रेल मे सफर में भक्त भी आम यात्री होता है-आलेख


वैसे तो हम वृंदावन हम कई बार गये हैं पर पिछली बार हम दोनों पति-पत्नी ने गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का मन बनाया। हम अपने मन में भक्ति भाव के साथ रेल्वे स्टेशन पहुंचे। वहां बहुत भीड़ थी। कम से कम तीन गाडि़यां हमारे सामने ही निकल गयीं पर हम उसमें नहीं चढ़ सके-क्योंकि हमारे पास सामान्य श्रेणी की टिकिट थी और उसमें पांव रखने की जगह भी नहीं थी। आरक्षित बोगी में चढ़कर हम रेल्वे कर्मचारियों के सामने याचक बनकर खड़े होने के इच्छुक नहीं थे। आखिर मैंने अपनी पत्नी से कहा कि-‘टिकिट वापस कर बस से चलते हैं।
पत्नी ने कहा-‘नहीं, आप किसी टीसी को कुछ दे देना और फिर रिजर्व बोगी में ही चलते हैं। वैसे भी आरक्षित बोगियों तो खाली ही जा रहीं हैं।’
मैंने घड़ी में समय देखा और अपना तीन घंटे से अधिक समय बरबाद करने के बाद मुझे ऐसा फैसला लेना पड़ा जो आमतौर से मैं नहीं लेता। अनेक अन्य सामान्य टिकिटधारी यात्रियों के साथ मैं भी आरक्षित बोगी में बैठ गया। आगरे तक सब ठीक चला। कहीं किसी ने कुछ नहीं कहा। आगरे के बाद वहां से कोई चैकिंग टीम चलती है जो मथुरा तक ऐसे ही यात्रियों को तलाशती है जिनसे कुछ वसूली की जा सके। आगरे में वहां अनेक टीसी अपनी आक्रामक अदाओं के साथ यात्रियों पर ऐसे ही चढ़ दौड़े जैसे शेर हिरणों के झुंड पर झपटता है। तमाम तरह के कानून की जानकारी देते हुउ जेल में भेजने की धमकी आदि वह देते रहे। अधिकतर यात्री गोवर्धन परिक्रमा के लिये जा रहे थे और केवल रिजर्व बोगी में खड़े थे। उनमें से कई लोगों को वह धमका रहे थे। सौदेबाजी हो रही थी। एक सज्जन अपने साथ सात-आठ लोगों को लेकर निकले थे। वह टीम के सदस्यों को पैसा देने को तैयार थे पर निर्धारित दर के अनुसार नहीं। बहस हो गयी। उन सज्जन ने कहा कि हमारे पास पैसे अधिक नहीं है और हमें अभी लौटना भी है। फिर हम तो खड़े होकर चल रहे है।’
उसको तमाम तरह से अपमानित किया गया। दो लड़के थे उसका टीसी ने कालर पकड़ लिया। मतलब उन्होंने अपने पैसे निकालने के लिये वह सब हथकंडा अपनाया जो वह अपना सकते थे। हम दोनों पति-पत्नी भी खड़े हुए थे। मैंने थोड़ी बहस की पर पर जब मैंने अपनी जेब से सौ रुपये का नोट निकाला तब वह चले गये। उस समय गोवर्धन परिक्रमा के लिये जा रहे भक्तों के चेहरे पर तनाव के भाव देखकर मुझे तकलीफ हो रही थी। उनको ऐसे अपमानित किया गया जैसे कि वह टिकिट लेकर नहीं चढ़ें हों।

हमारा सफर पूरा हुआ। मैं जब गोवर्धन परिक्रमा कर रहा था तब मुझे वह यात्री दिखाई दिये। उनसे बातचीत हुई तो ऐसा नहीं लगा कि ऐसे तनाव झेलने के बाद भी उनके भक्ति भाव में कम आई हो। मैंने वह लड़का भी देखा जिसका चेकर ने कालर पकड़ा था। वह भी हंसते हुए मिला। यह सब वह लोग थे जो कुछ घंटे पहले ही अपमान के कड़वे घूंट पीने के साथ पैसे भी खर्च कर आये थे।

वापसी में भारी भीड़ को देखते हुए हम बस से ही लौटे आये। इस बार तो मैं बस से ही वृंदावन गया पर वापसी में रेल से यह सोचकर जाने का विचार किया कि जाते समय थोड़ी भीड़ कम होती है इसलिये सामान्य बोगी में शायद जगह मिल जायेगी। मगर अब फिर वही दृश्य दिखाई दिया जो पहले जाते समय दिखाई दिया था । इस बार चेकिंग टीम से बचने के लिये बोगी के टीसी से पहले ही बात कर ली। उसने हमारी टिकिट पर बोगी नंबर लिख दिया-इसका मतलब यही था कि हम देने और वह पैसे लेने को तैयार था। मथुरा से गाड़ी चली हो फिर चेकिंग टीम जो वापस लौटती है आ गयी। हमारा टिकिट देखने के लिये कम से कम पांच लोग आये पर टीसी का लिखा होने के कारण किसी ने कुछ नहीं कहा। मगर मेरी पत्नी तनाव में थी। उसे लग रहा था कि कहीं हम फंस न जायें। आगरा निकल गया। उसके बाद फिर कोई नहीं आया। बीच में टीसी दो बार आया और दूसरों के टिकिट बनाने लगा। इसी दौरान हमारी कुछ विषयों पर बातचीत भी हुई। इससे हमारी पत्नी को लगा कि शायद इतना मैत्रीपूर्ण व्यवहार कर रहा है तो शायद पैसे न ले। वह धौलपुर तक नहीं आया तो हमारी पत्नी ने कहा-‘क्या वह पैसे नहीं लेगा?’
मैंने हंसकर कहा-‘इतनी बार तुमने मेरे साथ सफर किया है कभी इनको रहम करते देखा है। इस देश में अंग्रेज हर भारतीय को चोर समझने की प्रवृत्ति जो छोड़ गये है वह उनके द्वारा निर्मित शिक्षा पद्धति के कारण अब तक और बढ़ चुकी है। तुम्हें याद है मथुरा से आगे भरतपुर तक वह सफर जब एक केंद्रीय कर्मचारी ने रेल्वे कर्मचारी को अपना परिचय पत्र दिखाकर रहम की याचना की थी पर वह नहीं माना था। यह किसी को नहीं छोड़ सकते।’

मुरैना से पहले वह टीसी मेरे पास आया और बोला-‘आपको कहां जाना है?’
मैंने बिना कुछ कहे सौ रुपये उसकी तरफ बढ़ा दिये। वह वहां से चला गया।
उसके जाने के बाद मेरी पत्नी ने कहा‘-अब मुझे चैन आया। नहीं तो तनाव लग रहा था।’

वह रेल्वे के सफर को अब भूल चुकी है और अपने साथ मिलने वालों के साथ वृंदावन के मंदिरों के संस्मरण पर बात करती है। मैं सोचता हूं कि कितने भक्त ऐसे संघर्षों से गुजरते हुए तीर्थाटन के लिए निकलते हैं और अब उनको अपने ही लोगों की ऐसी बेरहमी का सामना करना पड़ता है जो पहले वह विदेशी करते थे। व्यवस्था के नियम हैं पर भक्ति का कोई नियम नहीं है। भक्ति एक निजी भाव है। उसे निभाने के लिये उसे निजी रूप से ही जूझना है पर उसके भाव का उपयोग ताकतवर लोग अपने लिये करते हैं और फिर अपना काम निकलते ही उसे छोड़ देते हैं।

