भर्तृशतकः विषय हमें छोड़े इससे पहले उनको छोड़ दो


अवश्यं यातारिश्चतरमुषित्वाऽपि विषया वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून्।
व्रजन्तः स्वातंत्र्यादतुलपरितापाय मनसः स्वयं त्यक्ता ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति।

हिन्दी में भावार्थ-अपने जीवन में हम कितना भी विषय को भोगें पर एक दिन वह छोड़ देते हैं। यह विचार करते हुए हम उनसे स्वयं ही अलग क्यों न हो जायें? मनुष्य जब विषयों को निरंतर भोगता है और जब उनके अलग होने पर बहुत मानसिक कष्ट झेलता है पर जब वह स्वयं त्याग करता है तो उससे सुख की अनुभुति होती है और उनके अलग होने की पीड़ा का उसे अनुभव नहीं होता।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस चराचर जगत में सभी वस्तुऐं और विषय नष्ट प्रायः हैं। कभी न कभी उनसे साथ छूटता है। यह जीवन धारा की तरह बहता जाता है और कहीं एक ठिकाना पकड़ कर बैठना संभव नहंी है पर इंसान अपने सुखों के पल को पकड़े रखना चाहता है और इसी प्रयास में वह विषयों के फेरे में पड़ा रहता है। इंसान के मन में सुख भोगने की इच्छा उसे अज्ञान क अंधेरे में डालती है और जिससे कई ऐसे विषयों, वस्तुओं और व्यक्तियों में मोह डाल लेता है जिनसे उसका बिछड़ना तय है। परिवार,मित्र,रिश्तेदार और व्यवसाय कभी न कभी साथ छोड़ते हैं और उस समय आदमी के मन में भारी संताप उत्पन्न होता है। यह जरूरी नहीं है कि जीवन के नष्ट होने पर ही उनसे बिछोह होता है बल्कि जीवन काल में भी ऐसा अवसर आ जाता है। बच्चों में आदमी का मोह होता है पर जब अपनी नौकरी और व्यापार के लिये मां बाप का साथ छोड़ जाते हैं। वह उच्च स्थान पर स्थापित होते है तो मां बाप समाज में अपना सम्मान समझते हैं पर जब कोई परेशानी का समय आता है तो उन्हीं बच्चो की पास में अनुपस्थिति उनको अखरती है।
यह मोह का परिणाम ही है। आदमी एक व्यवसाय या नौकरी में स्थायित्व ढूंढता है पर वह आजकल के समय में यह संभव नही है। कभी मंदी का दौर हो तो बड़े व्यवसाय डांवाडोल हो जाते हैं।

इनसे बचने का एक ही उपाय है कि मन में निष्काम और निर्लिप्तता का भाव रहे। जब हम कोई काम करें तो उससे अधिक आशा न करें या अवसर पड़े तो बदल दें। अगर जीवन में बहुत सारा धन कमा लिया है तो फिर व्यापार और नौकरी से स्वयं को प्ृथक कर लें क्योंकि उनसे कभी अलग होना है तो क्यों न स्वेच्छा से अलग हुआ जाये। ब्रच्चे अगर बाहर जातेे हैं तो समझ लेना चाहिये कि अब उनकी निकटता अधिक नहीं मिलगी और अपने जीवन में इस बदलाव के साथ जीना चाहिये।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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