जैसा कहते हैं वैसा लिख, जैसा समझाते हैं वैसा दिख -हास्य व्यंग्य


अंतर्जाल पर कुछ हिंदी ब्लाग लेखक एग्रीगेटरों पर हिट्स और टिप्पणियों के आगे कुछ सोच नहीं पाते और इनमें वह लोग हैं जिनके बारे में कथित रूप से यह कहा जाता है कि वह बहुत बड़े पुरोधा हैं। दरअसल कुछ लोगों ने प्रारंभ में अपने ब्लाग बनाये तो उनको यह लगने लगा है कि उनका नाम अब इतिहास में दर्ज होना चाहिए। जब आदमी में यह भाव होता है तो वह हास्यजनक स्थिति से गुजरता है।

असल में एक ऐसा ब्लाग है जिसमें सब ब्लाग की चर्चा होती है। एग्रीगेटर वह जगह है जहां देश के करीब-करीब सभी ब्लाग एक जगह दिखाये जाते हैं और वहां त्वरित गति से वैसे ही पाठ प्रदर्शित होते हैं जैसे ही उसे कोई ब्लाग लेखक प्रकाशित करता है। सारे ब्लाग लेखक अपनी सुविधा के अनुसार यहां जाकर अपने ब्लाग देखते हैं और दूसरों के पढ़ते हैं। अपनी सुविधानुसार टिप्पणियां भी लिखते हैं। आम पाठक अगर इतनी त्वरित गति से किसी ब्लाग का पाठ पढ़ना चाहे तो उसके सामने दो ही मार्ग हैं या तो वह अपनी पसंद के ब्लाग को अपने यहां इस तरह कंप्यूटर पर सैट करे जिससे उसे हर समय उसे खोलने का अवसर मिले या वह इन एग्रीगेटरों-जिनकों मैं चैपाल भी कहता हूं-पर जाकर वहां देखे। कुछ लोग इन्हीं ब्लाग को लेकर चर्चा करते हैं और उसका लेखक अपने मित्रों को इससे प्रभावित करता है।

कुछ ब्लाग लेखकों को यहां बहुत जबरदस्त हिट और टिप्पणियां मिलतीं हैं। इनमें एक दो एग्रीगेटरों ने पसंद का भी प्रबंध किया है जहां अनेक ब्लाग लेखकों के ब्लाग चमकते है। यहीं से शुरू होता है ब्लाग लेखकों का भ्रम और आपस में ही विवाद। चारों चैपालों को देखा जाय तो इन पंक्तियों के लेखक के सारे ब्लाग एक तरह से फ्लाप हैं। कभी कभार किसी पाठ पर पच्चीस हिटस होते हैं पर पसंद के नाम पर जीरो। मतलब यह है कि उसके लिए भी कोई आदमी चाहिए जो वहां पसंद में शामिल कराये। इन पंक्तियों का लेखक ऐसा आग्रह कभी अपने मित्र ब्लाग लेखकों से नहीं कर सकता।

सब ब्लाग की चर्चा करने के लिए किसी को फुरसत है और वह महाशय इसका संचालन करते हैं। किसी ब्लाग लेखक को ब्लाग जगत में साहित्यकारों की दुर्दशा-यानि हिट और टिप्पणियां कम- नजर आयी और वह तमाम तरह से उन पर बरस रहा था। उसके ब्लाग पर 18 टिप्पणियां थीं और लोग उसमें पूछ रहे थे कि भाई उन साहित्यकारों के नाम भी बताओ। मतलब यह कि तुम्हारी भड़ास तो निकल गयी हमारी भी निकल जाती। उसमें मेरे मित्र भी थे और ऐसे थे जो वाकई मेहनत से लिखते हैं। यह अलग बात है कि उनमें सभी को पर्याप्त हिट और टिप्पणियां मिल जातीं है और उनको यह यकीन था कि वह उन फ्लाप साहित्यकारों में नहीं है। मुझे यह कहने में कदापि संकोच नहीं है कि हिंदी के कुछ लेखक बहुत भोले हैं वह इन चालाकियों को समझते नहीं है और शायद इसलिये अपने ही साथियों को हास्यास्पद स्थिति में पहुंचा देते हैं। अगर मै कहूं कि उन अट्ठारह लोगों में सारे मित्र हैं तो मुझे अपनी यह सफाई भी देनी पड़ेगी कि आखिर उन मित्रों ने ऐसा क्यों किया? उनसे मांगना ठीक नहीं है क्योंकि यह हिट पोस्ट लिख उनको बताना चाहता हूं कि ऐसी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मत दो जिससे लिखने वाले हतोत्साहित हों।

