हिंदी में उर्दू शब्दों के उपयोग पर सावधानी जरूरी-आलेख


हिंदी भाषा में उर्दू के शब्दों का प्रयोग इतना आम है कि लोग हिंदी व उर्दू के शब्दों के अंतर का ध्यान नहीं रखते और एक अपनी बात में दोनों के शब्द इस्तेमाल करते हैं। कमोबेश यही हाल हिंदी के अनेक लेखकों और कवियों का है-जिनमें मैं स्वयं भी शामिल हूं।
जैसे मैं यह कहता हूं कि‘कोई काम शुरू किये बिना उसके परिणाम पर विचार नहीं किया जा सकता है। पहले कोई कार्य प्रारंभ किया तो जाये उससे पहले क्या सोचना।’
अब इनमें उर्दू भी है और हिंदी भी। इसे हम बोली कहते हैं और इसका धड़ल्ले से उपयोग होता है। मेरी शिक्षा हिंदी में हुई है और इसी दौरान संस्कृत भी पढ़ा हूं। इसलिये हिंदी का कोई भी शब्द पढ़ने में कठिनाई नहीं होती पर जब लिखना प्रारंभ किया तो इस बात का ध्यान नहीं रखा कि शब्दों का चयन पूर्णतः हिंदी से किया जाये। इसलिये बोलचाल की भाषा ही लिखने की भाषा बनती गयी। बाद में कभी कभार मैंने इस बात का प्रयास किया कि अधिकतम हिंदी शब्दों का उपयोग किया जाये तो अनुभव हुआ कि उससे मेरा कथ्य प्रभावित होता है। हां, तमाम तरह के विवादों को पढ़कर अक्सर यह सोचता था कि मैं तो कभी ऐसा लिख ही नहीं पाऊंगा।
मेरी जीवन की शुरूआत 2 एक पत्रकार के रूप में ही हुई थी और मैंने एक दिन अपना एक छोटा लेख लिखा और अपने गुरू जी-जो पत्रकार थे और बाद में मैं उनको अपने जीवन का गुरू भी मानने लगा-को दिखाया तो उन्होंने उसे छपने के लिये फोटो कंपोजिंग में ले जाने को कहा। उस समय मैं अपने लेख टाईप भी स्वयं ही करता था। वहां उनसे कनिष्ठ पत्रकार ने मुझे वह लेख दिखाने को कहा। मैंने उसे दिखाया तो उसने मेरे कई शब्दों पर लाल स्याही फेर दी और कहा-‘तुम अपने लेखों में उर्दू शब्दो को शामिल करते हो पर तुम्हें उनके बारे में पता नहीं लिखा कैसे जाता है। कई शब्दों में नुक्ता (नीचे बिंदी) लगती है पर तुमने नहीं लगायी।’

