चजई-ब्लोगर रतन और खंजर


रतन-रतन कर सब उसे लेने
एक बाग़ की तरह भागे जा रहे थे
कहीं लगी दो ब्लोगरों को यह खबर
अपने स्थाई टिप्पणीकार को लेकर
पहुंच गए जहाँ सब अपने नाम से
रतन तलाश रहे थे
पेड़ पर लगे कागज़ के फल उखाड़ रहे थे

किसी ने उखाडा कवि रतन का कागज़
किसी ने विज्ञान रतन
किसी ने साहित्य रतन
किसी ने कलाकार रतन
किसी ने शहर रतन तो किसी ने गाँव रतन
पर दोनों ब्लोगर नहीं कर सके कोई जतन
टिप्पणीकार को अन्दर जाने के लिए उकसा रहे थे

मचा हुआ था हां-हाकार
सब बडे लोग आपस में टकरा रहे थे
कई लोगों के सिर फटे
तो कई रतन कागज़ भी न बचे
घायल एक आदमी बाहर आया
टिप्पणीकार ने उससे पूछा
‘क्या अन्दर कहीं ब्लोग रतन का कागज़ भी है
तो इन दो भले मानसों के लिए ले आऊँ
साथ लाया हूँ दो ब्लोगरो को
यह बिचारे भी मरे जा रहे थे’

वह आदमी बोला
”सब कागज़ लूटते-फटे देखे
पर ब्लोगर रतन का नही दिखा
वैसे भी जिसको मिले वह भी
सब फटे चले जा रहे थे’

वह आदमी चला गया तो
टिप्पणीकार दु:खी होकर लौटा
और अपने हाथ में रखा खंजर फैंकते हुए बोला
‘वापस चलो नहीं है कोई तुम्हारे लिए रतन
व्यर्थ है करना जतन
बिचारे सब लोग परेशान हुए जा रहे थे’

एक ब्लोगर ने पूछा
”बाकी तो सब ठीक पर तुम
यह खंजर कहाँ से और क्यों ला रहे थे’

टिप्पणीकार बोला
”सोचा था मिल गया ब्लोगर रतन तो
तुम्हें धमकाकर छीन लूंगा
अरे क्या तुम्हार ब्लोग पर
मुफ्त में कमेन्ट लगता हूँ कि
मैं सोचता था शायद
कभी कोई फायदा मिल जाये
पर अब नहीं है इसकी जरूरत
क्योंकि अभी तुम्हारी जाति पंजीकृत नहीं है
तुम क्या मुझे मुफ्त का माल समझे जा रहे थे
————————————————-
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है.

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टिप्पणियाँ

  • राजीव तनेजा  On 14/01/2008 at 17:16

    संदेश का संदेश….

    व्यंग्य का व्यंग्य……

    एक पंथ…..कई काज…..

    लिखते रहें……

    पढाते रहें….

    तडपाते रहें……

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