गर्मी के साथ बढ़ती महंगाई-आलेख


जैसे जैसे गर्मी बढ़ती जा रही है वैसे शारीरिक और मानसिक तनाव लोगों में बढ़ता जा रहा है। इस तनाव में बढ़ती महंगाई भी अब एक वजह बनती जा रही है। जहां देखो हर चीज पर कीमत बढ़ रही है। हालांकि कुछ लोग कहते है कि लोगों को तो बस आदत है रोने की, और खुदरा और छोटे व्यापारी,डेयरी वाले और होटल वाले तो जरूरत के अधिक दाम बढ़ा देते हैं। मैं इससे सहमत नहीं होता क्यांकि मुझे लग रहा है कि छोटे व्यवसायी तभी मजबूरी में दाम बढ़ाते हैं जब उनके पास इसके अलावा कोई मार्ग नहीं बचता।

नये युग में बाजार स्वयं किसी सामान्य स्थिति के तहत वस्तुओं को दाम तय नहीं करता। यह पहले ही होता था कि मांग और आपूर्ति के नियम के अनुसार वस्तुओ के मूल्य घटते और बढ़ते थे। अब तो राजकाज की नीतियां, आयात-निर्यात और परिवहन के साधनों की उपलब्धता भी मूल्यों को तय करती है। हो सकता कोई चीज देश के कुछ बाजारों में बडे पैमाने पर उपलब्ध हो पर वह अनेक दुकानों पर छोटे-छोटे स्टाक के रूप होने से एसा भी लगता है कि वह कम पैमाने पर है और उसके दाम भी इसलिये नहीं गिरते क्योंकि वह जल्दी खराब होने वाली वस्तु नहीं होती। एक तो देश में खुदरा वस्तुओं की दुकानें इतनी खुल गयी हैं कि अगर किसी साबुन या क्रीम का विज्ञापन दिखता है तो दुकानदार भी एजेटों के खरीद लेते हैं और उससे तो ऐसा लगता है कि उस कंपनी का उत्पाद बाजार में बिक गया जबकि उसका का एक बहुंत बड़ा हिस्सा तब भी बाजार में खुदरा या थोक व्यापारी के पास पड़ा रहता है। कुछ नयी कंपनियों ने तो इसी चक्कर ने अपने उत्पाद के दाम बढ़ा दिये जबकि उनका माल अभी आम उपभोक्ता के पास पहुंचा ही नहीं था। एसे में कुछ कंपनियां बंद भी हो गयीं।

देश की कालोनियों में अनेक लोग अपने घर के बाहर खुदरा व्यापार की दुकानें खोल लेते हैं और वह अपनी वस्तुओं के भंडार के लिये अपनी पूंजी खुद लगाते है। हालत यह कि कहीं पचास घर है तो वहं दस से पंद्रह दूकानें किराने की हैं। ऐसे में सबने पूंजी लगाई। वह सामान रख कर बैठ जाते हैं। कुछ का चलता है तो कुछ का नहीं। हां वह अपनी पूंजी से जिन कंपनियों के सामान खरीद लेते हैं वह तो चमक जाती हैं और अपना पूरा सामान बिका हुआ मान लेती हैं। ऐसे में वह रेट बढ़ा लेती हैं। सच तो यह है कि उनके सामान में उन थोक और खुदरा व्यापारियों का बहुत अधिक पैसा होता है। कहते हैं कि इस देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है पर यह आधा सत्य है क्योंकि छोटे थोक और खुदरा व्यापारी भी हमारी अर्थव्यवस्था के उतने ही प्राण है जितने किसान। यहीं कारण है कि किसान के साथ यह छोटे व्यापारी भी इस समय संकट का सामना कर रहे हैं।

कोई भी छोटा थोक और खुदरा व्यापारी अपनी चीजों को दबा कर नहीं रखता। नकद राशि आती हो तो कम लाभ पर भी सामान बेच देते है। ऐसे में अगर डेयरी, होटल और अन्य छोटे व्यवसाय करने वाले अपनी वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य बढ़ाते हैं तो देश की जनता के सामने भयावह संकट आ जाता है। मैं पहले भी लिख चुका हूं यह मनमाने ढंग के मूल्य निर्धारण करने की ताकत नहीं रखते पर चूंकि यह सीधे जनता से जुड़े रहते हैं इसलिये उसकी नाखुशी का सामना भी वही करते है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह गर्मिंया बहुत तनाव से गुजरेंगी । शहरों में पेयजल और बिजली का संकट और फिर इस महंगाई की परेशानी हैरान करने वाली हैं।

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