बिना शक्ति दिखाये कौन यकीन करेगा-आलेख


बहुत सरल भाव रखने पर लोग सीदा-सादा समझकर अपमान करने लगते हैं। अगर मान का मोह छोड़कर किसी के अभियान में निष्काम भाव से सहायता की जाये तो फिर वह लोग  लाभ उठाकर भी अपमान करने से नहीं चूकते।

हां, यह दोष कई लोगों को इस बात की अनुभूति होती  है कि वह जितना सहज  होकर अपना कार्य करते हुए दूसरों को प्रसन्नता प्रदान करते  है उतना ही लोग उनको लाचार समझने लगते हैं। कहते हैं जो शांत रहता है उसका क्रोध बहुत विकट होता है जो मौन है उसकी शक्ति बहुत अधिक होती है। यह तभी प्रमाणि हो सकता है जब शांति से रहने वाला व्यक्ति अपने कार्य में बाधा आने पर क्रोध का प्रदर्शन करे और मौन रहकर जीवन साधना में रहने वाला व्यक्ति समय पड़ने पर उसकी शक्ति दिखाये।

जीवन के प्रति सरल, सहज और सकारात्मक भाव रखो पर यह भी मत भूलो कि लोगों के लिये तभी आदर्श बन पाओगे जब सतर्क, सजग, और सक्षम होकर अपने सामने आने वाली चुनौतियों  और व्यक्तियों के आक्रमण अपनी शक्ति से  प्रतिकार करोगे। अगर हमने सरलता और सहजता से किसी का उपकार किया अच्छी बात है पर अगर वह पीठ पीछे वार करता है और हम  उसका प्रतिकार नहीं करते तो फिर हमारी शक्ति पर कौन यकीन करेगा? हमें अपनी संघर्ष क्षमता और  शक्ति का उपयोग कर उनका प्रतिवाद और प्रतिकार करना चाहिए ताकि दूसरे देख सकें कि सरलता, सहजता और सकारात्मकता की क्या शक्ति होती है।
आजकल तप और ज्ञान यज्ञ से शक्ति अर्जित करने वाले गुरू नहीं मिलते। धर्मग्रंथों में से ज्ञान को रटकर दूसरों को ज्ञान देने वाले गुरू ऐसे सक्षम शिष्य नहीं दे सकते जो समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए तत्पर हों। उन्हें तो ऐसे शिष्य चाहिए जो उनको दान देते रहें-हमारे धर्म ग्रंथों के अनंुासार ज्ञान केवल सुपात्र को ही दिया जाता है-और उनकी महिमा दूसरों को सुनाकर अन्य शिष्य जुटाते रहें। ऐसे में सात्विक प्रवृत्ति के लोगों का मिलना अत्यंत कठिन है और जो मिलते है वह कुछ देर सौम्यता दिखाकर ठगने का प्रयास करते हैं। उसके बाद सारी दुनियां में ढिंढोरा पीटते हैं कि देखो अमुक को हमने कैसे मूर्ख बनाया या हमने कैसे अपना काम निकलवाया।

सामूहिक रूप से अभियान चलाने की बातें तो केवल धोखा देने के लिये होती हैं। अमुक जगह धार्मिक स्थान बनाना है या अमुक जगह कोई सामाजिक  कार्यक्रम कराना है, भाषा, जाति और वर्ग के आधार पर कोई लक्ष्य पूरा करना है या कोई ऐसी बात जिससे हमारे मन में  मोह पैदा हो और हम तन, मन और धन से त्याग करने के तैयार हो जायें। यहां हर व्यक्ति अपने आपको त्यागी और परमार्थी साबित करने का प्रयास करता है पर उनको  परखे बिना कर हम उन पर विश्वास कर भारी भूल कर बैठते है।ं वह हमारे से प्राप्त सहयोग का दुरूपयोग दूसरों को हानि पहुंचाने और अन्य पापकर्म में भी कर सकते हैं और उसका पाप हमारे माथे ही आता है-इसलिये ही शायद कहा जाता है कि सुपात्र को दान दो।

लोगों के चरित्र ठीक नहीं है। कला, साहित्य, फिल्म और अन्य जो भी आकर्षण का क्षेत्र हैं वहां ऐसे लोगों की भरमार है जो वहां शिखर पर  विराजमान होकर अभियान या आंदोलन चलाकर हमें भीड़ में भेड़ की तरह एकत्रित करते हैं। नारे लगाते हैं

