क्रिकेट मैच और फिल्म से तो अच्छा है ब्लाग लिखना और पढ़ना-आलेख


क्रिकेट के खिलाड़ी और फिल्म के अभिनेता अभिनेत्रियों के चेहरों और नाम के सहारे ही आजकल देश के सारे समाचार चैनल चल रहे हैं इसमें कोई संदेह नहीं हैं। अगर क्रिकेट का कोई मैच नहीं हो रहा होता है तो भी समाचार चैनल खेलों के समय में खिलाडि़यों की क्रीड़ेत्तर (खेल से अलग) गतिविधियों के समाचार देते हैं-जैसे वह कहां रैम्प पर गया या उसका अभी तक किस किस से प्रेम का संबंध चला। उसी तरह किसी फिल्म अभिनेता या अभिनेत्री की फिल्म नहीं रिलीज हो रही होती तो उसके प्रेम प्रसंग या सामाजिक सेवा की जानकारी फिल्म टाईम में दी जाती है। एक घंटे के समाचार समय में पौन घंटे इन दो क्षेत्रों पर ही व्यय किये जाते हैं। कहते हैं कि बाजार उपभोक्ताओं की मांग पर चलता है पर समाचार चैनल देख ऐसा नहीं लगता कि वह आम दर्शक के भरोसे हैं। उनको विज्ञापन मिल रहे हैं तो वह दर्शकों के कारण नहीं बल्कि अपनी सजावट के कारण मिल रहे हैं।

बहरहाल समाचार चैनलो के लिए खिलाड़ी और फिल्म अभिनेता अभिनेत्रियां एक तरह से प्रचार के लिये माडल हैं। आज भारत से श्रीलंका हार गया तो यह समाचार चैनल (इस लेखक यह जानकारी समाचार चैनलों से ही मिली है) वाले उन पुराने खिलाडि़यों पर बरस रहे है जिनको एक सप्ताह पहले वह मील का पत्थर और अनुभवी बता रहा थे। एक माह पहले तक उनको बीस ओवरीय मैच में न खिलाने पर आलोचना कर रहा थे। आज तो बस वही पुराने खिलाड़ी उनके लिये खलनायक बन गये थे।

‘उनको सोचना चाहिए कि वह अब क्रिकेट खेलना चाहिए या नहीं! केवल नाम के सहारे ही बहुत दूर तक नहीं चला जा सकता।’
‘उन पुराने खिलाडि़यों को अपने आप से पूछना चाहिए कि वह कहां खड़े हैं?’
वगैरह वगैरह। मतलब खिलाड़ी स्वयं तय करें कि उनको आगे खेलना हैं कि नहीं। चयनकर्ता को तो विचार ही नहीं करना चाहिए। यह समाचार चैनल वाले अपीलें कर रहे हैं कि ‘जाओ श्रीमान! आपका खेल पूरा हो गया।‘

चार दिन बाद फिर वह थोड़ा खेल कर दिखायेंगे तो यही कहेंगे कि ‘ साहब वह तो पुराने चावल हैं’। आशय यह है कि दर्शक को अपने हाथ में पकड़े रहना चाहते हैं।

कहते हैं कि आदमी की याद्दाश्त कमजोर होती है।‘ सारे मनोरंजक और जन भावना पर आधारित व्यवसाय इसी तर्क पर चलते हैं पर एक बात जो यह लेखक जोड़ता है कि किसी भी आम आदमी की याद्दाश्त कमजोर होती है पर बुद्धिमानों की नहीं । वैसे आम आदमी की याद्दाश्त भी इतनी कमजोर नहीं होती जितना अपने देश के मीडिया विशेषज्ञ समझते हैे। यह अलग बात है कि नई पीढ़ी के लोग पुराने कारनामों को जान नहीं पाते जबकि वही भावनात्मक रूप से ऐसे ऐसे विषयों से जुड़े होते हैं जो मनोरंजन पर आधारित होते हैं और प्रचार माध्यमों की कमाई का सबसे बड़ा जरिया हैं। इसलिये ऐसे लोगों के व्यवसाय चल जाते हैं, पर अब तो हद ही कर दी है लोगों को भुलक्कड़ समझने की। हाल खिलाड़ी को महान और हाल ही घटिया बताने लगते हैं। उसी तरह जब किसी एक्टर की फिल्म रिलीज होती है तो उसे महान अभिनेता और सामाजिक सेवक बताते हैं और जब वह फंस जाता है किसी मामले में तो उसे खलनायक बताने लगते हैं।