मैं चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि उस समय मुझे इतनी समझ भी नहीं थी कि किसी बात का प्रतिवाद कर सकूं-उन लोगों के सामने तो एक तरह से बच्चा ही था। मेरे गुरूजी ने मुझे बुलाया और वह कागज लेकर उसकी लाल स्याही पर अपनी नीली स्याही फेर दी और कहा-‘जाओ, तुम अपना टाईप करो।’
वह महाशय उर्दू पढ़े हुए थे इसलिये उनको उसकी अच्छी जानकारी थी वह उनसे बोले-‘बाबूजी, यह शब्द गलत है।’
हमारे गूरूजी ने कहा-’वह शब्द तो लिख कर बताओ।’
उन्होंने पास ही पड़े कागज पर सभी शब्द लिख कर दिखाये तो हमारे गुरूजी ने कहा-‘इसे तुम अपनी लिपि में लिखो। यह तो देवनागरी में लिखा है।’
उसने कहा-‘तो क्या हुआ।’
हमारे गुरूजी ने कहा-‘यह नुक्ता फारसी में लगता है, पर कई शब्द ऐसे हैं जो हिंदी भाषा में प्रयोग में लाये जाते है उनको इस तरह लिखना ही पड़ेगा। वह बोलचाल में हैं न कि हिंदी साहित्य में इसको पढ़ाया गया है। पर अब लिखे जा रहे हैं तो किसी को रोकने का मतलब है कि उसे स्वाभाविक रूप से लिखने से रोकना।’
उन दोनों में इस विषय पर बहस चलती रही और मैं अंदर जाकर अपना लेखक टाईप करने लगा। उर्दू को अदब की भाषा कहा जाता है और उसमें कई शब्दों में नुक्ता लगता है यह मुझे पता है पर वह शब्द मुझे आसानी से याद नहीं रहते। मुझे याद आ रहा है कि किसी ने मुझसे कहा था कि उर्दू भाषा में जिन शब्दों का वजन अधिक होता है उनमें ही यह नुक्ता लगता है। शायद उसने जज्बात या जजबात, गजब और अजब जैसे शब्द बताये थे। मेरे मन में तब से उर्दू शब्दों को लेकर संशय बना रहता है कि कोई टोक न दे। इसके बावजूद उर्दू के अनेक शब्द उपयोग करने के मामले में चूकता नहीं हूं। अलफाज और लफ्ज जैसे शब्द उपयोग करता हूं पर पता नहीं उनमें नुक्ता कहां आता है।
कई बार दूसरे लोगों से भी मेरी उर्दू भाषा के शब्दों के उपयोग पर बहस हो जाती है। कई लोग ऐसे शब्दों का उपयोग करते हैं जो मुझे लगता है कि वह उर्दू के नहीं हो सकते। जैसे एक ने लफ्ज की लब्ज शब्द उपयोग किया। मुझे लगा कि वह गलत है, पर एक ने कहा वह सही है। कुल मिलाकर उर्दू की हालत भी हिंदी जैसी है। फिर भी हिंदी के किसी शब्द के उपयोग पर संशय होने पर किसी अपने साथी से पूछ सकता हूं पर उर्दू में यह संशय दूर करने के लिये कोई नहीं मिलता। इसके बावजूद हिंदी में कई विद्वानों के आलेख पढ़कर उसमें प्रयोग किये गये कठिन उर्दू शब्दों को ध्यान से पढ़कर अपने मस्तिष्क में रख लेता हूं ताकि अगर कभी उसका उपयोग करूं तो वह गलत न हो। इस कारण उर्दू के अनेक शब्दों का ज्ञान हो गया है। इसलिये आजकल अनेक लोग जिस तरह उर्दू शब्दों का उपयोग कर रहे हैं वह मेरी समझ से परे हैं।
अनेक ब्लाग लेखक अपनी कविताओं और गजलों में उर्दू शब्दों के उपयोग में बिल्कुल सतर्कता नहीं दिखा रहे। मैं जजबात ऐसे लिखता था पर आजकल जज्बात ऐसे लिखता हूं। कई लोगों का ऐसा उपयोग देखा तो लगा शायद यही सही हो। यानि संशय से पूरी तरह मैं भी उबर नहीं पाया। इसके बावजूद मुझे लगता है कि उर्दू के सही शब्द उपयोग करना किसी को नहीं आता। ऐसे में अक्सर सोचता हूं कि जितना हो सके उर्दू शब्द के उपयोग से बचा जाये अच्छा रहेगा।
अनेक ब्लाग लेखक इसे कट्टरतावादी रवैया मान सकते हैं पर मेरा मंतव्य है कि आम पाठक की दृष्टि से ही हमें लिखना चाहिए। मैं जब लिखता हूं तो स्वाभाविक रूप से लिखता हूं और कोई कम अप्रचलित उर्दू शब्द अगर मेरे दिमाग में आता है तो उसे पहले तो लिख लेता हूं पर बाद में संपादन के समय उससे संतुष्ट न होने पर हटा देता हूं यानि अपने अंदर के विचार प्रवाह को अपने मस्तिष्क में अवरुद्ध नहीं होने देता। यह एक निश्चित बात है कि भाषा और बोलियां स्वाभाविक रूप से अपने स्थान बनाती और त्यागती हैं। चंद लेखकों के लिखे से उनका कोई प्रभाव नहीं होता पर ब्लाग लेखकों में कुछ लोग भाषा की शक्ति का समझे बिना अपनी तरफ से अन्य भाषाओं के शब्दों के प्रयोग पर जिस तरह जोर दे रहे है जैसे वह भाषा के लिये कोई बहुत अधिक काम करने जा रहे हैं। उनके इस उद्देश्य में सफलता संदिग्ध हो जाती है।
मेरे से जिस उर्दू के जानकार ने अपने शब्द लेख से हटाने के लिये कहा था वह कहीं उर्दू अखबार से जुड़े थे। उन्होंने बाद में कहा था कि‘तुम अगर कोई हिंदी में गजल लिखोगे तो उसका तर्जूमा मैं उर्दू में छाप सकता हूं पर अगर तुमने उसमें उर्दू शब्द का गलत उपयोग किया होगा तो यह संभव नहीं है। वैसे तुमने ठीकठाक ही इस्तेमाल किया लोग तो इससे भी बुरा करते हैं। लोग अनावश्यक रूप से उर्दू शब्दों का उपयोग कर अपने आपको बहुत ऊंचा समझते हैं पर वह नहीं जानते कि उनकी हंसी उड़ायी जाती है।’
मैंने ब्लाग पर कई बार ऐसे कठिन उर्दू शब्दों का उपयोग देखा है जिनके बारे में मेरा विश्वास है कि वह गलत हैं। ऐसे में वहां कोई टिप्पणी भी नहीं कर सकता। एक तो मैं स्वयं ही अपने अंदर विश्वास नहीं स्थापित करता दूसरा यह कि कोई भी कह सकता है कि यही इस्तेमाल होता है आप गलत हैं।
एक बात तय है कि अगर हम अपनी भाषा संबंधी त्रुटियों पर ध्यान नहीं देंगे तो आगे आने वाली चुनौतियों का सामना नहीं कर पायेंगे। सामने कोई नहीं कहे पर पीठ पीछे कोई भी कह सकता है कि ‘वह तो बचकाना लिखता है’। यह टिप्पणी आपके प्रभावी कथ्य को भी कमतर बना सकती है। ऐसे में हिंदी भाषा में उर्दू शब्दों का उपयोग स्वयं संतुष्ट होने पर ही करें। लिखते समय लिख जायें पर संपादन के समय उस विचार करें। यह साफ कर दूं कि मैं अपने पाठों में उर्दू शब्दों के प्रयोग से रोक नहीं रहा बल्कि उनके गलत लिखने पर ही अपनी बात रख रहा हूं। हालांकि मैं स्वयं भी उर्दू शब्दों का उपयोग करता हूं और उससे मुझे कोई परहेज नहीं है।