‘आओ जुट जाओ। यह आंदोलन संफल करना है’
‘आओ कुछ ऐसा करो कि यह अभियान सफल हो जाये’

ऐसे नारे लगाने वाले स्वयं कुछ नहीं करते। अपने परिवार की रोटी जुटायें तो ठीक वह अपने लिये अय्याशी के साधन जुटाते हैं। अपना नाम रोशन करने के लिये वह अपनी सूरतें मासूम बना लेते पर उनके मन में क्रूरता का भाव होता है। हम सोचते हैं कि मनुष्य हैं पर वह ऐसे देखते हैं जैसे कि उनके लिये कोई  शिकार है। सदियों से चलता आ रहा है यह सिलसिला। कभी नहीं थमेगा। लड़ता सिपाही है नाम सेनापति का होता है। गाता है गवैया नाम बादशाह का होता है। लिखता है लेखक नाम संपादक का होता है। बनाते हैं मजदूर महल नाम शाहजहां का होता है।

कर्म करो। स्वतंत्र भाव से करो। निष्काम होकर करो। हंसते रहो ऐसे लोगों को देखकर। जो मन में आये करो पर किसी की हानि न करो तो किसी ऐसे को भी लाभ नहीं लेने दो उसका लाभ उठाकर समाज और राष्ट्र के साथ छल करे। खुलकर लिखो, खुलकर बोला और खुलकर देखो ऐसे लोगों के नाटक । परिवार हो या बाहर लोग एक दूसरे का उपयोग करना चाहते हैं। अपने कर्तव्य का निर्वाह करो पर फल को भूल जाओ। अपने मन को स्वतंत्र और पुष्ट कर लो। भीड़ में चलो मगर भेड़ की तरह नहीं। बोलो तो चूहे की तरह चीं-चीं नहीं वरन् शेर की तरह गरजो। अपने सार्वजनिक रूप से किये गये अपमान पर शोर मचा दो। लोग तभी विश्वास करेंगे तुम्हारी भक्ति और शक्ति पर।

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टिप्पणियाँ

  • arvind  On 13/05/2008 at 19:25

    बिल्कुल सही कहा आपने । मैंने भी गहराई से यह महसूस किया है कि लोग सहज आदमी को कुछ नहीं समझते । एक शेर यद् आ रहा है कि –
    कोई अपनी ही निगाहों से तो हमें देखेगा
    एक कतरे को समंदर नज़र आयें कैसे?
    लोगों में आदमी को पहचानने की नज़र नहीं होती । वे सभी को अपनी तरह ही समझते हैं ,खोखला !
    मैंने कुछ प्रयोग करके देखा है । की जब मैं थोड़ा सख्त लेकिन संतुलित लहजे में व्यवहार करता हूँ तो लोग ज्यादा तवज्जो देते हैं। और जब प्रेम से सहज होकर बात करता हूँ तो लोग जाने क्या समझते हैं?शायद हमें लोगों की इतनी इज्ज़त नहीं करनी चाहिए हर कोई इस काबिल नहीं होता।

  • meenakshi  On 15/05/2008 at 20:20

    जीवन के प्रति सरल, सहज और सकारात्मक भाव रखो
    कर्म करो। स्वतंत्र भाव से करो। निष्काम होकर करो। हंसते रहो ..
    किसी की हानि न करो ..
    अपने कर्तव्य का निर्वाह करो पर फल को भूल जाओ।..
    अपने मन को स्वतंत्र और पुष्ट कर लो।

    हमने इन बातों को आत्मसात कर लिया बस…… !

  • Nishant Rastogi  On 26/04/2010 at 14:20

    Deepak. Main Nishant Hu. Main apke alake se bahut prabhabit hua. Kya aap Bakai shakti ko mante ur jante hai.
    agr haan to aap mere dost ban sakte hain. Par aap ek baat bool gaye ishvar to sab jagay hai phir kya sochna aap uspr vishbaas kariye ur jiye. Jb aap uske ho gaye to phir baheh bhi aapka ho gya. apki pareshani uski ho gayi. to apka apmaan bhi uska ho gaya. phir apko badle ke bare main jyada sochne ki koi jaroorat nahi reh gayi. Is bare main pandabo ka example samne hai. siliye jhaan tak ho sake badla krodh na kare.
    agr aap shakti pr vishbaas krte hain to mere satth jaroor jude.
    my email id is
    nishantrastogi80@yahoo.com
    Thanks

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