मस्तराम के नाम से असत् साहित्य की लोकप्रियता से हिंदी को लाभ नहीं-आलेख


मस्तराम कोई भी हो सकता है। यह किसी का नाम भी हो सकता है और कई लोग अपने अल्हड़ स्वभाव के कारण इसी नाम से पुकारे जाते हैं। अंतर्जाल पर मस्तराम के नाम से कई लोग लिख रहे हैं यह अलग बात है हर कोई अपने साथ अपना नाम या अपना तख्ल्लुस जोड़ देता है।
मैंने एक बार अपने एक ब्लाग में नाम के साथ ही मस्तराम भी जोड़ दिया। वह मेरा एक फालतू ब्लाग था और गूगल के इंडिक टूल मिलने से पहले उस पर लिखकर वहां से कापी कर दूसरे ब्लाग पर पोस्ट करता था। इस दौरान ब्लाग लेखक मित्रों ने विकिपीडिया का हिंदी टूल दिया। उससे कुछ दिन लिखा तो कंप्यूटर खराब हो गया क्योंकि वह पहले ही वाइरस ग्रस्त था। बाद में जब उसका हिंदी टूल लोड किया तो वह अधिक हिंदीमय हो गया था और इसलिये फिर अपने ब्लाग पर ही लिखने लगा। गूगल का इंडिक टूल आने के बाद उसकी जरूरत नहीं रही इसलिये मेरे कम से कम चार फालतू ब्लाग ऐसे ही रह गये। इनमे एक पर उठाकर मस्तराम लिखा और उस पर अपनी रचनाओं पर लेबल लगाने लगा साथ ही कुछ इधर उधर से पोस्ट रखने लगा।

हैरानी की बात यह रही वह मस्तराम नाम धारी ब्लागों में वह हिट पाने लगा। इसी बीच मैंने एक ब्लाग पर मस्तराम के बारे में पढ़ा। पता लगा कि मस्तराम ‘आवारा’ के नाम से हिंदी फोरमों पर जो दो पंजीकृत ब्लाग हैं का नाम भी उनमें शुमार है और उन्होंने इस संबंध में विवाद उठा जो बाद में शांत हो गया। तब मेरी दिलचस्पी इसमें जागी। इसके बाद मैंने अपने मस्तराम के नामधारी ब्लाग की जांच की तो पाया कि चिट्ठाजगत ने उनको अपने यहां रख कर दिखाना शुरू किया। उनमें मेरा वास्तविक नाम था इसलिये चिट्ठाजगत वालों को यह पता था कि यह किसके ब्लाग हैं। उन्होनें मेरे ब्लाग स्पाट के एक और वर्डप्रेस के दो ब्लाग इस तरह मुझसे पूछे बिना रख लिये। चूंकि मैं उनको प्रयोग पर जारी रखे हुए हूं और उन पर कोई नयी पोस्ट नहीं रखता पर जो भी रखता हूं वह चिट्ठाजगत, नारद और हिंदी ब्लाग पर चला जाता है। इसलिये मैंने उनके नाम से मस्तराम हटा लिया पर उसके बाद अन्य ब्लाग पर लिखा। आज पता लगा कि वह भी चिट्ठाजगत वालों ने ले लिया।

मस्तराम अंतर्जाल पर बिना किसी सहायता के हिट पाने का एक उपाय है पर लोग उस पर कोई साहित्य पढ़ने नहीं आते। ऐसा लगता है कि गूगल से जुड़े या अन्य पुराने ब्लाग लेखकों ने अंतर्जाल पर हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिये मस्तराम के नाम से लिखना शुरू किया। गूगल के तो विज्ञापनों में ही इतनी गंदी गालियां लिखी हुईं हैं कि उन्हें यहां कोई लिखना ही नहीं चाहेगा। एक ब्लाग लेखक ने यौन साहित्य लिखा उसमेंं कुछ अश्लील नहीं था पर उसके अनुसार उसके ब्लाग पर व्यस्क सामग्री की चेतावनी आ रही है और किसी ने गूगल को इसकी शिकायत की है उसका यह परिणाम है। मैंने उसे समझाया कि उसकी ब्लाग स्पाट की सैटिंग में गड़बड़ी है वह उसे चेक कर ले। मैंने अपने ब्लागस्पाट के एक ब्लाग पर वह कर देखा था जिससे वह चेतावनी अपने आप आने लगती है। मैंने उसे यह भी लिखा कि उसका ब्लाग क्या किसी का भी ब्लाग गूगल केवल इस कारण बैन नहीं कर सकता क्योंकि उसके विज्ञापनों के शीर्षकों में ऐसी गालियां हैं कि उन्हें कोई सामान्य हिंदी ब्लागर अपने अंदर पाठ में भी नहीं लिख सकता।

मस्तराम कोई असली नाम नहीं हैं और कई छद्म नाम के लोग इस पर लिख रहे हैं। हिंदी का कोई फोरम कभी भी उनको अपने यहां नहीं लिंक देता क्योंकि उनको अपनी श्वेत छबि बनाये रखने के लिये उससे दूर रहना ही श्रेयस्कर लगता है। चूंकि मेरे वह ब्लाग अन्य ब्लाग की तरह सामान्य पाठों हैं इसलिये उनको चिट्ठाजगत वाले लिंक देते हैं। संदेह के घेरे में वह इसलिये हैं कि वह मस्तराम शब्द डालकर ही वहां जाते हैं क्योंकि उन ब्लाग पर जितने भी हिट आये वह इसी शब्द से आये। हिंदी फोरमों पर दिख रहे हिंदी ब्लाग पर कभी कभार मस्तराम के नाम से लिखे जा रहे ऐसे वैसे साहित्य पर चर्चा होती है पर कोई यह नहीं कहता कि हम भी वहां जाते हैं। सच तो यह है कि कई ब्लाग लेखक वह तांक झांक करते हैं नहीं तो मेरे ब्लाग उनके दृष्टिपथ में कैसे आते।

मस्तराम ‘आवारा’ से मैंने जिज्ञासावश एक पूछा था कि उनके ब्लाग पर कितने व्यूज आते हैं। बहुत दिन बाद उन्होंने अपने जवाब में बताया कि प्रतिदिन दोनों ब्लाग पर चालीस से पचास व्यूज आते हैं। जिस दिन पोस्ट नयी होती है उस दिन चारों फोरमों से भी जमकर व्यूज आते हैं। उससे एक बात तो लगी कि मस्तराम वाकई अपने आप में हिट दिलवाने वाला नाम है। वह ब्लाग चेक किये तो उनका पता ही मस्तराम से शूरू है जबकि मैंने जी वगैरह लगाकर पता बनाया है। इसके बावजूद उस पर इतने हिट तो आ ही जाते हैं जो अन्य सामान्य ब्लाग पर नहीं आते। एक बार ख्याल आया था कि मैं भी ऐसा पता बनाऊं पर शब्दलेख सारथी और अंतर्जाल पत्रिका के व्यूज देखकर मन नहीं माना। वह दोनों ही अध्यात्म के दम पर 20 से 25 व्यूज कभी पचास व्यूज तब भी जुटा लेते हैं जब कोई उन पर पाठ नहीं होता। फिर वर्डप्रेस पर मस्तराम की श्रेणी में भी मेरे पास व्यूज आते हैं। इससे एक बात पता लगती है कि मस्तराम नामधारी ब्लाग जमकर हिट ले रहे हैं पर जैसे जैसे हिंदी पर लिखा बढ़ता जायेगा सामान्य जन की रुचि बढ़ेगी और अंततःसत्साहित्य ही हिंदी का सारथी बनेग और उसकी ध्वजपताका अंतर्जाल पर फहरायेगा। मस्तराम आवारा से एक बात और पता लगी कि उन ब्लाग पर टिप्पणियां तभी आती हैं जब वह फोरमों पर होती है। तब मैंने सोचा कि जब मस्तराम शब्द से ही उसके ब्लाग खुल रहा है तो ब्लाग लेखक इतने तो समझदार हैं कि वह वहां टिप्पणियां नहीं लगायेंगे क्योंकि उससे पता लग जायेगा कि वह मस्तराम के इलाके में गये थे।
वैसे हमारे इलाके में मस्तराम का इतना नाम प्रचलित नहीं है पर उस दिन एक आदमी ने बताया कि उसका नाम ऐसी वैसी रचनाओं के लिये खूब जाना जाता है। यही कारण है कि छद्म नाम से ऐसी वैसी रचनायें लिखने वाले वहां अपनी रचनाएं लिख रहे हैं और कुछ भले लोग भी हैं जो इस बात से बेखबर होकर ठीकठाक भी प्रस्तुति के साथ जुड़े हैं। ऐसा लिखने वालों के पुराने ब्लाग लेखकों होने का संदेह इसलिये भी जाता है कि तकनीकी और विज्ञापन की दृष्टि से वह जितना सुसज्तित हैं वह ज्ञान उन्हीं में संभव है। संभवतः हिंदी में लिखे गये वह पहले ब्लाग भी हो सकते हैं क्योंकि मैंने कई पर पांच वर्ष से अधिक पुरानी तारीखें देखीं हैं। मैं वहां अपने पाठकों के आने के मार्ग देखता हुआ वहां जाता हूं और इस दौरान वहां लिख पढ़ता हूं तो सोचता हूं चाहे कितने भी उन पर हिट हों हिंदी भाषा के समृद्धि करने का उनमें सामथर््य नहीं हैं। बहरहाल अब मैं अपने नाम से मस्तराम नहीं हटाऊंगा क्योंकि यह मेरे प्रयोग का हिस्सा है। चिट्ठाजगत वाले हर ब्लाग अपने यहां ले जायेंगे तो मैं किस किसका नाम बदलूंगा। कहीं अगर मस्तराम दीपक भारतदीप पर दृष्टिपथ में आ जाये तो बाद वाला ही नाम पढ़ें क्योंकि पहला नाम तो प्रयोग के लिये है। अगर उनको हटाने से तो मेरे प्रयोग प्रभावित होंगे। बहरहाल अंतर्जाल पर अनेक तरह के नये मसले सामने आते हैं जो केवल यहीं दिख सकते हैं और कहीं नहीं।

यह आलेख ‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Advertisements
Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

टिप्पणियाँ

  • rajul  On 09/09/2008 at 04:12

    mastram jaise log sahitya ki dhajjiya udane me lage hai.. aise logo par rok lagani chahiye..

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: