धुरविरोधी और आदिविद्रोही-व्यंग्य


लोकतंत्र में विरोध का बहुत महत्व है, यही कारण है कि जिनको सत्ता नसीब नहीं होती वह मुखर होकर विरोध करते है। देश के हर क्षेत्र में राजनीति प्रवेश कर गयी है इसलिये सभी जगह लोकतंत्र और विरोध दोनों ही चलते रहते हैं। जो किसी कारण वश प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं आते वह नारे और वाद के स्वरूप बनाकर अपने क्षेत्रों में राजनीतिक शब्दों के सहारे राजनीति-राजनीत का खेल खेलने लगते हैं। स्वाभाविक रूप से कई क्षेत्रों में मठाधीश है तो उनके विरोधी भी हैं। कुछ लोग अपने को धुरविरोधी कहलाना चाहते हैं। बरसों तक अपने साथ यह संज्ञा जोड़े रहते हैं। उन्हें इसमें मजा आता है। उस क्षेत्र के मठाधीशों से पीडित लोग इन्हीं धुरविरोधी स्वरूपधारी लोगों के पास जाकर अपना दुखड़ा रोते हैं। यह धुरविरोधी उन मठाधीशों के विरुद्ध नारे लगाकर खामोश हो जाते हैं।

मेरा एक लेखक मित्र है पर मै कहीं का मठाधीश नहीं हूं फिर भी मेरा विरोध करता रहता है। उससे त्रस्त होता हूं पर दूसरे लोग कहते हैं कि-‘वह तो इधर-उधर से टीप कर लिखता है।’

मेरी एक पत्रिका में कहानी छपी ‘रोशनी बेचने वाला’ छपी थी। जब मैं यह कहानी लिख रहा था तो इतने मनोयोग से लिख रहा था कि मेरे मस्तिष्क की सारी इंद्रियां सक्रिय थीं और बिल्कुल आखिर में याद आया कि यह तो प्रेमचंद की कहानी ‘टार्च बेचने वाला’ का आधुनिक संस्करण लगती है। मैंने बेहिचक इस बात की चर्चा कहानी में कर दी। लोगों ने पढ़ी और उनको याद आया कि वाकई यह कहानी उससे मिलती जुलती है, मेरे उल्लेख ने मुझे लोगों की दृष्टि में उठा दिया। एक दिन उस लेखक के साथ एक मित्र था और मैं उसके पास गया तो उसने मुझे देखते ही कहा-‘‘वाह यार, क्या कहानी लिखते हो। यकीन नहीं होता। अगर तुम उसमें अधिक साहित्यक भाषा का उल्लेख करते तो मुझे लगता कि तुमने कहीं इसकी तरह से चुराई होगी। तुम उसे कहीं बड़े अखबार मे भेजो। मैंने इतनी जोरदार कहानी कहीं नहीं पढ़ी है।  सच कहूं तो प्रेमचंद के स्तर से कम मैं उसे नहीं मानता।’

इससे पहले मैं उससे कुछ कहता वह लेखक मित्र बोल पड़ा-‘‘यार, इतनी मत उड़ाओ इस बिचारे की। वरना लिखना ही बंद कर देगा। कहां प्रेमचंद की कहानी और कहां इसकी।’

मगर वह मित्र भी कम नहीं था। उसने कहा-‘तुमने उसे पढ़ा है?’
उसने कहा-‘मेरे पास अपने काम से फुरसत नहीं मिलती। इसकी कहानी कैसे पढ़ूंगा?’
बहरहाल दोनों में बहस होने लगी। मैंने ही दोनों को शांत करवाया। बाद में वह मित्र मुझसे अकेले में बोला-‘‘एक बात याद रखना मैं बहुत दिन से तुम्हें ढूंढ रहा था यही बात कहने के लिये। मगर उससे कभी तुम्हारी तारीफ सहन ही नहीं होती। वह तुम्हारा धुरविरोधी है।’

मैने हंसकर कहा-‘‘ हां, जब लिखता हूं तो उसका ध्यान जरूर रखता हूं कि कहीं उसे आलोचना का अवसर न मिले। यह अलग बात है कि वह पढ़ता ही नहीं है।’
अंतर्जाल पर जब लिखना शुरू किया तो कोई धुरविरोधी नाम के ब्लाग लेखक थे। मैं आया तो मेरे कई ब्लाग पर उन्होंने अपनी टिप्पणियां दीं। अचानक ही कुछ हुआ कि उन्होंने अपना ब्लाग बंद कर सन्यास लेने की घोषणा शुरू कर दी। मैं उनका ब्लाग कभी नहीं पढ़ पाया क्योंकि अभी मैं हिंदी ब्लाग जगत में समझ ही नहीं पाया था कि टिप्पणियों से ब्लाग पर पहुंचा जा सकता है। तमाम तरह के वाद-विवादों के बीच उनकी विदाई हो गयी। विदाई गीत भी लिखे गये। मैंने उनकी टिप्पणियां देखीं तो पाया कि समाज की व्यवस्था से वह अंसतुष्ट थे और मेरे जो पाठ उस व्यवस्था पर कटाक्ष करते थे उस पर ही उनकी टिप्पणियां थीं। मैं उनकी टिप्पणियों से प्रभावित था मगर इसका दूसरा पक्ष भी था। धुरविरोधी के समर्थक जिस धारा के थे वह भी मुझे कोई प्रिय नहीं लगती थी। केवल विरोध करने की बात मेरे समझ से परे होती है। समाज के नये स्वरूप की संरचना की योजना न होने पर विरोधी केवल धुरविरोधी ही हो पाते हैं। उस समय हिंदी ब्लाग जगत में  मैं नया था पर धुरविरोधी के समर्थकों के ब्लाग लेखकों के पाठों   में कई तरह की वैचारिक चुनौतियां होतीं थीं। मैंने उनका प्रतिवाद करने की दृष्टि से एक नहीं तीन जगह कवितायें लिखीं। दो छद्म नाम से थीं। हुआ यूं कि मेरे वास्तविक नाम पर तो मित्रों की  प्रतिक्रिया आई पर दो छद्म ब्लाग पर अलग अलग विपरीत टिप्पणियां आईं वह भी कविताओं के रूप में। एक छद्म नाम से दूसरी असली नाम से। छद्म नाम था आदिविद्रोही। मैंने तय किया कि पहले इस छद्म नाम से निपटूं। उसकी टिप्पणी पर उसके नाम को क्लिक किया तो उसका ब्लाग मिल गया। वहां धुरविरोधी की टिप्पणी भी थी जिनके हिंदी ब्लाग जगत से जाने को लेकर विदाई गीत लिखे जा रहे थे। बहरहाल उस दिन ब्लाग की टिप्पणियों से लिखने वाले के ब्लाग पर जाने का ज्ञान हुंआ। दूसरा यह  कि आदिविद्रोही कौन है मैं समझ गया। आदिविद्रोही ने एक पोस्ट ही लिखी थी और उसमें उसने अपने आने की घोषणा की थी। बाद में उसने दूसरे ब्लाग लेखकों के पाठों पर धमकाने वाले भी कमेंट लिखे। पहली और दूसरी प्रतिकूल टिप्पणी करने वाला एक ही व्यक्ति था। मतलब मुझे एक ही व्यक्ति से भिड़ना था। फिर मुझे ख्याल आया कि यह तो मेरा छद्म ब्लाग है। दिलचस्प बात यह है कि मेरे एक मित्र ब्लाग ने एक ही दिन तीनों कविताओं को अपने यहां लिंक दिया था और इसलिये वह लोग एकदम हमलावर हो गये थे। बहरहाल उस दिन गुस्सा पी गया जो बाद में कई पाठों को लिखने के लिए ऊर्जा के रूप में काम आया।

धुरविरोधी की इस हिंदी ब्लाग जगत से विदाई नहीं होगी यह मैं जानता था क्योंकि मुझे लगा कि यह उनका अपने छद्म ब्लाग से छुटकारा पाने का एक नाटक है। बाद में मेरा यह अनुमान सही निकला। आजकल वह अपने वास्तविक नाम से लिख रहे हैं-उनके अच्छे लेखक होने पर भी किसी को संदेह नहीं है। आदिविद्रोही ने घोषणा नहीं की पर फिर उसका ब्लाग यहां दिखाई नहीं दिया। मैंने उस पर अनेक बार व्यंग्य लिखे पर वह कभी नहीं देख पाया। मेरे कई पाठों का नायक  आदिविद्रोही होता है और वह जबरदस्त हिट लेतीं हैं। न केवल ब्लाग लेखकों  में बल्कि पाठकों में भी उनको बहुत रुचि से पढ़ा जाता है।  मैं उसे धुरविरोधी का शिष्य कहता हूं और उसने एक टिप्पणी से वह दिया जो कोई नहीं दे सकता। ब्लाग पर मेरी सबसे पहले जबरदस्त हिट पाठ को मैं कभी नहीं भूलता जिसका  शीर्षक है‘इस ब्लाग मीट पर हास्य कविता मत लिखना’। उसके बाद व्यंग्य लिखना शुरू किया तो फिर रुका नहीं । हां, अब अगर यह वही लोग हैं जो मैं समझ रहा हूं तो उनसे मेरा झगड़ा नहीं है और वह दोनों भी मेरे प्रति कोई दुर्भाव रखते नह दृष्टिगोचर नहीं होते। धुरविरोधी की अनुकूल और आदिविद्रोही की प्रतिकूल टिप्पणियां मुझे भूलती नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों अब उन प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते है जो वह दूसरों के सामने चुनौती के रूप में पेश करते थे।

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टिप्पणियाँ

  • समीर लाल  On 18/05/2008 at 00:56

    धुरविरोधी की अनुकूल और आदिविद्रोही की प्रतिकूल टिप्पणियां मुझे भूलती नहीं है।

    –शायद आप ही नहीं, उस काल का कोई भी नहीं भूल पाया है. सबको सालता है उनका जाना!!

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