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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आशय यह है कि कि यहां कोई अब स्थाई नायक नहीं बन सकता-जो प्रचार माध्यमों के लिये कमाने के लिये एक माडल है चाहे वह कैसा भी हो उसका नाम तो वह रोज लेंगे। टीम हार गयी तो विलाप में भी आधा घंटा और जीत गयी तो खुशी में पोन घंटा समय लगायेंगे। उनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनको तो उसमें विज्ञापन दिखाने हैं। इसलिये आज अगर कोई नायक है तो कल ही उसे खलनायक कर भी प्रचारित किया जा सकता है। वैसे आम आदमी सब जानते हैं और आपसी बातचीत में प्रचार माध्यमों को केवल पैसे कमाने में संलग्न मानते हैं। कई लोग तो यह साफ कहते हैं कि समाचारों को सनसनीखेज अनावश्यक रूप से बनाया जा रहा है।

ऐसे में जागरुक और पढ़ने लिखने वाले लोगों के लिये अंतर्जाल ही एक जरिया है। अंतर्जाल पर अनेक लेखकों ने लिखस है कि जब से उन्होंनेे यहां लिखना शुरू किया है तब से बाहर टीवी और अखबार में उनका रुझान कम हो गया है। अंतर्जाल पर हिंदी ब्लाग में कई बार ऐसी घटनायें और विचार पढ़ने को मिल जाते हैं जो बाहर नहीं दिखते। हिंदी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों नारद, ब्लागवाणी, चिट्ठाजगत और हिंदी ब्लागस पर सभी हिंदी ब्लाग दिखाये जाते हैं और वहां ऐसे विषय पढ़ने को मिलते हैं जो हम सोच भी नहीं सकते। हालांकि यहां फिल्म और क्रिकेट की चर्चा थोड़ी अजीब लगती है पर लोग उस पर जो प्रतिक्रिया देते हैं उससे भी यह पता चलता है कि आम लोगों में अब इन विषयों पर कम ही रुचि है यह अलग बात है कि प्रचार माध्यम अपनी व्यवसायिक बाध्यताओं के कारण उसे स्वीकार नहीं कर रहे। वह चाहे जब किसी को भी देश के लोगों का हृदय सम्राट बताने लगते है। अभी तो आप देखना आगे कितने देश के हृदय सम्राट बनते और बिगड़ते हैं।
जो लोग इन माध्यमों से बोर हो चुके हैं उनको अब अंतर्जाल पर लिखे जाने वाले ब्लाग पर जरूर आना चाहिये क्योंकि वह अब उनके सामने एक ऐसा साधन बनता जा रहा है जहां वह अपना मन बहला सकें। यहां मित्रता और विवाद दोनों ही इतने दिलचस्प होते हैं कि कई फिल्म वाले भी ऐसी कहानी नहीं लिख सकते। बिना कैमरे के आपके दिमाग में ऐसे दृश्य बनने लगेंगे कि आप हंसेंगें। अगर आप लेखक हैं तो सोने में सुहागा। अपनी कविता या लेख लिखकर पहुंच जाईये इन फोरमों पर। एक बार आदत हो जायेगी तो फिर कहीं और मन लगाने को मन नहीं करेगा। क्रिकेट मैच देखकर अपने देश की हार से दुःखी होना या फिल्म की काल्पनिक कहानी को कोसने से तो अच्छा है ब्लाग लिखें और पढ़ें।

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टिप्पणियाँ

  • arun kumar  On 23/08/2008 at 06:04

    achha may caricket match ka simple sa questaion cahhai ,
    may bihari hou bihar ki rahani wala appa cricket news please vigya dengya

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