ब्लाग लेखक ने तीन अन्य ब्लाग लेखकों की प्रशंसा में लिखा कि उनके पाठकों की कुल संख्या में बाकी कथित साहित्यकारों की पाठक् संख्या सिमट जाती है। इनमें तीनों ही मेरे मित्र हैं और उनके अच्छा लिखने की बात को मैं चुनौती नहीं दे सकता। मैंने तो अपने सारे हथियार ही डाल दिए हैं कि भाई इन एग्रीगेटरों पर हिट और टिप्पणियां की संख्या बढ़ा पाना मेरे बूते का नहीं है। मैं शायद यह पाठ नहीं लिखता अगर उस ब्लाग लेखक का पाठ मेरी दृष्टि में नहीं आता। मगर फुरसत में बैठे हमारे मित्र सीधा हमला करने की बजाय ऐसी टेढ़ी चालें चलते नजर आते हैं कि हम सोचते हैं कि चलो आज इनसे भी निपट लो वरना यह हिंदी ब्लाग जगत को हानि पहुंचाने से बाज नहीं आयेंगे। अपने कथित चर्चा में यह महाशय मेरे ब्लाग का पाठ जरूर दिखाते हैं। उससे पहले अपने मित्रों को खुश करते हुए उनके नाम लिखते हैं फिर आखिर में पुंछल्ला में हमारा ब्लाग/पत्रिका भी लिंक करते है। तीन महीने पहले एक विवाद में वह भी सामने आ गये थे पर मैंने उन पर लिखी एक पोस्ट वापस ले ली।

साहित्यकारों की दुर्दशा पर आंसू बहाती उस पोस्ट पर उन्होंने प्रशंसा भरी नजरों से टिप्पणी की और अपनी चर्चा में सबसे पहले ब्लाग के रूप में लिंक किया जैसे वह उस दिन की सर्वश्रेष्ठ पोस्ट हो। फिर उसकी तारीफ में कसीदे पड़े। आजीवन हिंदी ब्लाग जगत के कथित सेवक फुरसत में बैठे साहब को अब यह समझाना जरूरी है कि ब्लाग जगत में बाहर से पाठक न मिलने का रोना सभी रो रहे हैं और साहित्यकारों के अलावा यह काम कोई और नहीं कर सकता। मेरे मित्र समीर लाल (उड़न तश्तरी)- जो उन तीन ब्लागरों में से है- कहते हैं कि शीर्षक लगाकर एक बार हिट मिल सकता है, पर काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। साहित्यकारों की दुर्दशा लिखकर एग्रीगेटरों पर हिट और टिप्पणियां ले ली मगर आगे उस पाठ का क्या होना है? फुरसत में बैठकर लोगों को सोचना चाहिए। मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर ब्लाग लेखकों के व्यूज केवल 10 से 12 प्रतिशत हैं। कल मेरा एक छह महीने पहले बना ब्लाग दस हजार पार करने वाला है और शायद अगले हफते उसके साथ बना ब्लाग भी पार करेगा। दो ब्लाग बीस हजार से पार कर चुके हैं और एक तीसरा इसी राह पर है। यह संख्या वर्डप्रेस के ब्लाग की है जबकि ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर मैंने मात्र छह माह पहले-यानि ब्लाग बनाने के एक साल बाद- ही काउंटर लगाया है और वहां की कुल संख्या तीस हजार तो दिखती है और पिछली भी माने तो पचास हजार से कम नहीं होगी। हम मोटा आंकड़ा 1 लाख बीस हजार मान लें।

