सारी पीड़ाऐ बाहर ले आता है पसीना-कविता एवं आलेख


आज आजश्री जयप्रकाश मानस का एक आलेख पढ़कर यह विचार मेरे हृदय में आया कि आजकल हमारे समाज में परिश्रम में बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता है और इसी कारण हमारा विकास चहुंमुखी नहीं हो पाता। ऐसे एक नहीं अनेक किस्से मेरे सामने आते है जब जब लगता है कि लोग न केवल स्वयं ही परिश्रम करने में अपने को छोटा समझते हैं बल्कि दूसरे को भी हेय व्यक्ति मानकर उससे घृणा तक करते हैंं। यही कारण है कि हमारे समाज में जो श्रमिक वर्ग है वह अपने को अपेक्षित अनुभव करता है।
अभी कुछ दिने पहले मेरे सामने एक रोचक किस्सा आया था। एक जगह जगह शादी के रिश्ते में हमें भी मध्यस्थ की भूमिका निभाने का अवसर मिला। लड़के को लड़की पसंद थी पर लड़की को बात पसंद नहीं आ रही थी तो लड़की के पिता ने उसे समझाते हुए कहा-‘देखो बेटी! तुम काम से जी चुराने की आदी हो। सुबह नौ बजे उठती हो। यह ऐसा घर है जिसमें सारे काम नौकर करते हैं। लड़का अधिक सुंदर नहीं है पर घर ठीक है। ऐसा धनाढ्य घर मिलना कठिन है। तुम्हें घर में कामकाज अधिक नहीं करना पड़ेगा।’
मुझे यह जानकर हैरानी हुई की लड़की को खाना बनाना भी नहीं आता था-यह उसके साथ आयी एक महिला ने बताई। वह लोग ऐसा घर ढूंढ रहे थे जहां लड़की को काम कम करना पड़े। जिस तरह उसके पिताजी उससे अपनी बात कह रहे थे उससे तो यह लगता था कि वह स्वयं भी ऐसी ही परिश्रम को छोटा समझते होंगे तभी तो उनकी लड़की में यह बात आयी।

परिश्रम करने वाले लड़कों को कोई लड़की ही नहीं देना चाहता भले ही वह परिवार का भरण पोषण करने में सक्षम हो। इसलिये हर कोई कुर्सी पर बैठने की नौकरी चाहता है। मेरी पत्नी को अन्य महिलायें कहतीं हैं कि ‘सारा काम स्वयं ही क्यों करती हो? कोई नौकरानी क्यों नहीं रख लेती। तुम तो पैसा बचा रही हो।’
मैं कई बार सायकल पर बाहर जाता हूं तो भी यही लोग कहते हैं कि पैसा बचा रहे हो। यह श्रम को हेय दृष्टि से देखने जाने की प्रवृति इस समाज में है और इसे छोड़ना चाहिए। इसी पर कुछ पंक्तियां हैं।

लोग तरस खाने लग जाते हैं
देखकर मेरे बदन से बहता पसीना
मुझे बिल्कुल नहीं आती शर्म
यह पसीना है जिससे जीवन में
मिल पाता है सत्य का नगीना
तन और मन की बहुत सारी पीड़ाऐ
बाहर ले आता है पसीना
जो डरते हैं श्रम करने से
उनका भी क्या जीना
लाइलाज दर्द पालकर
ढूंढते हैं उसका इलाज इधर-उधर
रुका पानी विष हो जाता है
सभी जानते हैं
फिर भी शरीर में पालते है
जिनकी देह से निकला पसीना
उनको भला दवायें क्यों पीना
श्रमेव जयते इसलिये कहा गया है
यही है सच में जीवन जीना
……………………….
दीपक भारतदीप

Advertisements
Both comments and trackbacks are currently closed.
%d bloggers like this: