25 हजार पाठकों की संख्या पार कर चुका यह ब्लाग-संपादकीय


आज मेरा यह ब्लाग/पत्रिका पच्चीस हजार की पाठक संख्या पार कर गया। यह दूसरा ब्लाग/पत्रिका है जो इस संख्या के पार पहुंचा है। शायद कुछ लोगों को यह अजीब लगता होगा कि मैं अपने किसी पाठ की पाठक संख्या एक हजार पार होने पर लिखता हूं तो कभी किसी ब्लाग के दस हजार पार होने की बात कर समय नष्ट करता हूं। यह लोगों को शायद आत्मप्रवंचना
भी लग सकती है, पर चाणक्य का कथन है कि कभी कभी अपने गुणों को प्रकट करने का उद्यम भी करना चाहिए।

वैसे मेरे शायद बीस ब्लाग/पत्रिकाएं होंगी पर मैं 12 उन ब्लाग को ही आधिकारिक मानता हूं जिनके पंजीकरण के लिये मैंने हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने के लिये फोरमों को स्वयंं ईमेल किये। मेरे अन्य ब्लाग/पत्रिकाओं को भी कुछ फोरम अपने यहां दिखा रहे हैं पर मैं उन पर कभी नयी पोस्ट नहीं रखता। यह अलग बात है कि शीर्षक बदलकर रखे गये पाठों पर वहां भी पाठक आते है।

इस ब्लाग के पच्चीस हजार पाठक संख्या पार करने पर मुझे प्रसन्नता हुई है-यह मेरे एक अति सामान्य लेखक होने का प्रमाण है। तकनीकी रूप से मुझे ब्लाग का कोई ज्ञान नहीं था। जब यह ब्लाग बनाये तब पता भी नहीं था कि इसे ब्लाग कहते हैं। मैंने तो इसे अपनी पत्रिका की तरह उपयोग करने का विचार किया। कुल मिलाकर आज के स्वरूप की कल्पना तक मैंने नहीं की। जो सीखा यहीं अपने ब्लाग लेखक मित्रों से ही सीखा। तकनीकी रूप से ब्लाग लेखकों की बातें कभी समझ में नहीं आयी पर सीखने में हुई गलतियों से ही मैं सीखा। इसका एक उदाहरण हाल ही का है। श्री अनुनाद सिंह ने कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाला टूल अपने ब्लाग पर दिखाया। मैं उसे हड़बड़ी में 28 मार्च को उठाकर लाया और जब वह सफल रहा तो एक पोस्ट लिख डाली। वहां यूनिकोड से कृतिदेव को बदलने वाले टूल पर दृष्टि ही नहीं गयी। कुछ दिन से पत्र पत्रिकाओं से आग्रह आते हैं कि आप कुछ लिखकर कर दो। मैं सोचता था कि यूनिकोड में पड़ी रचनाओं में बहुत सारा फेरबदल कर ही पत्र-पत्रिकाओं में इनका प्रकाशन सही हो पायेगा, पर करना आता नहीं था क्योंकि अगर मैं उनको अपने विंडो पर लाता तो वहां शब्द कूड़ा दिखाई देते थे। संयोगवश एक मित्र को काम करने के लिये उसके कंप्यूटर पर कृतिदेव से यूनिकोड में बदलने वाला टूल स्थापित करना चाहता था पर जब मैं उसे लोड करता तो यूनिकोड से कृतिदेव में बदलने वाले टूल को लोड करता। वह तो वैसे काम नहीं कर सकता था। वहां से निराश घर आकर भी वही गलती करता रहा था। मैने श्री अनुनाद सिंह को ईमेल किया। फिर दोबारा उनके ब्लाग में गया और ध्यान से देखा तो पाया कि यह तो वह यूनिकोड से कृतिदेव में बदलने वाला टूल है जिसकी मुझे बहुत जरूरत है। तब मैंने अपने यहां उसको स्थापित कर ब्लाग से एक पाठ उठाकर वहां आजमाया। वहां से अपने विंडो पर जाकर पेस्ट किया तो पता लगा कि पूरी सामग्री कृतिदेव में आ गयी थी और मैं उसमें अब संशोधन कर सकता था। यह अभी तीन दिल पहले की बात है। अपनी मूर्खता पर मैं हंस भी नहीं सकता था। मैंने तत्काल श्री अनुनाद सिंह को इसकी जानकारी दी ताकि वह परेशान न हों।

इधर लोग शिकायत कर रहे हैं कि बहुत लंबी पोस्ट लिख रहे हो, पर इसमें मैं कुछ नहींं कर सकता क्योंकि अपनी पूरी बात कहे बिना मुझे अपना आलेख समाप्त करना ठीक नहीं लगता। फिर मैं तो अपने शीर्षक में ही लिख देता हूं कि वह आलेख है या कविता। आलेख का मतलब मेरे लिये होंगे कम से कम 1200 शब्द! मैंने सवा साल तक अपने मौलिक स्वरूप के विपरीत लिखा पर अब सहज भाव से लिखता हूं। इसलिये बाद में भी उसमें जोड़ता हूं जबकि पहले रोमन लिपि में यूनिकोड में हिंदी टाईप में ऐसा करने की सोचता भी नहीं थां
इसी ब्लाग के संबंध में एक और रोचक बात है। हुआ यूं कि एक ब्लाग ने एक वेबसाइट का उल्लेख अपने पाठ में किया जिसमें सभी ब्लाग के रेट का आंकलन किया जा सकता है-वहां ऐसा कोई साफ्टवेयर था। मैंने उसमें अपने सभी ब्लाग का मूल्य आंका। यह मेरा सबसे महंगा ब्लाग था हालांकि अन्य ब्लाग लेखको के ब्लाग के मुकाबले इसकी कीमत कम थी। इस पर एक पाठ लिखते हुए मैंने अपने सभी ब्लाग की कीमत उल्लेख की जो कुल योग में उस समय अनेक महंगे ब्लाग से अधिक थी। मेरे एक मित्र ने अपनी टिप्पणी में मुझसे कहा कि यह एक साफ्टवेयर है जिसका कोई अधिक महत्व नहीं है क्योंकि श्रेष्ठता के पैमाने तो और भी बहुत हैं। फिर यह साफ्टवेयर किस प्रकार तैयार किया गया है यह भी पता नहीं है पर हां, इससे हम यह तो देख सकते हैं कि हमारे ब्लाग की स्थिति क्या है?’
अपने मित्र की आखिरी पंक्तियां मुझे बहुत ज्ञानवद्र्धक लगी। तब मैंने सोचा कि यह अगर मेरा महंगा ब्लाग है तो क्यों न इसी पर अधिक काम किया जाये। इसके बाद शब्द पत्रिका का नंबर आता था तब मैंने इन दोनों ब्लाग पर अधिक लिखने का विचार किया। यही कारण है कि यह दोनो ब्लाग पिछले चार महीने में मेरे मुख्य ब्लाग दीपक बापू कहिन से आगे निकल गये हैं। दीपक बापू कहिन भी अभी इस दौड़ मैं है पर अभी उसे पच्चीस हजार का आंकड़ा पार करने में शायद बीस से पच्चीस दिन और लग सकते हैं। अन्य ब्लाग बनाये थे उन पर शुरू में मैंने कृतिदेव में ही अपनी रचनायें रखीं थी पर यह पहला ब्लाग था जिस पर मैंने रोमन लिपि में अंग्रेजी में यूनिकोड मेंं कवितायें प्रकाशित की थी-वह भी ब्लागस्पाट के ब्लाग पर टूल पर टाईप करने के बाद कापी कर यहां रखी थी। इसी कारण पहली प्रोत्साहित करने वाली सकारात्मक टिप्पणी भी इस पर आयी थी। उससे पहले आने वाली अन्य ब्लाग पर आई टिप्पणियों में मेरा ब्लाग पढ़ने में न आने की शिकायत लिये हुए थीं। यह संयोग ही है कि कृतिदेव से यूनिकोड में परिवर्तित करने वाले टूल से लिखा पहला पाठ भी यहीं आया।

हाथी को गुड़ का पहाड़ भी मिल जाये तो उसे परवाह नहीं होती पर चूहे को हल्दी की गांठ मिल जाये तो वह कहता है कि ‘मैं भी पंसारी, मैं भी पंसारी’-ऐसा व्यंग्य करने वाले कह सकते हैं पर जैसा मेरे मन में आता है वैसा ही लिखता हूं। मैं कभी आत्ममुग्ध नहीं होता इसलिये आत्मप्रचार का दुर्गुण भी मुझमें नहीं है। जो कहता हूं कर दिखाता हूं, जो नहीं कर सकता उसे स्वीकार कर लेता हूं। मैं कभी बड़ा ब्लाग लेखक या हिंदी भाषा का लेखक नहीं बन सकता यह मैंने प्रारंभ से ही स्वीकार किया है पर मेरी मौलिक रचनाओं का कथ्य चर्चा में रहेगा क्योंकि वह मेरे पसीने से सिंचित वृक्ष की तरह हैं। सत्य से परे मन के विचरण को मैं जिस तरह दृष्टा की तरह देखता हूं सरस्वती की कृपा के बिना वह संभव नहीं है शायद यही कारण है कि मेरे मित्र अधिक हैं। यही मित्र मुझे अपने प्यार और स्नेह भरे शब्दों से और शक्तिशाली बना देते हैं। उनका सद्भाव मेरे लिये ऐसा पुरस्कार होता है जिसमें उत्तरोत्तर वृद्धि होती है।
पच्चीस हजार की संख्या पार करने पर यह पाठ इसलिये लिख रहा हूं क्योंकि मुझे लग रहा है कि कुछ लोग विश्लेषणों में दिलचस्पी लेते हैं। शायद इसमें उनके लिये कुछ हो। वह मुझे महत्वहीन कहकर नकार सकते हैं, वह मेरे लिखे में दस मीन मेख निकाल सकते हैं पर मेरे पसीने से निकला सत्य के निकट लिखे गये पाठों की अनदेखी नहीं कर सकते । पच्चीस हजार का आंकड़ा पार करता हुआ यह ब्लाग मुझे एक ही संदेश देता है कि तुम तो बेपरवाह होकर लिखो और बाकी फैसले का काम अपने ब्लाग लेखक मित्रों और आम पाठकों के लिये छोड़ दो-जिन दिनों ब्लाग बनाने के लिये जूझ रहा था तब एक पत्रिका में एक लेख पर नजर पड़ी थी। उसमें भी यही संदेश था। अगर ब्लाग बना लिया है तो उस पर नियमित लिखो। इसलिये इन दोनों ब्लाग-शब्द पत्रिका और हिंदी पत्रिका-पर कभी कुछ ऐसा हल्का पाठ आ जाये तो उसे अनदेखा कर दें-मैं देर से सीखता और समझता हूं पर एक बार कोई बात दिमाग में घुस जाये तो फिर उस मार्ग से हटता भी नहीं हूं। अपनी कमियां मुझे साफ दिखाईं देतीं है पर उनसे मैं कुंठित हुए बिना अपने परिश्रम के सहारे अपने मार्ग पर बढ़ता हूं।
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दीपक भारतदीप

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टिप्पणियाँ

  • Brijmohanshrivastava  On 13/07/2008 at 08:58

    बंधू -बढ़ती हुई पाठक संख्या पर आपको बहुत बहुत मुवारकवाद -इश्वर करे संख्या करोडो में पहुचे -किंतु एक गुस्ताखी कर रहा हूँ वह भी माफ़ी मांगते हुए -बात यह है की लेख के अन्तिम पदमें पसीना से निकला लेख लिखने की बात है उस वावत मेरा विनम्र निवेदन है कि पसीना वहाना केवल शारीरिक श्रम के लिए लागू होता है मानसिक श्रम के लिए नहीं फ़िर जैसा आप उचित समझें

  • श्री वास्तव जी
    कोई औरत सिलाई करती है तो उसे क्या शारीरिक श्रम नहीं कहते। आप टाईप करने पर अपने हाथ नचाने को क्या कहेंगे? मेरे पास कोई वातानुकूलित कक्ष नहीं हैं। कई बार यहां टाईप करते हुए मेरा पसीना निकलता है। आप कभी घर आकर देखें। लिखना मानसिक श्रम हो सकता है पर टाईप में मेहनत होती है। सभी यह काम नहीं कर सकते। इसके बाद भी अगर आप यह कहते हैं कि इसमें शारीरिक श्रम नहीं है तो मुझे कुछ नहीं कहना।
    दीपक भारतदीप

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