पर्यटन पर पशु पक्षियों का क्यों बनाते मटन-आलेख


मेरे ब्लाग लेखक मित्र श्री सुरेश चिपलूनकर मुझे अपने ईमेल पर अक्सर कई बार चित्र भेजते हैं-वह अन्य मित्रों को भी ऐसे ही भेजते हैं। यह चित्र वह अंतर्जाल पर एकत्रित करते हैं और जो उनको अपनी दृष्टि से विचार योग्य होने पर उनका संकलन कर वह संदेशों के साथ प्रेषित करते हैं। उनके महाजाल ब्लाग को पढ़ने वाले जानते हैं कि उनके तेवर कैसे हैं? वह पहले ऐसे ब्लाग लेखक हैं जिनसे मेरी प्रत्यक्ष भेंट हो चुकी हैं। वह न केवल आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक है बल्कि उत्साही ब्लाग लेखक भी हैं। हिंदी ब्लाग लेखकों में कुछ ऐसे हैं जो अंतर्जाल पर विचरण कर न केवल नई सामग्रियां एकत्रित करते हैं बल्कि वह दूसरों को भी उपलब्ध कराते हैं। श्री चिपलूनकर उनमें एक हैं। अक्सर उनके भेजे गये चित्रों को देखता हूं और मन ही मन उनके संकलन की प्रशंसा करता हूं पर यह दूसरा अवसर है कि जब उनके चित्रों ने एक पाठ लिखने को प्रेरित किया है।

यह चित्र दो पश्चिमी देशों में पर्यटन के नाम पर समुद्री और हिम पर्वतों में बसने वाले जीवों के निर्मम शिकार को दर्शाते हैं। उनके बहुत सारे फोटो हैं पर जिनमें इन जीवों का खून बिखरा पड़ा है उनको देखकर मेरा मन पीड़ा से नहीं बल्कि हिंसा से भर उठा। जिन्होंने इनको मारा वह अपना फोटो खिंचवा रहे हैं अगर आप उनसे पूछें कि ‘भई ऐसे ही अगर आपको मारकर कोई फोटो खिंचवाने का विचार भी करे तो कैसा रहे? या आपके परिवार के किसी सदस्य का हत्यारा ऐसे ही फोटो खिंचवाये तो क्या आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी?’

यह मैंने कहा है पर अगर कोई अंग्रेजी वाला इसे अनुवाद टूल को पढ़े तो ऐसी गलती न करे क्योंकि इन देशों में किसी मनुष्य से ऐसी बात करना भी धमकी माना जाता है और उन पर कार्यवाही की जा सकती है। बहरहाल आप देखियें उन अभागे मनुष्यों को जिनके भाग्य में ऐसे सुंदर स्थानों पर पहुंचना और ऐसे सुंदर प्राणी अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देखना तो लिखा हुआ है पर मजे लेना नहीं लिखा। ऐसे स्थान पर आदमी जाये और अपने मन में बैठा हिंसक जीव भी साथ ले जाये तो फिर वह क्या मजा उठायेगा? यह ऐसे लोगों द्वारा मारा गया पहला बेबस जीव नहीं होगा बल्कि वह ऐसे ही कृत्यों के लिये वह बहुत सुंदर स्थानो पर जाते हैं। ‘मजा लेना है’ यह सोचकर जाते हैं पर फिर घर लौटकर दूसरे स्थान पर जाते हैं। मजा कहीं नहीं मिलता और वह भटकते हैं। दूसरे जीव की हिंसा में आनंद लेने वाले अपने देश में भी कम नहीं है। इनमें तो कई चर्चित हस्तियां हैं और लोग उनको आज भी सिर पर उठाये हुए हैं।

मैंने यह फोटो देखे पर इस विषय पर लिखना कोई नई बात नहीं है। श्रीचिपलूनकर ने फोटो उपलब्ध कराये इसके लिये उनका आभारी हूं पर पशु-पक्षियों के विरुद्ध हिंसा पर लिखना हो तो एक व्यापक दृष्टिकोण रखे बिना आलेख प्रभावशाली नहीं बन सकता। ं खासतौर से उन स्थानों पर जो पर्यटन की वजह से जाने जाते है वहां उन जीवों का रहना मुश्किल होता जा रहा है जो कि उनको प्रकृति द्वारा स्वाभाविक रूप से प्रदान किये जाते हैं। सच तो यह है कि हम राक्षसों और देवताओं की बातें करते हैं पर वह तो हम इंसानों के बीच में होते हैं और हमारे अंदर भी। मैंने एक कविता में लिखा था कि-‘देवताओं और दानवों का युद्ध इतिहास नहीं बना वह तो अब भी जारी है’-समयचक्र ब्लाग के लेखक श्री महेंद्र मिश्र ने यही पंक्तियां उठाकर टिप्पणी में लिखी। इसलिये मुझे भी याद रह गयीं-जिन ब्लाग लेखकों को अपने ब्लाग पर अपने पाठ से की गयी ऐसी कापी टिप्पणी रखने पर आपत्ति होती है और वह कहते हैं कि यह तो केवल औपचारिकता है वह इसका मतलब मेरे इस लेख से समझ सकते हैं। अगर श्री मिश्र जी नहीं लिखते तो शायद मैं भी भूल गया होता।

