हो चुके है कि हम उनकी सोच को समझने के काबिल भी नहीं रहे, भला विदेशी तो हमारी संस्कृति को अपनाने की सोच पैदा कर रहे है और हम है की उनकी सोच को अपनाने में लगे है l
    मैं कोई पुरातन की बात नहीं कर रहा हूँ विकास किसे भला अच्छा नहीं लगता लेकिन इतना तो चाहिए इसकी बुनियादें हर भारतीय के कंधो पर खड़ी होती l आएं दिन घोटाले होते देख-देख कर कहीं ये विकास भ्रमित हो कर एक दिन ऐसी अवस्था में न पहुँच जाए जहा से लौटने का हम साहस ही न कर पाए l चीन जैसा विकास भी तो हम कर सकते थे वो क्या समस्याओं से नहीं घिरे है ……………..
    औसत राजनीति क़ानूनी दबाव के खौफ को हटाते हुए ऐशो-आराम से अपना समय पूरा कर रही है इसकी प्रक्रिया में झांककर कर देखे तो जनसमर्थन हांसिल करने के लिए चुनावी वायदों से आम जन भ्रमित तो पहले ही कर लिया जाता है फिर तो इनके विकास के लिए पारित धन का शोषण उस हद तक किया जाता है जहाँ तक कानून कायदें सख्ती बरतते नजर नहीं आते l बढती महंगाई, जनसँख्या के वेग में होती बेतिहाशा वृद्धि तथा भ्रष्टाचार हमारी ही मानसिक सोच में आई विकृतियों के परिणाम है असली समस्याए ये नहीं अपितु हमारा नश्वरता से अधिक लगाव लगाना है योग आचार्य श्री राम देव जी भ्रष्टाचार को हम तब ही समाप्त कर सकते है जब हम आम जन की सोच में बदलाव ला पाएंगे, अगर आप राजनीति को इसका समाधान समझते है तो इस समस्या पर नियंत्रण के लिए राजनीति कोई सम्पूर्ण हल नहीं है l आम जन को एक बार दरकिनार करते हुए अध्यात्मिक गुरुओं को भी इस से जोड़ कर देखे तो आप पायेंगे की औसत गुरु भी भ्रष्टाचार के आकर्षण से नहीं बच पाए l
    ये अपने मूल उद्द्येश्यों से भटकी हुई वो मानसिकताएं है जो धर्म का सहारा अपने ऐशो आराम के लिए अपना चुकी है l इतनी विशाल संस्कृति तथा संसाधनों के होते हुए भी हम आज तक न तो अध्यात्मिक शिखर को छु पाएं और न हीं भौतिकता के शिखर को, यहीं हमारी सोच का सबसे बड़ा शर्मनाक पहलू है l आप खुद अपनी वर्तमान स्थिति का आंकलन करने की कोशिश करें क्या वाकई भ्रष्टाचार ने हम पर इतना मजबूत शिकंजा कस दिया है कि आज हम हम न रहे और तो और हमारी सोच इतनी भ्रष्ट होती जा रही है कि न तो हमें ये पता कि किस और जाना है और न यह जानने की कोशिश करते है की हमारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा l
    कागज के नोट तथा बहुमूल्य धातुएं हमारा समाजिक आधार बनने पर उतारू है और हम चुप है आखिर क्यों ……..? इसका सीधा सा जवाब यह है कि हम अपने भौतिक सुख स्वार्थो से प्रेरित होकर अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह तथा बेईमान साबित हुए है कोई शक है तो आप खुद देख सकते है हम विशव जगत के सामने किन पायदानों पर खडें हैं l आम जन, राजनीतिज्ञ तथा धर्मगुरु अपनी आंतरिक आत्मा से अगर न्याय करें तो धनी वर्ग (व्यवसाई) के साथ अब भी वापिस लौट आ सकते है और ऐसा बिलकुल संभव है और यहीं हमारा भौतिक आधार आगे का रास्ता तय करेगा कि कैसे हम इस पृथ्वी पर मानवीय सभ्यता कि निरंतरता के लिए अध्यात्मिक क्षेत्र में नेतृतव कर पायेंगे l लेकिन ध्यान रहे जब तक हम देश के प्रति ईमानदार तथा समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के लिए एकमत नहीं हो पायेंगे तब तक ऐसा सोचना अपने आप से बईमानी से कम नहीं होगा l
    Please Support this Crying Voice for betterment before its ends
    Thanks to all

  • Rawal Kishore  On 18/01/2011 at 13:39

    साईं इतना न दिजियों की खो जाऊं मैं महलन में,
    मोरे साईं इतना दिजियों की जोत जगे तोरी मोरे मन में l

    सगरी उम्र प्रीत लगाकर जग संग घुमात रही में बगियन में,
    उम्र जवानी बीतत गई जैसे नीर बहे टूटन घाट से,
    पार पायों न नाम लियो तेरा मैंने अपने जीवन में,
    बाजत-बाजत में टूट गई जैसे मुरली बाजे बिरहन में l

    अब ढुंढत-ढुंढत थक गई में मिळत न ना तू गलियन में,
    देखत-देखत बियरी हवा संग, देखो ना तोहे मंदिर में,
    हार गई में टूट गई में, मिला ना मोहे तू इस जग में,
    लियो तेरो नाम सच्चे दिल से, फिर पाया तोहे मन मंदिर में l

    अब कहत किशोर सुन भई साधू जीवन नाम ना अपनों है,
    ये मोह माया का पिंजरा है ये जीवन तो एक सपनो हैं l
    By…………Rawal Kishore
    09316857181

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