आधुनिक शिक्षा के साथ ज्ञान का होना भी जरूरी-आलेख


आजकल दुर्भाग्यपूर्ण  घटनाएं महिलाओं के विरुद्ध हो रही हैं उस पर अनेक तरह के विचार-विमर्श   सब जगह देख रहा हूं। कुछ जगह महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने को लेकर नारे लग रहे हैं। एक दिलचस्प बात यह है प्रचार माध्यमों पर चलने वाली  इन बहसों में भाग लेने वाले ‘अन्य व्यक्ति’ पर बहस कर रहे हैं। क्या इन लेखकों और विचारकों के आसपास ऐसी महिलाओं के विरुद्ध कोई अपराध नहीं होता इसलिये प्रचार माध्यमों में आई घटनाओं को उठाते हैं या अपने आसपास हुई घटनाओं को लेकर बहस करने मेंे उनका भय लगता है इसलिये प्रचार माध्यमों में आई घटनाओं पर बहस करना उनको सुविधाजनक लगता है।  कोई भी बहस नारों से आगे नहीं बढ़ पाती।
     अनेक महिलाएं भी इस बहस में भाग लेतीं हैं पर वह अपने आसपास हुई घटनाओं की बजाय प्रचार माध्यमों पर दिखाई गई घटनाओं  पर ही उनक विचार केंद्रित होते है।

औरत को बराबरी का अधिकार देना चाहिऐ पर देगा कौन? क्या सारे पुरुष सरकार है जो अधिकार बांटेंगे। अगर महिलाओं के प्रति अपराधों का विश्लेषण करें तो अधिकतर मामलों में अपने परिवार या जानपहचान के लोगों का शिकार होती हैं। इन घटनाओं को मुद्दा तो बनाया जाता है पर बहस केवल नारों और वाद  तक ही सिमट जाती है। इन घटनाओं को दिखाकर हम संपूर्ण समाज को सुधरने के लिये कहते हैं? क्या महिलाएं इस समाज का हिस्सा नहीं है? या हम यह मानकर चल रहे हैं कि समाज तो केवल पुरुषों के ही कहने पर चलता है? अगर हम यह मानकर चल रहे हैं तो फिर कहने के लिये कुछ नहीं बचता।

पश्चिम में राष्टृ, प्रांत, शहर, समाज और परिवार और व्यक्ति  के क्रम में मनुष्य की सक्रियता रहती है जबकि हमारे देश मे इसके विपरीत  व्यक्ति, परिवार, समाज, शहर, प्रांत और देश   के क्रम में उसे चलते देखते हैं।  हम पश्चिम से नारे ले रहे हैं पर समाज हमारा वैसा नहीं है। हम ऊपर से उस पर वाद और नारे थोप रहे हैं जबकि हमें अपने यहां व्यक्ति का समझने और  समझाने की जरूरत है।

हमारे देश में व्यक्ति के रूप में हमारा रवैया कैसा है? व्यक्ति का यह अर्थ कदापि नहीं है कि महिलाएं इसमें शामिल नहीं है। एक नहीं ऐसा हजारों उदाहरण हम अपने आसपास देख सकते हैं जिसमें कोई महिला ही दूसरी महिला पर प्रहार करती है या कराती है। आदमी जादू टोने में इतना यकीन नहीं करते पर जो महिलाएं करतीं हैं वह सिद्धों के यहां जातीं है और जो जातीं हैं उनमें भी एक दूसरे पर संदेह करती हैं कि कहीं वह जादूटोना नहंी करा दे। ऐसे संदेह बाद में बहुत बड़े झगडें में भी तब्दील हो जाते हैं।
 
यहां केवल अशिक्षित महिलाऐं ही नहीं शिक्षित महिलाएं भी-जिनको विवाह के बाद घर में ही रहना पड़ा इसलिये उनकी शिक्षा कुंठा  में बदल गयी-ऐसा व्यवहार करते देखी जा सकतीं है जैसी अनपढ़ औरतें करतीं है। पति-पत्नी खुद भी पढ़े लिखे हैं और  बेटा पढ़लिखकर  नौकरी में लग गया है  तो बहू भी पढ़ी लिखी  चाहिए। संयोग से  अच्छी घर की संस्कारवान बहू मिल जाये तो फिर उस पर अपने संस्कार थोपते हैं। बहू नौकरी करती है तो भी उसे बताते हैं कि वह एक स्त्री  है और उसे घर का काम करना चाहिए-यह कहने वाली होती है पढ़ीलिखी  सास और उसे तमाम फरमान सुसर के नाम से सुनाये जाते हैं-कभी कभी अपनी अपढ़ सास का पुराना निर्णय भी थोपा जाता है। एक ऐसी कोई घटना नहीं है जिसका जिक्र करें पर अपने आसपास हमें देखना होगा कि क्या केवल नारे लगाने से काम चल जायेगा।
  
रोज बहसें होती है। यह होना चाहिए वह होना चाहिए। पर करेगा कोैन? प्रचार माध्यमों में आई घटनाओं को बाद में जिक्र नहीं होता और उस समय चिल्लपों मचाने वाले संगठन बाद में कुछ करते है इसका भी कोई प्रमाण नहीं होता। हम कहते है कि लोगों मे शिक्षा की कमी है पर अगर आधुनिक शिक्षा को देखें तो वह भी कोई महिलाओं के विरुद्ध अनाचार को रोकने में सफल नहीं हो पायीं। मै जो लिख रहा हूं वह समाज में व्याप्त है उसे ही लिख रहा हूं। मैं यह कहता हूं कि जब हम इन पर चर्चा करते हैं तो यह बात कहने में घबड़ाते क्यों है कि इसके लिये महिलाएं भी जिम्मदार हैं जो अब उम्र में बड़ी हो गयी है और  उन्होंने अपनी युवावस्था में बहू के रूप में पीड़ा झेली थी वह अब सास के रूप में बहू को देना चाहतीं है। इतना ही नहीं अपने घर में बैठकर दूसरी महिलाओं की खलनायिका की छवि अपने परिवार के पुरुष सदस्यों में बनातीं हैं। अगर कहीं वादविवाद हो जाये तो वह पुरुष सदस्य ही अपने घर की  महिलाओं के कहने में आकर ही उनके विरुद्ध उग्र हो जाते हैं।

मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि देश में महिलाओं को विरुद्ध बढ़ते अपराध बहुत चिंता का विषय है और भ्रुण में बालिकाओं की हत्या तो एक जघन्य अपराध है पर हम इसका मुकाबला तब तक नहीं कर सकते जब तक पुरुषों और महिलाओं में शिक्षा के साथा ज्ञान नही आता। ज्ञान के बारे में अगले अंक में
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