साहित्यकारों की रचनाएं कुछ ब्लाग लेखकों को उबाऊ लग सकतीं हैं और वह उनको पढ़ते नहीं है। पढ़ते होते तो हिट की संख्या से पता चल जाता। मैं ब्लाग देखकर ही बता देता हूं कि कौन पढ़कर लिखता है और कौन केवल हांकने के लिए लिखता है। इसका मतलब यह है कि ब्लाग लेखक ने साहित्यकारों को बिल्कुल नहीं पढ़ा और फुरसत वाले साहब ने उनका आंखें मूंदकर समर्थन कर दिया। लोगों ने वाहवाही कर दी। किसी हिट ब्लाग लेखक में इतना साहस नहीं है जो ऐसा लिख सके। मैं और मेरे ब्लाग तो फ्लाप हैं इसलिये लिख रहे हैं। क्या पता यह पाठ हिट हो जाये और कई दिन से चल रहा बनवास कुछ देर के लिए रुक जाये। क्या करेंगे? अब तो कभी ब्लाग देखकर लिंक कर लेते हैं जहां से कोई हिट आता नहीं अगली बार से वह भी बंद। होने दो। पहले पंद्रह देखते थे अब पांच देखते हैं। यहां परवाह किसको है। अगर ब्लाग जगत के मित्रों की परवाह है तो उनसे तो निबाह लेंगे और उनसे तो आगे भी संपर्क रहना है और पाठकों की संख्या! अरे भाई इंतजार करो कल नहीं तो परसों बता देंगे कि दस हजार में कितने व्यूज ब्लाग लेखकों से आये और कितने पाठकों से। ब्लाग लेखकों में भी उड़न तश्तरी की पाठों की संख्या से घटाकर यह भी देखेंगे कि उनके अलावा कितने और ब्लाग लेखकों की हैं। किसी भी ब्लाग जगत को एग्रेगेटरों के हिट पर इतना नहीं नाचना चाहिए कि लगने लगे कि हिंदी ब्लाग जगत में तीर मार लिया। कोई कविता लिख रहा है या गध या पद्यनुमा-यही शब्द उस ब्लाग लेखक ने उपयोग किया था-तुम उनकी दुर्दशा पर मजाक उड़ा रहे हो और वह तुम्हारे हिट्स और टिप्पणियों पर हंसते है। वह लोग अपना पसीना बहाकर लिख रहे हैं और मै भी। मेरे पर कोई हंस ले पर अगर कोई मेरे या दूसरे के परिश्रम पर हंसता है तो मुझे ही अपनी हंसी उड़ाने का अवसर देता है और न चाहते हुए भी मेरी कलम चल पड़ती है। कभी हास्य व्यंग्य लिखने तो कभी हास्य कविता लिखने।

कहता है वह जैसा मैं कहता हूं वैसा लिख
जैसा समझाता हूं वैसा दिख
स्वयं है शब्द भंडार से खाली
बन रहा है साहित्य का माली
चंद शेर कभी कहे नहीं
लिखता है ख्याल उधार लेकर कहीं
फिर भी मशहूर हो गया है
इसलिये बेशंऊर हो गया है
सिखाता है जमाने को लिखना
अपने जैसा सबको दिखना
आसमान में अपना नाम चमकने की चाह ने
उसे बेजार बना दिया है
झूठी वाहवाही ने बेकार बना दिया है
लिखने के बातें तो खूब करता है
पर वह पढ़ता है कि नहीं
बस कहता यही है
जैसा मैं कहता हूं वैसा लिख
जैसा समझाता हूं वैसा दिख

कहैं दीपक बापू
अपने भ्रम में तुम जी लो
हिट और टिप्पणियों को घोल पी लो
मगर इतना न इतराओ
कि फिर अपने पर ही शरमाओ
हम तो फ्लाप ही ठीक है
हमें यह संदेश नहीं देना कि
जैसा हम कहते हैं वैसा लिख
जैसा समझाते हैं वैसा दिख

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