अवकाश के दिन की डायरी-आलेख


कल रात को मैंने ग्यारह बजे कंप्यूटर बंद किया था और उसके बाद बरसात की वजह से बिजली ऐसी गुम हुई कि आज दोपहर तीन बजे अपना कंप्यूटर खोलकर देख पाया।
आज अवकाश का दिन बेकार गया लग रहा था क्योंकि बरसात की वजह से अपने काम से बाहर जाना भी मुश्किल था। बरसात रुकी तो बाजार गया और दोपहर घर तीन बजे आया तो लाईट आयी तब मैंने सोचा कि थोड़ी देर कंप्यूटर खोलकर देख लूं। वैसे मैं शायद इतनी परवाह नहीं करता पर कल उर्दू के प्रचलित शब्दों पर लगातार दूसरा पाठ मैंने अपने ब्लाग@पत्रिका में लिखा था और अनुमान था कि इस पर कुछ ऐसे लोगों का ध्यान अवश्य जायेगा जो बहुत गंभीरता से ब्लाग जगत से जुड़े हैं और वह अपनी टिप्पणियां रखकर अपनी बात अवश्य कहेंगे। कल एक पंक्ति ब्लाग से एक सदाशयता पूर्ण टिप्पणी थी और सर्व श्री संजय पटेल, दिनेश राय द्विवेदी और संजय बैगानी ने अपनी बात आज रखी थी। मैं इसलिये भी चिंतित था कि कुछ लोग बहस और वाद-विवाद में अपनी बात क्रोध में कहकर उसको प्रभावी बनाना चाहते हैं पर ऐसा हुआ नहीं। मुझमें असहमतियों को झेलने की क्षमता है पर किसी की अभद्र टिप्पणी मुझे उसका उग्रता से प्रतिवाद करने को प्रेरित करती है-भले ही तत्काल ऐसा नहीं करता और अवसर की प्रतीक्षा का धीरज भी मुझमें है। इसका सकारात्मक परिणाम भी आता है। एक ब्लाग लेखक की गुस्से वाली टिप्पणी मेरे दिमाग में थी और उनके प्रति मेरे मन में अच्छा भाव नहीं रहा था। एक दिन वह ऐसी तारीफ कर गये कि मेरा गुस्सा हवा हो गया।
कल के पाठ पर यही सोचकर कि पता नहीं किसने क्या लिखा होगा? मुझे अपने यहां बिजली न आने पर गुस्सा आ रहा था। आखिर एक संवेदनशील और गंभीर विषय पर लिखकर उससे दूर कैसे रह सकते हैं।
वैसे एक विचार आया था कि आज इस पर लिखूं पर मुझे लगा कि अति हो जायेगी। यह बहस कभी समाप्त नहीं होने वाली और आज आई टिप्पणियों से मैंने कुछ अपना विचार बनाया पर उन पर बाद में लिखूंगा और जिनकी टिप्पणियां हैं उनके नाम उसमें दूंगा। वह सब मेरे मित्र हैं और जिस ढंग से अपनी बात उन्होंने रखी उससे मेरे मन में सकारात्मक प्रभाव पड़ा। मुझे आजकल उन लोगों से असहमति होती जा रही है जिनको टिप्पणियां अधिक मिलती हैं और वह उनको औपचारिक मानकर उनकी अवहेलना करते हैं। अपने पाठों में वह उसकी चर्चा कर वह इन औपचारिक टिप्पणियों पर प्रतिकूल विचार करते हैं। मेरे पास भी ऐसी टिप्पणियां आती हैं पर मेरा मानना है कि कहीं न कहीं उससे प्रेरणा मिलती है। एक बात याद रखनी चाहिए कि अगर जैसे पाठ होते हैं वैसे ही टिप्पणियां भी आती हैं। कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर औपचारिक टिप्पणी-जैसे ‘बहुत बढिया है’, या ‘बहुत सुंदर है’आदि लगाकर निकलना बहुत कठिन होता है। मैंने बीच में कविता के रूप मेें टिप्पणियां रखीं उस पर मेरे एक मित्र की नजर पड़ गयी तो उसने कहा कि अगर अपनी टिप्पणियां पद्य के रूप में रखना चाहते हो तो पंक्तियां कम करो‘।
मैंने उसे बताया कि इस तरह मैं काव्य पाठ बना लेता हूं तो उसने कहा कि ‘भले ही अपने लिये बड़ा काव्य पाठ बना लो पर अपनी टिप्पणियों में उसमें से चुनींदा पंक्तियां ही रखो। वैसे भी कवितायें छोटी ही लिखो अगर वह हास्य कवितायें नहीं है तो।’

