अपने पर मर मिटने वालों की कमी नहीं -हास्य कविता


पूरी उम्र फिक्र करते रहे
कयामत के खौफ और इंतजार की
पर वह नहीं आयी
आंखें तब खुलीं जब
फिक्र ही कयामत लायी
……………………………
उनका ‘बेफिक्र रहो’ कहने से ही

अपनी फिक्र बढ़ जाती है

क्योंकि फिर उनको हमारी याद नहीं आती

उनकी बेफिक्री बहुत डराती है

उनके लिये यह दो लफ्ज हैं

जिसकी जगह उनके दिल में ही नहीं होती

ऐसे में फिर फिक्र कहां दूर हो पाती है
…………………………

लोग कुछ इस तरह किये जाते हैं

जैसे दुनियां में उनके नाम के ही

सभी जगह कसीदे पढे जाते हैं

आत्म मुग्ध लोगों की कमी नहीं

इस जमाने में

तारीफ़ के काबिल लोग

इसलिये किसी के मूंह से

अपने लिये कुछ अच्छे शब्द सुनने को

तरस जाते हैं

शायद इसलिये ही

चमक रहे आकाश में कई नाम

गरीब लोगों की भलाई के सहारे

फ़िर भी गरीबी से सभी हारे

क्योंकि भलाई एक नारा है

जिसके पांव ज़मीं पर नज़र नहीं आते हैं
———————–

उनका दिल समंदर है

इसलिये ही ज़माने भर का माल

उनके घर के अंदर है

ज़माने भर की भलाई का ठेका लेते हैं

सारी मलाई कर देते हैं फ़्रिज़

छांछ पिला देते हैं अपने ही गरीब चाकरों को

जो उनकी नज़र में पालतू बंदर हैं
———————–

यह कविता इस ब्लॉग

‘दीपक भारतदीप की शब्द प्रकाश-पत्रिका’

पर मूल रूप से प्रकाशित की गयी है और इसके प्रकाशन किसी अन्य को अधिकार नहीं है.

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टिप्पणियाँ

  • janardhan  On 21/10/2008 at 09:42

    अपने पर मर मिटने वालों की कमी नहीं -हास्य कविता
    Posted on September 25, 2008 by दीपक भारतदीप
    पूरी उम्र फिक्र करते रहे
    कयामत के खौफ और इंतजार की
    पर वह नहीं आयी
    आंखें तब खुलीं जब
    फिक्र ही कयामत लायी
    ……………………………
    उनका ‘बेफिक्र रहो’ कहने से ही

    अपनी फिक्र बढ़ जाती है

    क्योंकि फिर उनको हमारी याद नहीं आती

    उनकी बेफिक्री बहुत डराती है

    उनके लिये यह दो लफ्ज हैं

    जिसकी जगह उनके दिल में ही नहीं होती

    ऐसे में फिर फिक्र कहां दूर हो पाती है
    …………………………

    यह कविता इस ब्लॉग

    ‘दीपक भारतदीप की शब्द प्रकाश-पत्रिका’

    पर मूल रूप से प्रकाशित की गयी है और इसके प्रकाशन किसी अन्य को अधिकार नहीं है.
    —————————–

    अपने मूंह से अपनी तारीफ़

    लोग कुछ इस तरह किये जाते हैं

    जैसे दुनियां में उनके नाम के ही

    सभी जगह कसीदे पढे जाते हैं

    आत्म मुग्ध लोगों की कमी नहीं

    इस जमाने में

    तारीफ़ के काबिल लोग

    इसलिये किसी के मूंह से

    अपने लिये कुछ अच्छे शब्द सुनने को

    तरस जाते हैं

    शायद इसलिये ही

    चमक रहे आकाश में कई नाम

    गरीब लोगों की भलाई के सहारे

    फ़िर भी गरीबी से सभी हारे

    क्योंकि भलाई एक नारा है

    जिसके पांव ज़मीं पर नज़र नहीं आते हैं
    ———————–

    उनका दिल समंदर है

    इसलिये ही ज़माने भर का माल

    उनके घर के अंदर है

    ज़माने भर की भलाई का ठेका लेते हैं

    सारी मलाई कर देते हैं फ़्रिज़

    छांछ पिला देते हैं अपने ही गरीब चाकरों को

    जो उनकी नज़र में पालतू बंदर हैं
    ———————–

    यह कविता इस ब्लॉग

    ‘दीपक भारतदीप की शब्द प्रकाश-पत्रिका’

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