पास के विद्वान भी बैल बन जाते-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू मैं
हीरो का ब्लाग पढ़कर आया
हिंदी तो ढंग से पढ़ना नहीं आती
पर उसका अंग्रेजी ब्लाग पर पढ़कर
मैंने अपने भतीजे से टिप्पणी लिखवाई
पहली बार अंतर्जाल पर मौज मनाई
सैंकड़ों लोगों के नाम लिखे थे नीचे
मैंने कर दिया सबको पीछे
तुम इसलिये फ्लाप हो
क्योंकि कुछ बनने से पहले ही अपना ब्लाग बनाया’

नाक पर चश्मा लटकाकर
उसे घूरते हुए देखने लगे
जैसे अभी खा जायेंगे
फिर सोचकर बोले
‘दोष तुम्हारा नहीं हमारा है
बात करते हैं तुमसे इसलिये
क्योंकि अकेला होना हमें नहीं गवारा है
तुम्हारे लिये तो वही हिट है
जिसको समझने में तुम्हारी बुद्धि अनफिट है
दूर बैठा कितना भी ढोल है
तुम्हें सुहावना लगेगा
बाहर से लगता है आकर्षक
अंदर जिसमें पोल है
वही तुमको फलता लगेगा
दूर होते तुमसे तो
कुछ हम भी तुमको ऊंचे नजर आते
पास के विद्वान भी घर में बैल बन जाते
जो दृश्य आंख से आगे न जाता हो
जो स्वर कान से पार न पाता हो
जिसका स्पर्श ही तुम्हारे लिए अंसभव
वही तुमको भाता है
मेरे पास हो इसलिये तुम्हारे लिए
अपना यह प्रपंच नहीं रचाया
दुनियां भर में फैले गुणवान और विद्वानों से
बन जायें संपर्क इसलिये यह ब्लाग बनाया
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