बहरहाल एक बात है कि कुछ विषय ऐसे होते हैं जो अन्य ब्लाग लेखकों को खींच सकते हैं उन पर टिप्पणियां अवश्य मिलती हैं। अगर कोई विषय सार्वजनिक दृष्टि से बहुत महत्व का हो तो लोग टिप्पणियों पर इतनी मेहनत करते हैं कि मन में उनके प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा होता है। वह कितनी मेहनत से और विचार कर लिखते हैं कि उनके परिश्रम की प्रशंसा न करना कृतघ्नता लगती है। कल श्री अनुनाद सिंह और आज श्री संजय पटेल ने उर्दू के शब्दों के हिंदी में उपयोग से संबंधित विषय पर जिस गंभीरता से अपनी टिप्पणियां दी वह वास्तव में प्रशंसा योग्य है। श्री संजय बैंगानी और श्री दिनेश राय द्विवेदी ने संक्षिप्त में बात रखी और फिर उस पर लिखने का विषय भी प्रदान किया। ऐसी बहसों में वही लोग शामिल हो सकते हैं जो अपने अंदर मौलिक विचार रखते हैं क्योंकि उसके बिना किसी बहस में संजीदगी से टिक पाना कठिन होता है और फिर क्रोध का प्रदर्शन करना ही अपने सम्मान की रक्षा करने का उपाय नजर आता है।
आजकल लोग शिकायत कर रहे हैं कि मैं बहुत लंबा लिख रहा हूं। यार, मैं क्या करूं लिखने बैठता हूं तो कृतिदेव में ऐसे ही लिखता हूं जैसे हाथ से लिख रहा हूं। हालांकि मेरा मानना है कि पहले मुझे हाथ से लिखकर ही टाईप करना चाहिए तभी अधिक प्रभावी पाठ लिख पाऊंगा। मैंने कल देखा 28 मार्च 2008 को कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाला टूल लोट किया था तब से थोड़ा मजे लेकर लिख रहा हूं। दूसरी बात यह कि अगर गंभीर या संवेदनशील विषय हो तो उसमें अपनी कोई बात छूट जाये तो जवाब देना कठिन है। कृतिदेव पर टाईप करते हुए सात सौ अक्षर कब हो जाते हैं पता ही नहीं पड़ता। वैसे मैंने कल यूनिकोड को कृतिदेव में बदलने वाला टूल लोड किया और अपनी कुछ पाठ देखे तो मुझे लगा कि उनमें बहुत सारी बातें छूट गयीं थीं। उस समय यह हालत थी कि पांच सो अक्षर भी लिख लिये तो समझ लो तीर मार लिया। किसी को अक्षर को मिटाना पहाड़ लगता था।
इसमें कोई संदेह नहीं हैं जिन टूलों से हम ब्लाग लेखकों का वास्ता पड़ रहा है वह सामान्य आदमी के लिये अजूबा है। मैं जिनको भी दिखाता हूं वह दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। अंतर्जाल पर तो बहुत लोग लगे रहते हैं पर जो ब्लाग लिख रहे हैं वह कई मामलों में दूसरों की अपेक्षा अधिक जानकारी रखते हैं ऐसा मुझे लगता है। मैं तो उन ब्लाग लेखकों के बारे में सोचता हूं जो मुझे ऐसे टूल बताते हैं-और मैं उनका उपयोग करता हूं-कितनी अधिक जानकारी रखते होंगे।
जब बिजली नहीं थी तो मैं अपनी डायरी लिख रहा था उसमें कई बार भिन्न भिन्न विषय लिखकर ऐसे ही लिखता हूं-हालांकि इन्हीं डायरियों में मेरे कई व्यंग्य और चिंतन लिखे पड़े हैं जिनको यहां टाईप करना आफत लगता है। वह बहुत बड़े है। आज से मैं ऐसे ही रविवार के दिन अपनी डायरी अपने ब्लाग पर लिखूं्रगा क्योंकि इसमें बिना किसी योजना लिखता हूं और यह आनंद प्रदान करती है।
दीपक भारतदीप

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