खुलकर लिखने की इच्छा पूरी हो गयी-हास्य कविता


टूटा हाथ लेकर आया फंदेबाज
तो पूछने पर बताया-
‘दीपक बापू,
कल रात हमने सपने में देखा
आपको ब्लाग के लिये
डाक्टरेट मिल गयी
हम खुशी से झूम उठे और
पलंग के नीचे आकर गिरे
हड्डी टूट गयी लगती है
एक्सरे कराने गया था
बंद कर दो यह ब्लाग
हम भी लाचार है चले आते हैं
तुम्हीं दोस्त हो
तुम्हें ब्लाग लिखते देख खुश होते है
देखो हमारी कैसे हालत हो गयी

पहले देखा उसे सहानुभूति से
फिर दहाड़ते हुए कहें दीपक बापू
‘‘मतलब, जागते हुए भी हम पर
तुम फब्तियां कसना
अपने सपने में भी हमें कहीं
पुरस्कार तो कहीं डाक्टरेट में
फंसते देखने की चाहत रखना
हड्डी टूटने का हमारे ब्लाग से क्या संबंध
हम जब तक रहते यहां फिर भूल जाते है
सपना तो दूर जागते हुए भी नहीं रखते संबंध
लगता है कि तुम पर भूत चढ़ गया है
दोस्त तो तुम दिखावे को है
भला इतना भयानक सपना कैसे
देखते और हमें भी दिखाते
वह तो पहले बहुत झटके खा चुके
इसलिये यह भी झेल गये
कितने ही लोग  सम्मान के वादे
हमारी तरफ ठेल गये
तब भी हम  शरमाते थे
आज भी कतराते है
भला हम कहां बड़े लोगों के यहां
दरबार में सजने जाते है
नामवालों से लेकर अनामों तक
दोस्त हैं हमारे
पर स्वार्थ पूरे होने की इच्छा कहां रख पाते है
अपनी पीड़ाओं का बोझ उठाते
पहले ही थक गये
तुम अपने सपने में भी डाक्टरेट का
बोझ लादने से नहीं छोडे पाते हो
ढेर सारे कागज रखे प्रशस्तिपत्र कबाडे में
हम ढूंढने नहीं जाते
अंतर्जाल पर जमी अपनी महफिल ऐसी
दिल में पूरी तसल्ली हो गयी
हम लिखते रहेंगे निष्काम
देखेंगे लोगों लेते इनाम
खुलकर लिखने की इच्छा
अब हमारी पूरी हो गयी
…………………

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टिप्पणियाँ

  • alpana  On 20/04/2008 at 18:08

    अंतर्जाल पर जमी अपनी महफिल ऐसी
    दिल में पूरी तसल्ली हो गयी

    blogaria hai hee aisa! kuchh bhi ho sakta hai–inaam bahut hain-swarnkamal/swarn kalam aur aap doctrate bhi sapne mein dekh rahe hain!
    bahut khuub kavita hai!

  • अनिता कुमार  On 20/04/2008 at 19:38

    बहुत खूब, फ़िर भी आप को डाक्टरेट की उपाधी से नवाजा जाता है

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