संत कबीर वाणी:खुद को पानी नहीं मिले दूसरों को बांटे खीर


पानी मिले न आपको, औरन बकसत छीर
आपन मन निहचल नहीं और बंधावत धीर

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कुछ लोगों को पानी तक नहीं मिलता और दूसरों को खीर प्रदान करने की बात करते हैं और अपनी बुद्धि निश्चयात्मक नहीं है और दूसरों को धीरज प्रदान करते हैं।

पढि पढि के समुझावई, मन नहीं धरि धीर
रोटी का संसै पड़ा, यौं कहें दास कबीर

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कई लोग धर्मग्रंथों को पढ़कर उसे रट लेते हैं और दूसरों को समझाने लगते हैं पर उनका आचरण भी कोई अच्छा नहीं होता। सदैव अपनी रोटी की जुगाड़ में रहते हैं दूसरों को ज्ञान बघारते हैं

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल धर्मोंपदेश करना व्यवसाय हो गया है। ऐसे अनेक संत हैं जो केवल धन कमाने के लिए ही कथा या उपदेश काम काम करते हैं। ऐसी बातें करते हैं जैसे कि बहुत बड़े ज्ञानी हों और अनेक लोग उनको गुरू मानकर उनकी चरण वंदना करने लगते हैं। यह उनका भ्रम होता है। कई धर्मोपदेशक तो स्वयं भी उस ज्ञान को ग्रहण नहीं करते और अपने अपना काम समाप्त कर उसका दाम वसूल करते हैं। कई जगह जाने से पहले ही दाम तय कर लेते हैं।

यहां हमारा आशय किसी की निंदा करना नहीं है। हम तो बस यह कहना चाहते हैं कि वह व्यवसाय करते हैं यह सभी भक्तों को समझ लेना चाहिए। इन पंक्तियों का लेखक स्वयं ही कई कथाओं में समय पास करने या ज्ञान पाने के लिये जाता है पर उसका उद्देश्य केवल धर्मग्रंथें में पढ़े हुए ज्ञान को स्मरण करना मात्र होता है। ऐसे धर्मोपदेशकों को साधु या संत मानकर सेवा करने या दान से कोई लाभ नहीं होता। उनकी चरणवदंना के कभी भक्ति प्राप्त नहीं होता और जो उनको गुरू बनाते हैं वह भी कोई भगवान का आर्शीवाद नहीं पाते। इनके प्रवचन तो सुनना चाहिए पर फिर भगवान का ध्यान लगाना चाहिए न कि इनके आकर्षण में बंधकर भगवान की भक्ति से विमुख होना जरूरी है। ऐसे लोगों पर माया की कृपा तो होती है पर भगवान की कृपा तो गरीब की सहायता करने, प्यासे को पानी पिलाने और परमार्थ के अन्य काम करने से होती है।

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