कहने का तात्पर्य यह है कि देवताओं और दानवों का युद्ध जारी है। दूसरे किसी भी निरपराध जीव की हत्या दानवता है-यह मेरा स्पष्ट मत है। तमाम तरह की बहसें होती हैं और विभिन्न विचाराधारा वाले अपने बयान देते हैं। जैसे-‘अमुक धर्म वाले कहते हैं कि सब चीजों में भगवान है पर हम कहते हैं कि सब चीजें भगवान की हैं इस तरह हम उन लोगों से अलग हैं।’ कुछ लोगों द्वारा चंद किताबों को पढ़कर अपनी विद्वता से समाज में मनुष्य को मनुष्य से पहले बांटने और फिर काटने का काम किया जाता है। एक महाशय ने बहुत जोरदार तर्क दिया था कि‘अगर ऐसे जीवों की हत्या न हो तो उनकी संख्या इंसानों से अधिक हो जायेगी और वह उसे खा जायेंगें।’
मेरे से एक विद्वान ने कहा था कि‘सब जीवों में मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जिसके मांस को कोई नहीं खाता।’ अब इसके बारे में मैं नहीं जानता पर इतना जरूर कह सकता हूं कि सभी जीव इंसान से डरते हैं क्योंकि वह उनकी दृष्टि में एक दानव है।’ हां, अगर किसी इंसान को उन्होंने परख लिया होता है तो उसे प्यार करते हैं और वही उनके लिये देवता हो जाता है।
सच तो यह है कि इंसान अपने अधिकारों के लिये बहुत कुछ कहता है पर अन्य जीवों की हत्या को वह जन्मसिद्ध अधिकार मानता है। दूसरे जीव की हत्या कर उसका मांस खाने में कोई स्वाद है यह भी एक ही भ्रम है। अगर ऐसा होता तो फिर उसे पकाते क्यों हैं और फिर मसाले क्यों डालते है? यह भ्रम नहीं तो क्या है? खाने का आनंद तो मुझे आज भी दाल रोटी में आता है। चाहे उसे दस दिन लगतार खाऊं बोर नहीं होता।
पहले मुझे पक्षियों को दाना डालने की आदत थी पर वह छूट गयी। जब उच्चरक्तचाप की शिकायत हुई तो मैं छत पर योग साधना करने जाता और कुछ दाने डालता। मैंने उसी समय एक जगह पढ़ा था कि पक्षियों को दाना डालकर उनको चुगते देखकर मानसिक तनाव कम होता है जो कि उच्च रक्तचाप का कारण होता है। तमाम तरह के जो पक्षी वहां दाना चुगते हैं वह मुझे बहुत सुख देते हैं। कुत्ते को रोटी डालकर उसे खाते देखने का भी सुख है। एक बार मैंने दो रोटी हाथ में ली। एक कुत्ते को दी और एक सूअर को। कुत्ता अपनी छोड़ उसके पीछे भागा तो मैं उस कुत्ते के पीछे डंडा लेकर पड़ गया क्योंकि मुझे यह पसंद नहीं था कि वह सूअर को खाना खोने से रोके। वहां से गुजर रहे एक सज्जन हंसे और बोले-‘आप बहुत दिलचस्प आदमी हैं।’
जिन फिल्मी अभिनेताओं पर ऐसे पशु-पक्षियों की हत्या के आरोप हैं मैं उनकी फिल्में देखने से भी कतराता हूं-इनमें एक कामेडी का अभिनय करने वाला है जो कि कभी मेरे को पंसद था पर जबसे ऐसे कृत्य में उसका नाम सुना मुझे उससे भी चिढ़ हो गयी। मेरा मानना है कि जो सुख पशु-पक्षियों को प्यार करने और खिलाने में हैं उनका मांस खाने से मिल ही नहीं सकता। दुनियां कौए से नफरत करती है और मैं हमेशा पत्नी से कहता हूं कि रात को कुछ रोटी रखा करो ताकि मैं उनको ऊपर डाल दूं। कौए दाना तो खाते नहीं हैं हो सकता है रोटी खा जायें।’
मेरी पत्नी कहती है कि-कभी रात को रोटी बचती है कभी नहीं। आप देख लिया करो। नहीं तो डबलरोटी का छोटा पैकेट लाकर रख लो। शायद वह कौऐ खा जायें।’
मतलब यह कि हर जीव में जीवात्मा है यह हमारा दर्शन कहता है और मैंने भी यही मानते हुए बचपन से मांस न खाने का विचार किया और मुझे लगता है कि इससे मेरे अंदर ऐसे तत्व विकसित हुए जिन्होंने मुझे एक लेखक बना दिया। इन तस्वीरों में यह देखा जा सकता है कि पशु-पक्षियों में भी आपस में प्रेम से एक परिवार की तरह रहते है। मां केवल इंसान की ही दूध नहीं पिलाती बल्कि यह प्रवृत्ति पशु पक्षियों में भी पायी जाती है। वैसे मनुष्य का शरीर मांस खाने योग्य नहीं है। कुछ विद्वान कहते हैं कि इस धरती पर जो जीभ बाहर निकालकर पानी पीते हैं वही मांस भक्षी होते हैं और जो ऐसा नहीं करते वह शाकाहारी होते हैं। मनुष्यों में कुछ लोग इस सत्य को नकारते हुए मांस खाते हैं और हिंसा में उनको मजा आता है। यह अलग बात है कि पश्चिम से आयी विचारधाराओं में केवल मनुष्य को मारने को ही हिंसा कहा जाता है और हमारी भारतीय विचारधारा किसी भी जीव की हत्या को हिंसा माना जाता है यही कारण है कि भारत का अहिंसा का सिद्धांत विश्व में सबसे अधिक सत्य के निकट माना जाता है।

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