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टिप्पणियाँ

  • एक पंक्ति  On 04/07/2008 at 14:23

    परहेज़ (परहेज नहीं) होनी भी नहीं चाहिये.यह बात सर्व-विदित है कि हिन्दी-उर्दू के मिश्रण से भाषा में रंजकता
    आ जाती है.एक-पंक्ति पर जारी इसी आशय के एक लेख को ज़रूर देखें.और हाँ यह बात भी शत-प्रतिशत सही है कि किसी भाषा को समग्र रूप से जाने बिना या किसी से मशवरा लिये बिना उसका उपयोग भी नहीं करना चाहिये.हिन्दी वालों को इस बारे में विशेष रूप से सतर्क रहना चाहिये जो बोलते/लिखते वक़्त उर्दू का आकर्षण तो पालते हैं लेकिन उसका उपयोग सही तरीक़े से करना नहीं जानते.

  • आपने परहेज शब्द का जो स्पष्टीकरण दिया है उसमें यह बता दूं कि कृतिदेव का यूनिकोड फोंट उसे नहीं ले रहा है। उर्दू के शब्द उपयोग करने में यह समस्या तो रहेगी। अतः नुक्ते न आने की बात भी विचारणीय है
    दीपक भारतदीप

  • नुक्ता हटा दो। हिन्दुस्तानी बना दो।

  • meenakshi  On 04/07/2008 at 22:58

    आपका लेख पढ़कर एक पुरानी घटना याद आ गई…हमारी वाइस प्रिसीपल के पति जलील साहब को हमारी टीचर दोस्त झट से ज़लील साहब पुकार देतीं और हम सब मुँह बाए उन्हें देखते रह जाते… ज़लील एक अपशब्द के रूप में प्रयोग होता है जबकि बिना नुक्ते का जलील फैमिली नेम है….जज़्बात में दूसरे ज़ में नुक्ता है…कुछ उर्दू और फ़ारसी के शब्द कई लोग नही बोल पाते… एक शब्द ‘क़रीब’ तो हम खुद बोलने में दिक्कत महसूस करते हैं … कोशिश यही रहती है कि शुद्ध बोलना लिखना और पढना आए…

  • Anunad Singh  On 05/07/2008 at 04:50

    हिन्दी में नुक्ते का प्रयोग एक प्रतिगामी कदम है। हिन्दी में नुक्तों का प्रयोग गलत सोच के चलते है या तुष्टीकरण के चलते।

    उर्दू के बारे में सर्वविदित है कि उसकी लिपि स्वयं अत्यन्त अवैज्ञानिक है – यानी लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर ! नुक्तों के प्रयोग से हिन्दी को दोहरी मार झेलनी पड़ती है – एक तो अरबी-फारसी के शब्द लेकर अपनी भाषा को कूड़ेदान बनाओ; दूसरी नुक्ते के प्रयोग का आग्रह।

    कभी किसी ने पुछा है कि उर्दू वाले हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के शब्दों को लिखने के लिये अपनी लिपि में अतिरिक्त वर्ण (अक्षर) क्यों नहीं ले लेते ? यदि ऋतु को रित, छाया को साया, कर्म को करम लिखकर काम चला सकते हैं तो हिन्दीमें नुक्ते के बिना कौन सा आसमान टूट रहा है?

    कोई कह सकता है कि जरूरी है कि जो ऊर्दूवाले करें वही हम भी करें – तो उत्तर है कि बहुत जरूरी है। इसके बिना आप हमेशा गुलाम बने रहेंगे।

    सारे नियम गरीब और पिछड़े लोगों के लिये ही होते हैं।

  • Brijmohanshrivastava  On 10/07/2008 at 12:59

    आपका कहना नितांत सत्य और अमल में लाने योग्य है किंतु जहाँ अंग्रेजी लिखने पर हिन्दी में रूपांतरण हो जाता हो तो वहां क्या कीजियेगा -मसलन आपके उपर्युक्त लेख में अखवार -ग़ज़ल -ग़लत और साफ शव्दों का प्रयोग अन्तिम तीन पैराग्राफ में हुआ है -लिखते समय जो शब्द ध्यान में आजाये वह लिखना पढता है किंतु कुछ शब्दों में नुक्ता न लगाने में मजबूरी रहती है

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