रहीम के दोहे:घोडा कभी वजीर नहीं बन सकता


रहिमन वे नर मर चुके जे कहूं मांगन जाहिं
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं

अर्थ-कविवर रहिमन कहते हैं कि जो किसी व्यक्ति के समीप कुछ याचना करने के लिए जाते हैं, उस मनुष्य को मृत ही समझो, परन्तु उनसे पहले वे मनुष्य मृत हैं, जिनके मुख से याचक को देखकर इनकार का शब्द निकलता है.

रहिमन सीधी चाल सौं, प्यादा होत वजीर
फरजी साह न हुई सकी, गति टेढी तासीर

अर्थ-कवि रहीम कहते हैं कि सरल गति से चलने से शतरंज के खेल में पैदल चलने वाला प्यादा भी मंत्री बन जाता है, परन्तु वक्र गति से चलने वाला घोडा कभी वजीर नहीं बन सकता.

भावार्थ-सीधा व्यक्ति ,सीधी चाल चलता हुआ ऊंचे मुकाम पर पहुंच जाता है और लोगों में सम्मान अर्जित कर लेता है पर जो छल,कपट और अन्य बुराईयों में लगा रहता है उसे कभी समाज में सम्मान नहीं मिल सकता. भले ही लोग धन, पद और बाहुबल की वजह से डरें पर वह मन से सम्मान नहीं करते.

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