मुझे याद है वह नीली कमीज और काली पैंट पहले बड़ी आंखों वाला चेकर जिसने उस गरीब भक्त से कहा था-‘गोवर्धन परिक्रमा के लिए जा रहे हो तो क्या गाड़ी तुम्हारे नाम लिखे दें। सारे कायदे हटा दें।’
उसकी कुटिल मुस्कान मुझे नहीं भूलती। तब मुझे लगा था कि देवता और दानव सभी इस पृथ्वी पर ही विचरते हैं। यह वहम है कि कभी दानवों का नाश होता है।वह उससे चार सौ रुपये बिना रसीद लिये हटा था। वह नियम की दुहाई दे रहा था पर उसने किस नियम के तहत वह रुपये अपनी जेब के हवाले किये मैं नहीं जानता। देश, समाज और जातियों को चलाने के लिये ढेर सारे नियम लोग बना लेते हैं और जिनके हाथ में शक्ति है वही उसे तोड़ते भी है कमजोर को उसे मानने के लिये प्रेरित करते हैं। भक्ति के लिए ढेर सारे प्रपंच सार्वजनिक रूप से किये जाते हैं पर भक्ति नितांत एकाकी होती है यह बात मुझे आगरा से मथुरा के बीच रेल के सफर में दिखाई दी जब मैं अकेला उस टीसी के सामने एक निरीह आदमी के रूप में खड़ा था, तब भी मैंने भगवान से मन में यह याचना नहीं की थी कि मुझे उससे उबारे क्योंकि मैं जानता था कि माया का यह पुतला माया से कटेगा और उसका प्रमाणपत्र मेरे पर्स में रखा था। तब मेरे सामने ढेर सारे सवाल थे। भगवान के नाम पर इस देश में अपनी दुकान चलाने वाले भक्तों की राह आसान हो इसके लिये क्या कुछ करते हैं? वह उसके रास्ते में पड़े नरक को दिखाकर स्वर्ग की बात करते हैं। वह कहते हैं कि हम भक्तों के भगवान का सम्मान करते हैं पर भक्त का सम्मान। वह क्यों करेंगे? उन्होंने तो अपने को बड़ा भक्त घोषित कर रखा है। उस सफर में मैं मुस्करा रहा था। अपनी पत्नी के चेहरे पर आ रहे तनाव देखकर भी विचलित नहीं हुआ क्योंकि मैं जानता था कि वह सब भूल जायेगी पर मैं याद रखूंगा क्योंकि मेरी यात्रा वहीं खत्म होने वाली नहीं थी। वहां से उठे सवालों का जवाब ढूंढने की कवायद करूंगा तो कई लोग खामोश हो जायेंगे। मेरे साथ होंगे वही लोग जो ऐसे सवाल उठाते रहेंगे। सबसे बड़ा सवाल भक्ति के भाव का दोहन करने वाले व्यापारी क्यों किसी भक्त पर तरस खायेंगे। भला घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा क्या?
लोगों का भक्ति भाव देखकर तो मुझे नहीं लगता कि यह देश कभी गुलाम था जो इसे अब आजाद कहा जाता है। कहने को विदेशी शोषक चले गये पर क्या देशी शोषक कम हैं? कहते हैं इस देश पर विदेशियों ने आक्रमण कर इसे लूटा और राज्य किया पर क्या वह इस देश के भक्ति भाव को लूट पाये? कुछ शीर्ष लोग भक्तों को ललकारते हैं कि उठो अपने धर्म की रक्षा करो। भक्त अपने भक्ति भाव से रक्षा करने में समर्थ हैं पर जो उसे ललकारते हैं पहले वह बतायें कि क्या करते हैं? अपनी सारी विरासत अपने परिवार के लोगों को वह उसी तरह सौपते हैं जैसे सामान्य आदमी! फिर वह किस मूंह से भक्त को भक्ति छोड़कर धर्म के लिये लड़ मरने के लिये प्रेरित करते हैं? क्या बता सकते हैं कि धर्म के लिये उन्होंने क्या कुर्बानी की? भक्त तो फिर भी समय निकालकर अपना पैसा खर्च करते हुए भारी तकलीफों से भक्ति करता हैं और वह ऐसे लोगों के बहकावे में क्यों आयेगा जो सुविधाभोगी है और भक्ति से उनका दूर दूर तक वास्ता नहीं है। जो भगवान के नाम पर भक्तों को उकसाते हैं वह यह नहीं बताते कि उसके नाम पर भक्त का रास्ता आसान बनायेंगे कि नहीं। यही कारण है कि भगवान की सच्चे मन से भक्ति करने वालों ने कभी भी उन पर लोगों पर यकीन नहीं किया जो धर्म की आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं।

Advertisements
Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

टिप्पणियाँ

  • Advocate Rashmi Saurana  On 22/06/2008 at 04:35

    aapne bilkul sahi likha hai.aesa aksar hi logo ke sath hota rahata hai.

  • mamta  On 23/06/2008 at 07:25

    बड़ा ही सजीव विवरण किया है आपने।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: